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मदर्स डे : क्यों सिर्फ एक दिन दर्द उठा है मां के लिए...

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मां के लिए आज बच्चों में बड़ा दर्द उठा है सच इस उत्साह भरे दर्द का मजा ही कुछ और है। सभी बच्चों को लग रहा है सचमुच वे अपनी मां को बेइंतहा प्यार करते हैं। उनके लिए स्नेह और आदर से दिल भरा हुआ है। यह तो कमाल ही है कि युवा समुदाय का एक बड़ा वर्ग आज फैशन, फिल्में की बातें छोड़कर मां के विषय पर उतर आए हैं। पूरा समाज भी बच्चों से यही उम्मीदें लगाए बैठा है क्योंकि आज मां का खास दिन है, "मदर्स-डे"। 

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दुनिया में एक अजीब चलन हुआ है कि जब लोगों को किसी एक विशेष दिन में कैद कर दो। उसे पर्व, त्योहार उत्साह की तरह मनाओ। जब किसी भावना को आयोजन से जोड़ना है तो बाजार को भी लाभ होगा। इसी क्रम में भारतीय बाजार में भी मां के नाम से रफ्तार आ गई है। गहने, कपड़े, मोबाइल सेट, मेकअप किट, किताबें, गानों की सीडी, फूल, मां के नाम के अक्षर से शुरू होने वाले कप, लॉकेट आदि को खरीदने के लिए एक बहाना मिल गया है। इसी बहाने बच्चे बाजार में भटक रहे हैं। उनकी दिलचस्पी देखते ही बनती है। 

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मजे की बात यह है कि जिस की चिंता व प्यार में वे इतने फिक्रमंद दिख रहे हैं और हफ्तों से इस दुविधा में फंसे हैं कि क्या तोहफा दे, किस प्रकार उन्हें खुश करें, कैसी चकित करने वाली पार्टी दें, इन सब तैयारियों में मां के साथ कितना समय वे बिताएंगे शायद यह मायने नहीं रखता है। कई परिवारों में जब एक छोटे बच्चे का लोग जन्मदिन मनाते हैं तो वह बेचारा कहीं इधर-उधर सो रहा होता है या कोई देखरेख करने वाली उसे कहीं बहला रही होती है और दूसरी तरफ घर में पीना-पिलाना हंसी-मजाक का दौर चलता रहता है। कमोबेश वही स्थिति है आज मां की। 
 
बीच में एक दौर आया था जब बहुत से साहित्यकार भी मां के दर्द से कराह उठे थे। कविता, कहानी, उपन्यास सभी मां पर केंद्रित हो रहे थे। देश-विदेश में संवेदनशील साहित्यकार, शिक्षक, डॉक्टर इत्यादि मां की महत्ता समझाते हैं। लेकिन उनमें से कितनों ने अपनी मां के पास बैठकर उनसे बतियाकर उनके मन की थाह ली होगी? किसी भी भावना के नाम पर प्रॉडक्ट बनाकर, चाहे वह रचना ही क्यों न हो, बेचना आसान हो सकता है लेकिन उसे जीवन में ढालना कठिन है।
 
बाजार संस्कृति जब किसी मंशा के तहत किसी शगूफे को उछालती है तो हम सभी उसे भरपूर हवा देते हैं। आज मीडिया भी मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग में यही माहौल बनाने में लगा है। आज भी मध्य एवं निम्न मध्य व निम्न वर्ग के घरों में मां सबको खिलाकर आखिर में खाना खाती है। उसके साथ बैठकर खाना तो दूर, उसके लिए कितनी सब्जी बची है इसकी फिक्र बेटे-बेटियों समेत घर के दूसरे सदस्यों को भी बहुत कम होती है। 
 
आधुनिक कहे जा रहे समाज में बहुत से परिवारों में बड़े होने पर बेटियां व बेटे शायद ही कभी अपनी मां के पास वक्त निकालकर बैठते हैं और उसे खुशी पहुंचाने वाली बातें करते हैं। मां और बच्चों के बीच दूरी बढ़ने लगी है। कम पढ़ी-लिखी या अनपढ़ मां के साथ बच्चे किस विषय पर संवाद बनाएं यह उन्हें समझ नहीं आता। इसलिए उनके साथ सारे संवाद दैनिक जरूरत आधारित ही हो जाते हैं। किसी का मन पढ़ने के लिए, प्यार देने के लिए, संवाद बनाने के लिए किसी खास तरह की भाषा की जरूरत नहीं पड़ती है केवल गहरे प्यार, सम्मान की आवश्यकता होती है। मां की रोजाना खबर खैरियत लेते रहें तो शायद "मदर्स डे" की जरूरत न पड़े। सच तो यह है कि "मदर्स डे" का यह नजराना प्यार का नहीं बल्कि तकाजा है बाजार का।

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