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तो डॉक्टर भगवान नहीं कहलाएगा...

प्रीति सोनी
हमारे समाज में डॉक्टर को भगवान का दर्जा दिया गया है, क्योंकि वही एक ऐसा शख्स है, जो किसी को मौत के मुंह में जाने से बचा सकता है। तिल-तिल मरते किसी इंसान को जिंदगी दे सकता है और खोई हुई उम्मीदों को जीता-जागता उत्साह दे सकता है। जाहिर सी बात है कि धरती पर एक डॉक्टर ही साक्षात ईश्वर का काम करता है और इसके लिए उनके प्रति जितना कृतज्ञ हुआ जाए कम ही होगा। डॉक्टर्स को प्राप्त इस देव पद के सम्मान में 1 जुलाई को हम डॉक्टर्स डे मनाते हैं। 
कभी-कभी अंतरमन से निकलते इस पवित्र भाव बनाए रखना भी बड़ा मुश्किल होता है। व्यापमं घोटाला इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण है, जो न सिर्फ डॉक्टर जैसे सर्वोपरि पेशे को बार-बार कलंकित करता है बल्कि डॉक्टर्स पर आम जनता के सदियों से जमे हुए विश्वास को एक सेकंड में झकझोर देता है, और उसकी जगह शक और सवालों को दे देता है।
 
अब सवाल यह उठता है, कि डॉक्टर्स डे तो मना लें, लेकिन किसके लिए मनाएं...। हमारे भाव तो चिकित्सक के प्रति बिल्कुल सही है, लेकिन क्या चिकित्सक सच में देवता रह गया है? इस घोटाले के बाद खुलने वाले कई राज, हमें ये बता गए, कि हर बड़े या छोटे शहर में कहीं कोई चिकित्सक ऐसा बैठा है, जो नकाबपोश है। न जाने कितने ऐसे डॉक्टर्स हैं जो अपने चिकित्सकीय ज्ञान की वजह से नहीं, बल्कि पैसे और फर्जी डिग्र‍ियों के जरिए वहां बैठे हैं, लोगों को ठगने के लिए। जिन्हें बीमारी का भी सही पता नहीं, दवा तो बहुत दूर की बात है।
 
व्यापमं घोटाला ही क्यों, यूं भी अब सेहत एक बड़ा व्यवसाय बन चुकी है, जहां डॉक्टर्स की प्राथमिकता सिर्फ मरीजों का इलाज ही नहीं, बल्कि उनसे मोटी रकम ऐंठना भी है। अस्पताल में दाखिल होते ही, कई तरह की गैरजरूरी जांचें, जिनका कई बार बीमारी से संबंध ही नहीं होता, आवश्यक तौर पर कराने की सलाह दी जाती है। बीमारी से परेशान मरीज और अपने के दुख से दुखी रिश्तेदार डरे-सहमे जांचें कराते भी हैं और कहीं से भी इंतजाम करके उतना पैसा भरते भी हैं, जितना कमाने में शायद उनकी जिंदगी निकल चुकी होती है।
 
इन सब के बावजूद, मरीजों की न तो ठीक से देखभाल हो पाती है और न ही डॉक्टर्स के पास उन्हें देखने का समय होता है। देवता के इस अवतार को मान-मनुहार करके बुलाया जाता है मरीज को देखने के लिए। सरकार अस्पतालों में तो स्थ‍िति और भी भयानक है। यहां सिर्फ अपने आराम और तनख्वाह की परवाह की जाती है, और न मिल पाने वाली सुविधाओं के विरोध में आंदोलन करने की। लेकिन मरीज कहां किस कोने में कराह रहा है, इसका ख्याल तक नहीं होता। इंदौर का एमवाय अस्पताल ही ले लीजिए...सोचकर कंफ्यूजन होता कि लोग वहां ठीक होने के लिए जाते हैं या अैर बीमार होने के लिए। अधमरे इंसान की मौत तो वहां तय है। 
 
क्या ये सभी स्थतियां, डॉक्टर्स के घोर लापरवाहियां नहीं...क्या अब भी कहा जा सकता है, कि डॉक्टर में भगवान बसते हैं...और अगर ऐसा है, तो इन देवताओं को अपने प्रति सम्मान बनाए रखने के लिए अधिक प्रयास करने की जरूरत है, वरना आम जनता का विश्वास एक दिन जरूर इस भगवान से उठ जाएगा।
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