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रोशनी से क्यों डर रहे हैं जनाब : नाहिद आफरीन के बहाने

गरिमा संजय दुबे
हिंसा, भय और असुरक्षा से उपजी पहली प्रतिक्रया है। मनुष्य जब अपने आस पास फैली कलात्मक अभिव्यक्तियों से डरने लगे, तो यह विचार असुरक्षा और भय की पराकाष्ठा है। जब व्यक्ति संगीत जैसे दैवीय वरदान से भय खाने लगे तो क्या कहिएगा। मुझे अपने आस पास डरे हुए भयभीत लोगों की भीड़ ही दीखाई देती है, जो किसी न किसी तरह की हिंसा में लिप्त है। ध्यान दीजिए हिंसा केवल शारीरिक ही नहीं होती, इससे कहीं आगे यह मानसिक और अवचेतन के स्तर पर भी होती है।
आप असुरक्षित हैं, क्योंकि आपको लगता है कि आपकी योग्यता में इतना सामर्थ्य नहीं है जो सही तरीके से अपनी जगह बना सके। आप डरे हुए हैं कि बिना शोर मचाए आपकी उपस्तिथि प्रभाव नहीं डाल सकती। आप भयभीत हैं कि बिना जोर से बोले आपकी आवाज सुनी नहीं जाएगी।
 
हां आप भयभीत हैं जो हर छोटी से छोटी बात आपको अपने अस्तित्व पर मंडराते संकट की तरह लगती है और आप निकाल लेते हैं फतवों की तलवारें। कहते हैं जो हर बात पर शोर मचाते हैं उनका शोर बेमानी हो जाता है। अधिक बोलने वालों की बातों को लोग गंभीरता से नहीं लेते। हद है, संगीत... जो कि किसी भी धर्म की सीमाओं से परे है उसके गाने पर नाहिद को फतवों का डर दिखा आप उसे नहीं डरा रहें हैं, बल्कि अपनी असुरक्षा का प्रदर्शन कर रहें है।
 
शुक्र है आप तब नहीं हुए जब संगीत के घरानों से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को अनंत ऊचाईयां देने वालों के नाम के डंके बजा करते थे, शुक्र है आप जैसी मानसिकता ने हिंदी रजत पटल के चमकदार सितारों के खिलाफ फतवे जारी नहीं किए, गायक, संगीतकार, अदाकार हो या अदाकारा लंबी श्रृंखला है जिसे कभी किसी से भय नहीं लगा। 
 
आज क्या कारण है कि आप कभी धाकड़ गर्ल के खि‍लाफ तो कभी नाहिद के खिलाफ फतवे जारी कर देते हैं। फतवे भारत की संस्कृति का हिस्सा नहीं है जनाब ।  मौसिकी तो खुदा की इबादत का नायाब तरीका है। नहीं आप मौसिकी से नहीं डर रहें हैं, आप को हौव्वा का डर है। आदम की छटी पसली से पैदा होने वाली दोयम दर्जे की हौव्वा कैसे इबादत कर सकती है। वह शरीके हयात तो हो सकती है शरीके इबादत नहीं। आप उस तरक्की पसंद अवाम से खौफजदा हैं, जो अब और दहशत और अंधेरे में रहने से इनकार कर रही है। रोशनी से डरने वाले मुल्कों के हालात देखिए, अपने ही अस्तित्व को खत्म करने पर आमादा है।  
 
अपने खुद के डर और असुरक्षा से बाहर निकलिए, सबके साथ चलने का साहस दिखाईए... खुदा के नूर से रोशन अपने जमीर की रोशनी को फैलाइए। रोशनी की तरफ हाथ तो बढ़ाइए, फिर देखिए कैसे सारा हिंदुस्तान आपको अपने साथ खड़ा नजर आएगा। लेकिन शुरुवात आपको ही करनी होगी जनाब।
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