Publish Date: Fri, 12 Apr 2019 (11:51 IST)
Updated Date: Fri, 12 Apr 2019 (11:59 IST)
दिग्गज कांग्रेस नेता शशि थरूर की लोकसभा सीट तिरुवंनतपुरम में इस बार रोचक मुकाबला देखने को मिल रहा है। भाजपा ने इस सीट पर मिजोरम के पूर्व राज्यपाल कुम्मनम राजशेखरन को उतारा है। चूंकि पिछले चुनाव में थरूर की जीत का अंतर काफी कम था, अत: माना जा रहा है इस बार मुकाबला कांटे का है और कोई आश्चर्य नहीं कि इस बार केरल में भगवा पार्टी का खाता खुल जाए।
इस सीट के इतिहास पर नजर डाली जाए तो आजादी के बाद से यहां कांग्रेस और सीपीआई का ही कब्जा रहा है। कांग्रेस ने इस सीट पर सर्वाधिक 9 बार जीत हासिल की है। एलडीएफ ने यहां से सीपीआई के वर्तमान विधायक सी. दिवाकरन को उम्मीदवार बनाया है, जबकि कांग्रेस ने एक बार फिर अपने 'हाई प्रोफाइल नेता' शशि थरूर पर ही भरोसा जताया है।
सत्तारूढ़ एलडीएफ के दिनाकरन यहां मुकाबले को त्रिकोणीय बना रहे हैं, वहीं केरल में खाता खुलने का इंतजार कर रही भाजपा को राजशेखरन से काफी उम्मीदें हैं। कुछ समय पहले राज्यपाल पद से इस्तीफा देने वाले राजशेखरन ने भाजपा की उम्मीदों को बढ़ा दिया है।
राजशेखरन जमीन से जुड़े नेता हैं और उन्होंने अरनमुला एयरपोर्ट मामले में आंदोलन की अगुवाई की थी। प्रदर्शन का नेतृत्व करने के कारण उस समय उन्हें काफी लोकप्रियता मिली थी। राजशेखरन के बारे में यह भी कहा जाता है कि उनके संबंध विभिन्न समुदायों के नेताओं से हैं, जो उन्हें चुनाव में मदद कर सकते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन भी उन्हें प्राप्त है।
इतना ही नहीं भगवा पार्टी को सबरीमाला मामले में भी नायर समुदाय से समर्थन मिलने की उम्मीद है। उल्लेखनीय है कि भाजपा ने सबरीमाला मामले में प्राचीन परंपराओं का हवाला देते हुए महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में हिस्सेदारी की थी। मोदी का विकास मॉडल भी भाजपा के वोटों को बढ़ा सकता है।
हालांकि शशि थरूर को भी कम करके नहीं आंका जा सकता। थरूर इस सीट पर लगातार 10 साल से सांसद हैं। ऐसे में मतदाताओं के बीच उनकी अच्छी-खासी पैठ है। थरूर को उम्मीद है कि वे इस बार और अधिक वोटों से विजयी होंगे साथ उनका मानना है कि मतदाता इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि पिछले 10 सालों में उन्होंने क्या किया है।
ध्यान रखने वाली बात है कि पिछले चुनाव में कांग्रेस के थरूर ने भाजपा के ओ. राजगोपाल को मात्र 15 हजार 470 वोटों से हराया था। थरूर को भाजपा उम्मीदवार राजगोपाल से कड़ी टक्कर मिली थी। सीपीआई उम्मीदवार यहां तीसरे नंबर पर रहा था।
थरूर की मुश्किलों का इस बात से भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्होंने हाईकमान को पत्र लिखकर शिकायत की है कि उन्हें चुनाव में कार्यकर्ताओं का सहयोग नहीं मिल रहा है। 2009 में थरूर की जीत का अंतर करीब एक लाख था। इस सबके बावजूद हकीकत तो 23 मई को परिणाम के बाद ही सामने आएगी, लेकिन इतना तय है कि इस सीट के मुकाबले पर पूरे देश की नजर रहेगी।