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एक चिट्ठ‍ी, अरविंद केजरीवाल के नाम

स्मृति आदित्य
मैं राजनीति नहीं जानती। मैं राजनीति पर लिखती भी नहीं हूं। लेकिन पिछले दिनों मेरी राजनीति में दिलचस्पी बढ़ी दो व्यक्तियों की वजह से। बताने की जरूरत नहीं कि यह दो शख्स हैं अरविंद केजरीवाल और दूसरे नरेन्द्र मोदी।
 

 
मोदी पर इतना लिखा जा रहा है कि मेरा लिखना फिलहाल मायने नहीं रखता पर हां मैं अरविंद केजरीवाल के लिए लिखना चाहती हूं। जमाने भर को पत्र लिखने वाले अरविंद केजरीवाल को पत्र लिखना चाहती हूं। क्योंकि हमें अरविंद से जवाब चाहिए कुछ भीतर खौलते हुए सवालों के। 

अरविंद जी, 
 
मुझे याद है जब अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन शुरू किया था तो एक शख्स जो सांवला दुबला-पतला और थोड़े से कम कद का था उनके आसपास होता था। अचानक मीडिया के साथ-साथ सबका ध्यान इस शख्स ने आकर्षित किया था। अरविंद वह तुम ही थे जिसमें अचानक युवा वर्ग की दिलचस्पी बढ़ी थी। अच्छा लगता था जब तुम अन्ना के कान में कुछ फुसफुसाने आते तो लगता एक विश्वासपात्र कुछ सलाह दे रहा है। आंदोलन के रणनीतिकार के रूप में भी तुम भले ही लगे थे। अचानक तुम्हारी गूगल सर्च बढ़ी थी। तुम्हारे बारे में जानने के लिए युवा वर्ग बेताब सा नजर आया।


लगा कि यह तो वही ईमानदार छबि का हम में से कोई एक आदमी है जो व्यवस्था के विरूद्ध छटपटा रहा है। कहीं न कहीं वह हमारी ही छटपटाहट थी जिसे हम तुममें प्रतिबिंबित कर देख रहे थे। फिर अन्ना आंदोलन का शोर थमा तो तुम थोड़े से अलग-अलग लगे। लगा जैसे तुम अभी भी खुद को पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर सके हो। 

पहला पड़ाव आया कि तुमने राजनीति को चुना। अन्ना को नाराज किया। हमें सबकुछ अजीब लगा फिर भी विश्वास की एक डोर जो तुम्हें देखकर देश की व्यवस्था के लिए बंधी थी वह कमजोर नहीं हुई। यहां हमने तुम्हें पहली बार माफ किया और दरकते विश्वास को थाम लिया... डपट दिया खुद को ही। ''नहीं, इतना अविश्वास ठीक नहीं। वह कुछ जरूर कर के दिखाएगा। इतनी जल्दी हताशा ठीक नहीं।''   


 
 
हमने यानी मुझ जैसे कुछ भोले जनों ने फिर-फिर विश्वास किया। तुम दिल्ली से भागे तब भी और तुम अभूतपूर्व तरीके से चुनाव जीते तब भी... तुम 'अजीब-अजीब' अविश्वसनीय साथियों ( आशुतोष से लेकर सोमनाथ तक और आशीष खेतान से लेकर संजय तक) के साथ सामने आते रहे तब भी और अच्छे-अच्छे विश्वसनीय चेहरों को दुत्कारते रहे तब भी...बार-बार मन दुखा कि यह तुम क्या कर रहे हो? क्यों अलहदा राजनीति करने का दावा करते हुए वही-वही कर रहे हो जिसके खिलाफ तुम थे और तुम्हारे साथ हम थे हम सब... 


 
तुमने किरण का साथ छोड़ा तो हमने किरण पर शक किया तुम पर नहीं, तुमने शाजिया से पटरी नहीं बैठाई तो भी लगा कि तुम गलत नहीं। पर सबसे ज्यादा मन टूटा हमारा जब तुम धीर-गंभीर योगेन्द्र को भी नहीं संभाल सके। फिर भी हम कुछ लोग जो नई-नई राजनीति के प्रति आकर्षित हुए थे लगा कि शायद तुम्हारे काम का तरीका भिन्न होगा। 

अरविंद तुम्हें नहीं पता कि 'आप' यानी आम आदमी पार्टी को लेकर हमने कितना सारा अच्छा-अच्छा शुभ-शुभ सोच लिया था। तुम परत दर परत हर बार सामने आते रहे और हम अपनी आंखों को धोखा देते रहे। तुम्हारे 'कुमार' पर 'विश्वास' किया तो वह भी चकनाचूर हुआ। तुम्हारा मनीष 'विष' बना तो हम बेबस से देखते रहे। 

 
तुम्हें लेकर हम जैसे कुछ पाठकों ने कभी सस्ते चुटकुले पसंद नहीं किए पर अब तो लगता है जैसे तुम इन्हीं चुटकुलों के लिए बने हो। 
 
अरविंद जवाब तुमसे सिर्फ दिल्ली ही नहीं चाहती देश-विदेश के बहुत सारे लोग भी चाहते हैं। वे जो तुम पर आस्था रखते थे। तुम्हारे पास हम सबसे छल करने का कोई जवाब है? 
 
तुम नहीं जानते घर की बहस में हम तुम्हारे लिए पचासों बार भिड़े हैं अपने अपनों से... जिन्हें तुम पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं था उनके गले तुम्हारी साख उतारते रहे...। पचासों बार मेहमानों के सामने हम तुम्हारे समर्थक होने का मजाक बने हैं। तुम पर आक्रमण हुआ तो लगा कि हमें चोट लगी है... इतना-इतना विश्वास किया था हमने... 

किसान रैली में हुई आत्महत्या (जिसे हत्या कहना ज्यादा उचित होगा) के बाद तुम्हारी संवेदनशून्यता ने हमारा मन तोड़ कर रख दिया। रही-सही कसर आशुतोष के उस विलाप ने कर दी जिसे देख कर खुद पर ही शर्म आई कि यह कैसे लोगों पर विश्वास कर बैठे हम? 

अब तुम्हारी 'जंग' के साथ 'जंग' देखने में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं। थोड़ी भी शर्म बची हो तो अरविंद लौट जाओ अपनी दुनिया में.. हमें अब कोई रूचि नहीं रही तुम्हारी झूठी वैकल्पिक राजनीति में...नहीं अरविंद....तुम पर विश्वास के नाम पर हमारे पास अब कुछ नहीं बचा...खत्म करो 'अलग' राजनीति के इस नाट्य रुपांतर को...हमें माफ करो...!    

आशा है तुम आत्मावलोकन करोगे... 
सादर शुभकामनाओं  ‍सहित् 
''हम जो कभी तुम पर विश्वास करते थे...'' 
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