हिंदी भाषी होने का दर्द...

अमित शर्मा
भाषा वैसे तो संवाद का माध्यम मात्र है, लेकिन हम चीजों को मल्टीपरपस बनाने में यकीन रखते हैं। इसलिए हमारे देश में भाषा, संवाद के साथ साथ वाद-विवाद और स्टेटस सिंबल का भी माध्यम बन चुकी है। हमें बचपन में बताया गया कि हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाएं आपस में बहनें हैं। लेकिन सयाने होने पर, इनका  झगड़ा देखकर हमें पता चला कि इनका रिश्ता आपस में बहन का नहीं है बल्कि देवरानी-जेठानी सा है।


दाल इतनी महंगी होने के बावजूद हम अभी भी घर की मुर्गी को दाल बराबर ही मानते हैं, इसलिए भले ही इंग्लिश अच्छे से ना आती हो, लेकिन हिंदी बोलने और लिखने में हमें शर्म जरूर आती है।
 
निर्बल का बल भले ही राम को माना जाता है, लेकिन “स्टेटस सिंबल” का बल इंग्लिश को ही मनवाया गया है। इंग्लिश को जिस तरह से स्टेटस सिंबल से जोड़ा गया है उसे देखकर लगता है कि इसके लिए जरूर एम सील और फेविक्विक के सयुंक्त उद्यम द्वारा उत्पादित माल का इस्तेमाल किया गया होगा। इंग्लिश और स्टेटस सिंबल का जो ये “मेल-जोल” है, उसमें बहुत “झोल” है। लेकिन फिर भी ये आपस में इतने मिले हुए हैं कि इन्हें अलग करना उतना ही मुश्किल है जितना कि राहुल गांधी में नेतृत्व क्षमता ढूंढना।
 
भले ही आपने अभी तक लाइफ में कुछ ना उखाड़ा हो, लेकिन इंग्लिश बोल और लिख सकने की कल्पना मात्र से आदमी अपने आप अपनी जड़ों से उखड़ने लगता है, क्योंकि इंग्लिश आने के बाद कपितय सामाजिक कारणों से इंसान का जमीन से दो इंच ऊपर चलना जरूरी माना जाता है। डॉन का इंतजार तो भले ही 11 मुल्कों की पुलिस करती हो, लेकिन एक “सोफेस्टिकेटेड-समाज” में बेइज्जती, हमेशा इंग्लिश ना जानने वालो का इंतजार करती है।
 
हिंदी कहने के लिए (बोलने के लिए नहीं) भले ही हमारी राजभाषा हो, लेकिन उसकी हालत हमने राष्ट्रीय खेल हॉकी जैसी करने में कोई कसर बाकि नहीं रखी है। हम स्वाभिमानी और आत्म निर्भर लोग हैं, इसलिए हमें मंजूर नहीं कि हमारे होते हुए कोई बाहरी व्यक्ति या शक्ति हमारी राष्ट्रीय गौरव से जुड़ी चीजों को नुकसान पहुंचाए। मतलब जिन चीजों पर राष्ट्रीय होने का तमगा लग जाता है, उनकी हालत हम ऐसी कर देते हैं कि उन्हें खुद अपने राष्ट्रीय होने पर शर्म आने लगे। 
 
हम अहिंसा के अनुयायी हैं इसलिए किसी को नुकसान पहुंचाने के लिए हिंसक नहीं होते, बस केवल उसे अपनी नजरों में गिरा देते हैं। हम समता और सद्भाव के वाहक हैं, राष्ट्र की सीमाओं पर घुसपैठ रोकना, अतिथी देवो भव: की हमारी कालजयी अवधारणा के खिलाफ हैं, इसलिए “यूनिफर्मिटी” बनाए रखने के लिए हमने अपनी राष्ट्रीय भाषा में भी दूसरी भाषा के शब्दों की घुसपैठ को बढ़ावा दिया है, ताकि यह संदेश दिया जा सके की हम अपनी नीतियों को कन्सिस्टेंसी से लागू करते हैं। “यूनिफार्म सिविल कोड” का विरोध करने वाले लोग इसी “यूनिफोर्मिटी” का हवाला देते हुए तर्क देते हैं कि हम तो पहले से ही “यूनिफार्म सिविल कोड” का पालन कर रहे हैं।
 
तमाम काबिलियत के बावजूद हिंदी मीडियम वाले और इंग्लिश ना बोल पाने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता है, जो HD से भी ज्यादा क्लियरिटी वाली होती है। 
 
बिना इंग्लिश जाने हिंदी मीडियम वालों की सारी योग्यताए ऊंट के मुंह के जीरे के समान होती है। लेकिन इंग्लिश का ज्ञान मिलते ही वही सारी योग्यताएं “जलजीरे” जैसी  राहत देती हैं। आजकल हिंदी मीडियम के छात्रों को इंग्लिश की जानकारी अपनी “बुक” से कम और “फेसबुक” से ज्यादा मिलती है जहां वो अपने फ्रेंड्स की फोटो पर दूसरों के कमेंट्स देख-देख कर “नाइस पिक” तो लिखना सीख ही जाते हैं। हालांकि उसका मतलब उन्हें तब भी पता नहीं होता है।

 बुक्स से दूर रहकर भी ये स्टूडेंट्स फेसबुक पर “गुड मॉर्निंग”, “गुड आफ्टरनून”, “गुड इवनिंग” और “गुड नाईट” लिखना सीख जाते हैं और चूंकि फेसबुक पर कॉपी-पेस्ट की सुविधा भी होती है इसलिए “स्पेलिंग मिस्टेक” जैसी कोई दुर्घटना होने की संभावना भी कम ही रहती है।

लेकिन समस्या तब आती है जब चैट करनी हो या किसी के कमेंट का जवाब देना होता है। क्योंकि उस समय बड़ा कंफ्यूजन हो जाता है कि किसी के “हैप्पी बर्थडे” या “आई लव यू” का जवाब “सेम टू यू” से देना है या फिर “थैंक यू” से, और उसी समय किसी भी संभावित बेइज्जती के खतरे को भांप लेते हुए हिंदी मीडियम के स्टूडेंट्स लॉग आउट करके पतली गली से निकल लेते हैं, ताकि सामने वाला भी उन्हीं की तरह भ्रम में जिए।

हिंदी मीडियम वाले भले ही “फॉरवर्ड” ना माने जाते हों, लेकिन तकनीकी विकास की मदद से कोई भी इंग्लिश वाला मैसेज आगे “फॉरवर्ड” करके “सोफिस्टिकेटेड-समाज” के निर्माण में अपना योगदान तो दे ही रहे हैं।
 
स्कूल कॉलेज तक तो हिंदी मीडियम वालों का काम ठीक वैसे ही चल जाता है जैसे खराब तकनीक वाले बल्लेबाज का काम भारतीय पिचों पर चलता है। लेकिन असली समस्या तब शुरू होती है जब उच्च शिक्षा के लिए इन्हें इंग्लिश से दो-दो हाथ करने के लिए चार पैर वाले पशु की तरह मेहनत करनी पड़ती है। मतलब देश की व्यवस्था ऐसी है कि शिशु अवस्था में चुनी हुई हिंदी आपको वयस्क होने पर पशुता की तरफ धकेल देती है।

हिंदी मीडियम वाले किसी छात्र को जब पता लगता है कि कोई कोर्स केवल इंग्लिश में ही कर पाना संभव है, तो उसे इंग्लिश लैंग्वेज चुनौती और हिंदी भाषा पनौती लगने लगती है। अगर कोई गलती से या उत्साह से ये पूछ भी ले कि हिंदी राजभाषा वाले देश में इंग्लिश की अनिवार्यता क्यों रखी जाती है तो उसका मुंह, मेन्टोस देकर, “दुबारा मत पूछना” स्टाइल में बंद कर दिया जाता है।
 
इंग्लिश ना आने के कारण कुछ लोग हीन भावना के शिकार हो जाते हैं और कुछ लोग 7 दिन में इंग्लिश सीखें जैसे कोर्सेज के। कुछ लोग अपनी कमजोरी को  अपना हथियार बना लेते हैं और ऐसी इंग्लिश बोलने और लिखने लगते हैं मानो अंग्रेजों से 200 साल की गुलामी का बदला उनकी भाषा से सूद समेत लेंगे।

बड़े बुजुर्ग कह कर गए है, “जहां इज्जत ना हो वहां इंसान को नहीं जाना चाहिए”, इसलिए हिंदी मीडियम वाले हॉलीवुड की इंग्लिश फिल्में देखने नहीं जाते। और वैसे भी “सयाने लोगों” ने सही कहा है कि, “अपनी सुरक्षा इंसान को स्वयं करनी चाहिए” और इसके लिए, क्रिकेट में ऑफ स्टंप से बाहर जाती गेंदों से और जीवन में औकात से बाहर जाती चीजों से छेड़खानी नहीं करनी चाहिए।
 
ऐसा नहीं है की हिंदी की दशा और दिशा सुधारने के लिए कोई कदम नहीं उठाये जा रहे (हालांकि कई भाषायी विद्वानों का मानना है कि अब समय आ गया है कि हिंदी की दशा सुधारने के लिए कदम के साथ-साथ “हाथ” भी उठाया जाए)। ये हमारी दूरदर्शिता का ही परिणाम है कि हम हिंदी की स्थिती सुधारने के लिए बरसों पहले से ही हिंदी दिवस से हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़ा मनाते आ रहे हैं। चिंता, चिता समान है इसलिए हिंदी सप्ताह और पखवाड़े के दौरान जानकारों द्वारा हिंदी की दशा पर व्यक्त की गई चिंता को बैठकों के दौरान बिस्कुट और भुजिया के पैकेट्स पर फूंके गए हजारों रुपए की अग्नि में स्वाहा कर दिया जाता है।  
 
लेकिन फिर भी विद्वानों द्वारा इतनी अधिक मात्रा में चिंता व्यक्त कर दी जाती है कि इसके “रेडियो एक्टिव” प्रभाव से बचने के लिए और चिंता को ओवरफ्लो होने से बचाने के लिए उसे हिंदी सप्ताह /पखवाड़े के “मिनिट्स”  बनाकर फाइलों में दबाकर अलमारियों में रख दिया जाता हैं और फिर अगले साल तक हिंदी चिंतामुक्त हो जाती है।
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