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जान है तो जहान है

देवेंद्रराज सुथार
किसी भी देश में स्वास्थ्य का अधिकार जनता का पहला बुनियादी अधिकार होता है। स्वस्थ नागरिक ही एक स्वस्थ व विकसित देश के निर्माणकारी तत्व होते हैं। हमारी तो सदियों से धारणा रही है कि 'पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में हो माया' तथा 'जान है तो जहान है'।
 
निःसंदेह, अच्छी सेहत ही सबसे बड़ा खजाना है। सेहत को लेकर कोई भी असावधानी किसी को भी मृत्यु के करीब ले जा सकती है। इसलिए हर उस चीज से परहेज करना ही उचित है जिससे कि सेहत को नुकसान पहुंचता है या जो हमें बीमारियों का शिकार बनाती है।
 
स्वास्थ्य के महत्व की ओर बड़ी संख्या में लोगों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के नेतृत्व में हर वर्ष 7 अप्रैल को 'विश्व स्वास्थ्य दिवस' मनाया जाता है। गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा जेनेवा में वर्ष 1948 में पहली बार विश्व स्वास्थ्य सभा रखी गई और विश्व स्वास्थ्य दिवस वर्ष 1950 में पूरे विश्व में पहली बार मनाया गया।
 
भारत स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बांग्लादेश, चीन, भूटान और श्रीलंका समेत अपने कई पड़ोसी देशों से भी पीछे है। इसका खुलासा शोध एजेंसी 'लैंसेट' ने अपने 'ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज' नामक अध्ययन में किया है। इसके अनुसार भारत स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्ता व पहुंच के मामले में 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर है।
 
विडंबना है कि आजादी के 7 दशक बाद भी हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं हो सका है। सरकारी अस्पतालों का तो भगवान ही मालिक है! ऐसे हालातों में निजी अस्पतालों का खुलाव तो कुकुरमुत्ते की भांति सर्वत्र देखने को मिल रहा है। इन अस्पतालों का उद्देश्य लोगों की सेवा करना नहीं, बल्कि 'सेवा' की आड़ में 'मेवा' अर्जित करना है। लूट के अड्डे बन चुके इन अस्पतालों में इलाज करवाना इतना महंगा है कि मरीज को अपना घर, जमीन व खेत तक गिरवी रखने के बाद भी बैंक से लोन लेने की तकलीफ उठानी पड़ती है।
 
दरअसल, हमारे देश का संविधान समस्त नागरिकों को जीवन की रक्षा का अधिकार तो देता है लेकिन जमीनी हकीकत बिलकुल इसके विपरीत है। हमारे देश में स्वास्थ्य सेवा की ऐसी लचर स्थिति है कि सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी व उत्तम सुविधाओं का अभाव होने के कारण मरीजों को अंतिम विकल्प के तौर पर निजी अस्पतालों का ही सहारा लेना पड़ता है। देश में स्वास्थ्य जैसी अतिमहत्वपूर्ण सेवाएं बिना किसी विजन व नीति के चल रही हैं। ऐसे हालातों में गरीब के लिए इलाज करवाना अपनी पहुंच से बाहर होता जा रहा है।
 
गौरतलब है कि हम स्वास्थ्य सेवाओं पर सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का सबसे कम खर्च करने वाले देशों में शुमार हैं। आंकड़ों के मुताबिक भारत स्वास्थ्य सेवाओं में जीडीपी का महज 1.3 प्रतिशत खर्च करता है जबकि ब्राजील स्वास्थ्य सेवा पर लगभग 8.3 प्रतिशत, रूस 7.1 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका लगभग 8.8 प्रतिशत खर्च करता है। दक्षेस देशों में अफगानिस्तान 8.2 प्रतिशत, मालदीव 13.7 प्रतिशत और नेपाल 5.8 प्रतिशत खर्च करता है।
 
भारत स्वास्थ्य सेवाओं पर अपने पड़ोसी देशों चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी कम खर्च करता है। 2015-16 और 2016-17 में स्वास्थ्य बजट में 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी, लेकिन मंत्रालय से जारी बजट में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के हिस्से में गिरावट आई और यह मात्र 48 प्रतिशत रहा। परिवार नियोजन में 2013-14 और 2016-17 में स्वास्थ्य मंत्रालय के कुल बजट का 2 प्रतिशत रहा। सरकार की इसी उदासीनता का फायदा निजी चिकित्सा संस्थान उठा रहे हैं। नेपाल और पाकिस्तान जैसे देशों से भी हम पीछे हैं, यह बेहद ही शर्म की बात है!
 
देश में 14 लाख डॉक्टरों की कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के आधार पर जहां प्रति 1,000 आबादी पर 1 डॉक्टर होना चाहिए, वहीं भारत में 7,000 की आबादी पर मात्र 1 डॉक्टर है। दीगर ग्रामीण इलाकों में चिकित्सकों के काम नहीं करने की अलग समस्या है।
 
यह भी सच है कि भारत में बड़ी तेज गति से स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण हुआ है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश में निजी अस्पतालों की संख्या मात्र 8 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 93 प्रतिशत हो गई है, वहीं स्वास्थ्य सेवाओं में निजी निवेश 75 प्रतिशत तक बढ़ गया है। इन निजी अस्पतालों का लक्ष्य मुनाफा बटोरना भर ही रह गया है। दवा निर्माता कंपनी के साथ सांठ-गांठ करके महंगी से महंगी व कम लाभकारी दवा देकर मरीजों से पैसे ऐंठना अब इनके लिए रोज का काम बन चुका है।
 
यह समझ से परे है कि भारत जैसे देश में आज भी आर्थिक पिछड़ेपन के लोग शिकार है, वहां चिकित्सा एवं स्वास्थ्य जैसी सेवाओं को निजी हाथों में सौंपना कितना उचित है? एक अध्ययन के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं के महंगे खर्च के कारण भारत में प्रतिवर्ष 4 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं।
 
रिसर्च एजेंसी 'अर्न्स्ट एंड यंग' द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 80 फीसदी शहरी और करीब 90 फीसदी ग्रामीण नागरिक अपने सालाना घरेलू खर्च का आधे से अधिक हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च कर देते हैं। इन हालातों में भारत में सभी के लिए स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करने के लिए स्वास्थ्य सेवा वितरण प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन की जरूरत है। पिछले 1 दशक में प्रमुख स्वास्थ्य संकेतकों पर भारत की प्रगति और कई कमियों को अध्ययन में दस्तावेज किया गया है।
 
यह शोध स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के साथ संरचनात्मक समस्याओं की पहचान करता है और साथ ही पिछले विशेषज्ञ समूहों की बातों को साबित करता है कि भारत की स्वास्थ्य सेवा वितरण प्रणाली के लिए एक नए क्रांतिकारी दृष्टिकोण की जरूरत है।
 
भारत को स्वास्थ्य जैसी बुनियादी व जरूरतमंद सेवाओं के लिए सकल घरेलू उत्पाद की दर में बढ़ोतरी करनी होगी। सरकार को नि:शुल्क दवाइयों के नाम पर केवल खानापूर्ति करने से बाज आना होगा। साथ ही यह ध्यान रखना होगा कि एम्बुलेंस के अभाव में किसी मरीज को अपने प्राण नहीं गंवाने पड़े। इसके लिए मजबूत जनबल की जरूरत है।
 
जनता को ऐसे प्रतिनिधि को चुनना होगा, जो स्वास्थ्य सेवा जैसी सुविधाओं को आमजन तक पहुंचाने का वायदा करे।
 

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