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जानिए, ज्योतिष में कितना कष्टप्रद है विषयोग....

कु. सीता शर्मा
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार विषयोग तब बनता है जब किसी जातक की कुंडली में यदि शनि चंद्र की राशि में बैठे हैं या चंद्र शनि की राशि मे स्थित हो ओर यदि किसी भी भाव में शनि-चंद्र की युति हो तब इस योग का निर्माण होता है। 

 
 
विषयोग में शनि चंद्र की युति का फल -
 
प्रथम भाव -
प्रथम भाव में यदि शनि और चंद्र की युति होती है वह जातक अक्सर बीमार रहता है। पारिवारिक जीवन में कलह रहता है। अधिकतर शंकालु और वहमी रहता है। अवसादी व मानसिक चिंताओं से घिरा रहता है। 
 
द्वितीय भाव -
द्वितीय भाव में यदि शनि और चंद्र की युति होती है तो उसे पैतृक संपत्ति से सुख नहीं मिलता है। कुटुंब से संबंध अच्छे नहीं रहते है। वाणी नियंत्रण नहीं रहती है। कई रूकावटों का सामना करना पड़ता है। गले से संबंधित रोग होते हैं। 

तृतीय भाव -
तृतीय भाव में यदि शनि और चंद्र की युति होती है तो वह अशुभ होता है श्वास से संबंधित रोग उत्पन्न होता है, पराक्रम में कमी आती है, पड़ोसियों से संबंध खराब होते हैं व सहोदरों के लिए अशुभ होता है। 

चतुर्थ भाव -
चतुर्थ भाव में यदि शनि और चंद्र की युति होती है तो वह कष्टकारी होता है। यदि स्त्री की कुंडली में हो तो स्तन संबंधी रोग होने की संभावना रहती है ग्रह सुख में कमी रहती है। वाहन संबंधित कष्ट होता है।

पंचम भाव -
पंचम भाव में यदि शनि और चंद्र की युति होती है तो संतान के लिए कष्टकारी होता है। शिक्षा पर इसका विपरीत असर होता है। निर्णय लेने की क्षमता में कमी रहती है। 

षष्टम भाव -
षष्टम भाव में यदि शनि और चंद्र की युति होती है यह भाव में योग मातृ पक्ष से असहयोग गुप्त शत्रुओं से परेशानी कोर्ट, कचहरी, विफलता चोरी शारीरिक कष्ट उठाने पड़ते हैं। रोग ठीक नहीं होता है।
 
सप्तम भाव -
सप्तम भाव में यदि शनि और चंद्र की युति होती है तो कुंडली में इस भाव पर यह योग होने से दांपत्य जीवन कष्टमय होता है। ससुराल पक्ष में संबंध खराब रहते हैं। व्यवसाय व कारोबार में नुकसान होते रहते हैं। 

अष्टम भाव -
अष्टम भाव में यदि शनि और चंद्र की युति होती है तो विषयोग मृत्यु तुल्य कष्ट देता है। जातक की दुर्घटना संभावना बनी रहती है। पैतृक संपत्ति नही मिलती है सर्पदंश, चिन्ता यात्राओं में कष्ट होता है। 

नवम भाव -
नवम भाव में यदि शनि और चंद्र की युति होती है तो इस योग से भाग्य में रूकावट आती रहती है। कार्यों में  असफलता, धर्म संबंधित कार्यो में अड़चनें आती है। यात्राओं में कष्ट होता है। भाग्य में कमी रहती है। 
 
दशम भाव -
दशम भाव में यदि शनि और चंद्र की युति होती है तो यह योग नौकरी में परेशानी दिलाता है। अधिकारियों से संबंध ठीक नहीं रहते हैं।पिता पक्ष से संबंध अच्छे नहीं रहते हैं। संपत्ति संबंधित विवाद रहते हैं। 
 
एकादश भाव -
एकादश भाव में यदि शनि और चंद्र की युति होती है तो उन्नति के अवसर जाते रहते हैं। बड़े भाई-बहन के संबंध खराब रहते हैं। आय के स्त्रोतों मे कमी रहती है। परिश्रम करने के बाद लाभ नहीं मिल पाता है। 
 
द्वादश भाव -
द्वादश भाव योग में यदि शनि और चंद्र की युति होती है तो व्यसन, कारावास, दंड, अपयश, वृद्धावस्था में कष्ट तथा भारी व्यय का सामना करना पड़ सकता है।
 
कब बनता है विषयोग 

विषयोग तब भी बनता है जब वार और तिथि के मध्य विशेष योग बनता है। 

रविवार  - रविवार के दिन चतुर्थी हो तब
सोमवार  सोमवार हो और तिथि षष्ठी हो 
मंगलवार  - मंगलवार हो ओर तिथि सप्तमी हो। 
बुधवार  - बुधवार के दिन द्वितीया तिथि हो।
गुरूवार  - गुरुवार के दिन अष्टमी तिथि हो।
शुक्रवार  शुक्रवार के दिन नवमी तिथि पड़े तब 
शनिवार  - शनिवार के दिन सप्तमी तिथि हो 
 
इन वारों में अगर यह दोष पड़े तो कोई भी शुभ काम करने की इजाजत नहीं दी जाती है यह अशुभ योग का निर्माण करती है। 

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