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होली, सबूत गैंग के साथ

शरद सिंगी
बुधवार, 20 मार्च 2019 (23:41 IST)
हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी हम होली पर हाथ में विभिन्न रंगों की गुलाल की थैलियां लेकर घर से बाहर निकले। अपने शहर और देश की परंपरा के अनुसार हमें तो हर उस शख्स का होली-अभिनंदन करना था, जो भी मार्ग में मिलना था।
 
दुर्भाग्य हमारा कि इस उत्सव के मौके पर हम कुछ ऐसे नेताओं से टकरा गए जिन पर 'सबूत का भूत' सवार था। हम मार्ग पर आगे बढ़े ही थे कि जिन सबसे पहले नेता ने मुलाकात हुई उन्होंने खबरदार करते हुए हमसे पूछा कि गुलाल लगाने से पहले सबूत दो जी कि यह गुलाल ही है? हमने अपनी जेब से सुपर-मार्किट का बिल निकाला। होली के सामान की सूची में गुलाल का उल्लेख दिखाया। उसका नंबर थैली पर पड़े बार कोड के नंबर से मिलाया फिर पूछा अब भी आपको कोई शक है? वे बोले- जी! हमें तो पहले भी कोई शक नहीं था किंतु जनता को दिखाने के लिए यह जांचना जरूरी था कि हमने गुलाल ही लगवाई है। एक बड़ी साजिश के तहत यहां तो हर एक राजनीतिक दल (अंदर से) एक दूसरे से मिला हुआ है, जी। किंतु अफ़सोस अपने साथ हमें कोई नहीं मिला रहा है, जी।
 
अगले मोड़ पर सफ़ेद बाल वाले एक बड़े वकील साहब से मुलाकात हो गई। उनकी पकी उम्र और अनुभवों का आदर करते हुए जब बड़ी विनम्रता के साथ हमने उन्हें गुलाल लगाना चाहा तो वे अकड़ कर बोले सबूत दो कि आज होली है। हमने तुरंत उन्हें कैलेंडर दिखाया तो बोले ठीक है किंतु यह भी सबूत दो कि भक्त प्रह्लाद को होलिका ने ही अग्नि में जलने से बचाया था जिसके जश्न में तुम रंग उड़ा रहे हो? कोई साक्ष्य है क्या तुम्हारे पास।  
 
हमने कहा- सर! ये भरतवंशियों की आस्था है और इस त्योहार को हम सदियों से इसी रूप में मनाते आए हैं।  वकील साहब ने गुर्राकर कहा, आपको मालूम होना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट आस्था से नहीं गवाही से चलता है। हमने कहा सर! चलिए सुप्रीम कोर्ट से ही चलकर पूछ लेते हैं? 
 
वकील साहब बोले ये उचित समय नहीं है, सुनवाई का। हम सुप्रीम कोर्ट से दरखास्त करेंगे कि चुनाव के समय इस तरह की किसी याचिका या सुनवाई को स्वीकार नहीं की जाए। सो, हम मायूस होकर आगे बढ़ गए। 
 
अगली चौपाल पर हमें फिर एक बड़े नेता के दर्शन हुए। अपने क्रांतिकारी विचारों के जरिए अपने ही दल के विरुद्ध मीडिया को मसाला देने के लिए वे प्रसिद्ध हैं? जब हमने उन्हें गुलाल लगवाने का अनुरोध किया तो वे बोले- इनमें से कुछ रंग साम्प्रदायिकता के प्रतीक हैं। मैं इन रंगों को नहीं लगवा सकता। तुम चुनावी समय पर ये रंग लगाकर मेरी धर्मनिरपेक्ष छवि क्यों बिगाड़ना चाहते हो। ये विरोधियों की चाल लगती है। सबूत दो कि तुम्हें विरोधियों ने मेरे पास तो नहीं भेजा है। 
 
मैंने पूछा सर आपने तो दो शादियां की हैं। जब अग्नि को साक्षी मानकर शादियां की थीं तो अग्नि से उसका रंग पूछा था क्या? अग्नि को साक्षी मानने से ही आपकी शादियों को वैधानिक मान्यता मिली थी? और तो और श्रीमान हमारे तिरंगे में भी तो तीन रंग हैं। क्या हमारा झंडा भी सांप्रदायिक है? और हमारे राष्ट्रपति भवन का रंग? किंतु उनके चेहरे के हाव-भाव देखकर हमें ही खिन्न होकर आगे बढ़ जाना पड़ा।
 
अभी मैं और आगे बढ़ता उससे पहले ही मेरे हाथ में मुरझाए से पड़े रंगों ने मुझसे सवाल किया- ए भाई! अब किधर जा रहे हो। तुम्हारी अपनी तो कोई इज्जत है नहीं, हमारी इज्जत से क्यों खेल रहे हो। आज तक तो कभी हमने तुमसे नहीं पूछा कि तुम हमें किसके मस्तक पर लगा रहे हो? 
 
दुनिया को रंग-बिरंगी बनाकर इस सृष्टि की सुंदरता बढ़ाने वाले हम रंगों में साम्प्रदायिकता का जहर मिलाने वाले ओ मनुष्यों क्या तुम इस रंग-बिरंगी दुनिया में रहने के काबिल हो? तुम तो श्वेत-श्याम दुनिया के अधिकारी भी नहीं हो। मैं सोचने को विवश था। मैंने अपने हाथ के सारे रंग हवा में उछाल दिए और उस रंगों के गुबार के नीचे खड़ा होकर सोचने लगा कि शायद मुझसे बेहतर इन रंगो का कोई और अधिकारी नहीं।

रंगों को सांप्रदायिक बताने वाले लोग, हमारे नेता नहीं हो सकते। हमारी आस्था पर प्रश्न लगाने वाले नेता, हमारे सम्मान के अधिकारी नहीं हो सकते और न ही वे नेता आदर योग्य हैं जो मौका देखकर रंग और टोपी बदलने का ड्रामा करते रहते हैं। हम अपने भाग्य विधाता स्वयं हैं। प्रण कर रहा हूं कि अब अपने रंगों का चुनाव भी मैं ही करूंगा और उन्हें लगाने के लिए उपयुक्त मस्तक का भी।

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