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आभामंडल विकसित कर पाएं मनचाही सफलता, इनसे क्षीण होता है औरा

Webdunia
गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020 (18:35 IST)
कोई भी व्यक्ति अपना आभामंडल विकसित कर भौतिक और आध्यात्मिक सुख-समृद्धि आसानी से प्राप्त कर सकता है। दरअसल, व्यक्ति के शरीर से निकलने वाली प्रज्जवलित शक्ति किरणें हैं, जिसकी ऊर्जा हर व्यक्ति में रहती है। इसी ऊर्जा को विकसित कर व्यक्ति के समूचे जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन लाया सकता है।
 
आभामंडल विशेषज्ञ पंडित आशीष शुक्ला के मुताबिक शरीर के 7 चक्रों का हर व्यक्ति जीवन में बहुत महत्व है। यही सातों चक्र व्यक्ति के आभामंडल को संचालित करते हैं। हर चक्र का अपना एक अलग रंग है। इन्हीं रंगों के उतार-चढ़ाव का व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक और नकारात्मक असर होता है। इन चक्रों और रंगों को संतुलित कर हर व्यक्ति मनचाही सफलता और समृद्धि प्राप्त कर सकता है। 
 
पंडित शुक्ला के मुताबिक ये चक्र हमारी मानसिक शारीरिक, भावनात्मक इत्यादि कई कड़ियों से जुड़कर आभामंडल (औरा) के रूप में हमारे वर्तमान समय के दर्पण को तैयार करते है। इसे देखकर और उसमें जरूरत के अनुसार बदलाव लाकर हम वर्तमान और भविष्य की समस्याओ से निजात पा सकते हैं।
 
आइए सबसे पहले जानते हैं कि कौनसा चक्र किस रंग का प्रतिनिधित्व करता है...
 
1. मूलाधार चक्र : इसका रंग लाल है और इसका संबंध हमारी शारीरिक अवस्था से होता है। इस चक्र के ऊर्जा तत्व में असंतुलन, रीढ़ की हड्डी में दर्द होना, रक्त और कोशिकाओं पर तथा शारीरिक प्रक्रियाओं पर गहरा असर डालता है।
 
2. स्वाधिष्ठान चक्र : इसका रंग नारंगी है और इसका सीधा संबंध प्रजनन अंगों से है। इस चक्र की ऊर्जा असंतुलन के कारण इंसान के आचरण, व्यवहार पर असर पड़ता है।
 
3. मणिपुर चक्र : इसका रंग पीला है और यह बुद्धि और शक्ति का निर्धारण करता है। इस चक्र में असंतुलन के कारण व्यक्ति अवसाद में चला जाता है। दिमागी स्थिरता नहीं रहती।
 
4. अनाहत चक्र :  इसका रंग हरा है और इसका संबंध हमारी प्रभामंडल की शक्तिशाली नलिकाओं से है। इसके असंतुलित होने के कारण, इंसान का भाग्य साथ नहीं देता। पैसों की कमी रहती है। दमा, यक्ष्मा और फेफड़े से संबंधित बीमारियों से सामना करना पड़ सकता है।
 
5. विशुद्ध चक्र : इसका रंग हल्का नीला है और इसका संबंध गले से और वाणी से होता है। इसमें असंतुलन के कारण वाणी में ओज नहीं रह पाता। आवाज ठीक नहीं होती। टांसिल, थायराइड जैसी बीमारियों से सामना करना पड़ता है।
 
6. आज्ञा चक्र : गहरा नीले रंग का ये चक्र दोनों भवों के बीच (भ्रूमध्य) में तिलक लगाने की जगह स्थित है। इसका सीधा संबंध दिमाग से है। इस चक्र को सात्विक ऊर्जा का पट भी मानते हैं। इस संबंध में पंडित शुक्ला का मानना है कि अगर परेशानियां बहुत ज्यादा हों तो सीधे आज्ञा चक्र पर ऊर्जा देने से सभी चक्रों को संतुलन में लाया जा सकता है।
 
7. सहस्रार चक्र : यह चक्र सभी चक्रों का राजा है। कुंडलिनी शक्ति जागरण में इस चक्र की अहम भूमिका है।
 
आशीष शुक्ला के अनुसार आम जिंदगी में सभी चक्रों में पूर्ण संतुलन किसी भी व्यक्ति में देखने में नहीं आता। हालांकि जिस व्यक्ति में सभी चक्र संतुलित हों वो संपूर्ण शक्तियों का मालिक होता है।
 
किस तरह अनुकूल करें आभमंडल : दिव्य आभामंडल में नित्य अभिवृद्धि के लिए हमारे धार्मिक साहित्य वेद-पुराणों में पूजा-पाठ, ईष्ट आराधना, अनुष्ठान, यज्ञ तथा त्राटक योग के अभ्यास द्वारा व्यक्ति अपने गिरते हुए औरा में वृद्धि कर सकता है। आभामंडल में वृद्धि का कर्म नित्य रहना चाहिए।
 
उन्होंने बताया कि प्रातःकाल नित्य 15 मिनट तक ओमकार का ध्यान या नाद योग करने से औरा मजबूत होता है। धार्मिक तीर्थ स्थल, नियमित पूजा-पाठ, ईष्ट आराधना, मंत्रोच्चार, योग, प्राणायाम, कपालभाती, आसन, गायत्री मंत्र, ओउम मंत्र का जाप, सत्संग आदि से प्राप्त सकारात्मक ऊर्जा मे माध्यम से आभामंडल विकसित किया जा सकता है।
इनसे क्षीण होता है आभामंडल : पंडित शुक्ला ने बताया कि आभामंडल क्षीण होने के प्रमुख कारणों में - मोबाइल, इलेक्ट्रिक एवं इलेक्ट्रॉनिक्स साधन हैं। ये एक मैगनेटिक ऊर्जा का निर्माण कर विकिरण पैदा करते हैं। मोबाइल, फ्रीज, एसी, टीवी, कंप्यूटर आदि अन्य सभी से नेगेटिव ऊर्जा निकलती है, जो हमें नुकसान पहुंचाती रहती है। इसके साथ ही घर, ऑंफिस, दुकान, फैक्टरी में भी नकारात्मक ऊर्जा का एक कारण वास्तु दोष भी है।
 
उन्होंने बताया कि यदि भवन, ऑफिस, व्यवसाय स्थल वास्तु के नियमों में नहीं हैं तो उससे भी नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बना रहता है। काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद, अहंकार छः मनुष्य के शत्रु हैं। इनसे भी आभामंडल क्षीण या कम होता जाता है। हम निरंतर अपने नकारात्मक भाव व विचार क्रोध-आक्रोश, भय, चिंता, विवशता आदि-आदि दूसरों को संप्रेषित करते रहते हैं। इससे आभामंडल की ऊर्जा तरंगें टूट जाती हैं तथा आभामंडल कमजोर होते ही व्यक्ति में सोचने-समझने की शक्ति भी क्षीण हो जाती है।
 
एक साधारण इंसान का औरा या आभामंडल 2 से 3 फीट तक माना जाता है। आभामंडल का आवरण इस माप से नीचे जाने पर व्यक्ति मानसिक व भौतिक रूप से विकृत हो जाता है या टूटने लगता है। इस स्थिति में उसका आत्म बल भी कम हो जाता है। व्यक्ति की यह स्थिति जीवन में कष्ट या दुख वाली कहलाती है।
 
पंडित शुक्ला कहते हैं कि उचित मार्गदर्शन से आभामंडल विकसित किया जा सकता है और मनचाही सफलता हासिल की जा सकती है। यह मार्गदर्शन न सिर्फ आपकी समस्याओं को दूर करता है बल्कि आपके संपूर्ण जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है।
 

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