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पंखिड़ा...ओऽऽ...पंखिड़ा!

व्यंग्य

Webdunia
विजय नाग र
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श्राद्धपक्ष बीत गया। भुविभारभूता संतानों ने पितरों का तर्पण कर वार्षिक कर्तव्य कर पारिवारिक अतीत से पल्ले झाड़ लिए। चैन की साँस ली कि अब बात सालभर पर गई। पिछले पखवाड़े में प्रोफेशनल ब्राह्मणों के दिन भी खूब बहुरे। पुरखों के बनाए मकानों की छतों पर काकदलों ने जमकर गुलछर्रे उड़ाए। बेचारे कौए अब आदतन इधर-उधर फैले कूड़े के ढेर में अपने रूटीन आहार की जुगाड़ में फड़फड़ा रहे हैं।

जो बीत गया, सो बीत गया। शारदीय नवरात्रि उत्सव के आरंभ होते-होते नगर के जियाले नौजवानों की बाँछें खिल उठीं। मुख्य मार्गों के दोनों किनारे भीमकाय होर्डिंग्स से अटे पड़े हैं। लल्लू भैया और मित्रमंडल की डरावनी तस्वीरें होर्डिंग की शोभा में चार चाँद लगा रही हैं। उत्सव-समारोहों के लिए चंदा जुटाने का पुनीत कार्य पूर्ण समर्पण भाव से किया जा रहा है। चंदा इकट्ठा करने की समस्त विघ्न-बाधाओं का पूरी शक्ति से निपटारा पारंपरिक विधि-विधान से किया जा रहा है।

भाईगिरी की सारी कारगुजारियाँ यकायक माँ दुर्गा की आराधना में तब्दील हो गई हैं। नौ दिन और नौ रात के पूरे 7 लाख 77 हजार 600 पलों में राष्ट्र की युवा शक्ति अद्भुत नृत्यकला का प्रदर्शन कर माताजी की आराधना के सैलाब में सराबोर होती जा रही है।

उत्सवमय वातावरण में चप्पे-चप्पे से लगातार लगभग चीखती-सी आवाजें दरो-दीवार से टकरा-टकराकर लौट आती हैं-'पंखिड़ा तू उड़ीने जा जे... 'पंखिड़ा अपने पंख फड़फड़ाता इधर से उधर और उधर से इधर उड़ान भरता है। समझ नहीं आता कि पहले जाए तो किधर जाए- पावागढ़, आबूगढ़, रम्मू दादा के जगमगाते पांडाल में? पलटू नेता के झिलमिलाते शामियाने में या लच्छू खलीफा के जमावड़े में?

रात-दिन बड़े-बड़े भोंपू, जिन्हें आजकल डीजे कहा जाता है, अनवरत रूप से एक ही हुक्म जारी कर रहे हैं- 'पंखिड़ा तू उड़ी जा जे...।' पंछी एक और आवाजें अनेक। आवाजें अनेक मगर आदेश एक। संदेश एक मगर डेस्टिनेशन्स अनेक। ऊहापोह की स्थिति में है बेचारा पंखिड़ा।

बौराया पक्षी बहरहाल डीजे सिस्टम से उठती आवाजों में निहित आदेशों की तामील के लिए कोशिशें जारी रखता है। उड़ानों के दरमियान उसके अपने ऑब्जर्वेशन्स हैं। मन ही मन उसे यह भय भी सता रहा है कि उसके धर्मनिरपेक्ष विचारों को जानकर कहीं कोई कट्टर धर्मपरायण आयोजक तीर से शिकार न बना डाले।

पंखिड़ा अपनी छोटी-छोटी और गोल-गोल आँखों से देखता है कि यातायात के लिए बनी राहों और चौराहों पर मंचों के जरिए कब्जा जमाया जा चुका है। शाम ढलते-ढलते आयोजन स्थल का सीमांकन मोटे-मोटे रस्सों, डामर की खाली कोठियों तथा कार्यकर्ताओं के वाहनों के जरिए हो जाता है ताकि रोजमर्रा का फालतू ट्रैफिक नृत्यस्थलों में खलल न डालने पाए।

पंखिड़ा नख से शिख तक रोमांचित है कि पुलिस अधिकारी और जवान, मुस्टण्डे वॉलिन्टियर्स की मदद से पूरी निष्ठा के साथ सहयोग दे रहे हैं। कार्यालयों से लौटते थके-हारे कर्मचारियों और दुकानें मंगल कर दिनभर का गल्ला लिए व्यापारियों पर पान-गुटखे की जुगाली करते पुलिस के जवान लाठियाँ लहराते हुए बराबर डरा रहे हैं।

जोशी मास्टर की साइकल का अगला पहिया लाठी के प्रहार से गोलाई खो चुका है। डंडे का हुक्म है कि गंतव्य तक पहुँचने के लिए सँकरी और बदबूदार अनदेखी और नीमरोशन गलियों के बायपास का इस्तेमाल किया जाए। मजबूर रियाया इसी भूलभुलैया में घर लौटने का रास्ता खोज रही है। सरकारी जमीन धर्मक्षेत्र में बदल चुकी है।

आयोजक और उनकी वानरसेना चूड़ीदार पायजामे और घुटनों से भी नीचे के डिजाइनर कलफदार कुर्तों में चहलकदमी कर रहे हैं। पंखिड़े की नन्ही-सी बुद्धि में एड़ियों तक झूलते रंगीन टुपट्टों का औचित्य समझ में नहीं आ रहा है क्योंकि वह अपने पुरखों से सुनता आया था कि इसी गरीब देश में कोई गाँधी नामक नेता हुआ करता था जो वस्त्रों के नाम पर घुटनों तक की मोटे खद्दर की लंगोटीनुमा धोती पहनता था। पंखिड़ा अपने मन को समझाता है कि इस देश का वस्त्रोद्योग अब जरूरत से ज्यादा कपड़े बना रहा है।

पंखिड़ा यह देखकर चौंकता है कि इन धर्मस्थलों की विद्युत-व्यवस्था खंभों के बीच लटकते तार पर लंगर डालकर की गई है। शनैः-शनैः पंखिड़े का मूड कुछ-कुछ रोमानी हो जाता है जब वह देखता है कि गली-मोहल्ले, बस्ती, कॉलोनी की वो बदसूरत बालाएँ जिन्हें सालभर कोई घास नहीं डालता था, मुखमंडल पर इफरात से कोई सस्ता-सा टेल्कम पाउडर थपेड़े, लाल-सुर्ख लिपस्टिक लगाए इतराती अप्सरा-सी बेवजह ठुमक रही हैं।

उधार की लहँगा-चुनरी में माँ दुर्गा के पांडाल में उनका केटवॉक देखते ही बनता है। कर्णभेदी संगीत के साथ गरबा और डांडिया आरंभ हो चुका है। मदमस्त ताल पर थिरकते और तकरीबन घसीटते पैरों से नृत्यकला का अनोखा मुजाहिरा हो रहा है। जीन्स-टी-शर्ट और धोतीकुर्ता पहने भक्तों का स्वांग रचाए उत्साही लड़के भी नृत्य में शरीक हो चुके हैं। लड़के और लड़कियाँ दिल खोलकर हथेलियाँ और डांडिया टकरा रहे हैं।

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भरे भौंन में नैनन ही अनकही बात और जज्बात एक-दूजे को प्रवीणता से सम्प्रेषित कर रहे हैं। ढोल और फिल्मी संगीत के तेजतर होते-होते प्लास्टिक के जूतों के तले से धूल का जबर्दस्त गुबार ऊपर उठता जा रहा है। पंखिड़ा दैवी-प्रकोप की आशंका से सिहर उठता है क्योंकि गर्द के इस गुबार ने माताजी की प्रतिमा को घेर लिया है।

भक्ति और नृत्य के बेबाक समागम को पंखिड़ा विस्मित नेत्रों से निहार रहा है। दसों दिशाएँ गुंजित करती संगीत की स्वर लहरियाँ बस्ती के बूढ़ों, मरीजों और पढ़ाई में जुटे कुछेक विद्यार्थियों को अवश्य विचलित कर रही हैं। नौ दिन और नौ रातों की मुसलसल उड़ान से पंखिड़ा के पंख अब जवाब देने लगे हैं। शहर की रंगीनियों और रौनकों के बावजूद उसे अब जंगल बेतरह याद आ रहा है। संगीत के विप्लव के बीच भी किसी रेडियो-ट्रांजिस्टर पर पंखिड़ा को रफी साहब संकेत देते हैं-"चल, उड़ जा रे पंछी...!

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