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जाने वो कौन सा देश, जहां तुम चले गए.....

स्मृति आदित्य
कैसा लगता है जब एक मखमली अहसास कानों के रास्ते रूह के भीतर तक बहने लगता है। यही अहसास जगजीत जी ने उन श्रोताओं तक पहुंचाया जो कान के पक्के और संगीत के सच्चे हैं। उन्हें हमसे बिछड़े हुए साल बढ़ते जा रहे हैं पर वह करीब और करीब आते जा रहे हैं....


मुझे याद आ रही है उज्जैन की वह शाम जब जगजीत सिंह एक कार्यक्रम के लिए पधारे थे। लेकिन बारिश की वजह से मंच खराब हो गया और जगजीत जी का मूड ऑफ हो गया। उन्हें मनाने की कवायदें चलती रही लेकिन वे अपने कमरे से बाहर नहीं निकले। जगजीत सिंह की दीवानी अपनी दोनों मौसियों (अलका व्यास/दिव्या व्यास) के साथ होटल में ही हम परेशान हो रही थींं, काश, बस एक झलक मिल जाए। 
 
तभी मुझे उनके लिए गर्म पानी ट्रे में लेकर जाता हुआ वेटर दिखाई पड़ा। ना जाने हम तीनों के दिमाग ने उस शाम इतनी तेजी से काम कैसे किया। अलका मौसी के पास वह डायरी थी, जिसमें उनकी गाई लगभग सारी गजलें लिखी हुई थी। हमने उस जर्जर डायरी का पहला पन्ना फाड़ा और कांपते हाथों से मैंने उस पर लिखा '' आदरणीय, आपको देखने की अनुभूति की व्याख्या नहीं की जा सकती क्योंकि व्याख्या कभी भी उतनी गहरी नहीं हो सकती जितनी कि अनुभूति। हम छोटे शहर के आपके बड़े प्रशंसक हैं क्या सिर्फ एक बार आप हमसे मिलेंगे। समस्त गहनतम भावनाओं के साथ, आपके प्रशंसक।'' 
 
तुरंत वह फटा पन्ना उस प्लास्टिक जग के साथ ट्रे में रखा और वेटर से कहा बस, ये कागज उन्हें दे देना। साथ में डायरी भी रख दी । वेटर घबराया सा लगा' देखिए, अगर वे नाराज हो गए तो...! हमने कहा कोशिश तो करो। 
 
मैं नहीं जानती वह सुंदर अक्षरों का जादू था या मन से निकली गहरी भावनाएं या जगजीत जी की सहजता। वेटर लगभग चिल्लाती हुई आवाज में दरवाजा खोल कर बाहर आया तो हम सबके दिल धड़क रहे थे। उसने कहा पन्ना किसने भेजा था, सर बुला रहे हैं। 
 
हमारी तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। जब हम कमरे में दाखिल हुए तो नीले कंबल को पैरों पर फैलाए पलंग पर सुरों के साक्षात सम्राट को देखकर नि:शब्द हो गए। बरबस ही हाथ उनके पैरों को छुने के लिए पहुंच गए। 
 
उनके पहले शब्द थे कागज आप ने भेजा है? हम तीनों ने एक साथ गर्दन हिलाई थी। फिर उनकी गहन आवाज में प्रश्न था, यह क्या किया अभी आपने? मैं किसी तरह शब्द ठेल पाई थी, जी ... वो पैर छुए थे। 
 
वे मुस्कुरा दिए थे। '' कहां छुए पैर? आपने तो कंबल छुआ है।'' उसके बाद तो माहौल हल्का हो गया। मौसी (दिव्या सक्सेना) ने साथ लाए आमंत्रण पत्र पर ऑटोग्राफ लिए। बड़ी मौसी (अलका व्यास) ने डायरी उनके हाथों में दी तो उन्होंने इतने प्यार और ध्यान से देखा कि मामूली नुक्ते वाली गलतियां भी लगे हाथ सुधार दी। वह शाम हमारी स्मृतियों में सुनहरे शब्दों के साथ आज भी टंकी है। 
 
दूसरे दिन जगजीत जी ने अपना कार्यक्रम पेश किया और हम सभी उज्जैनवासियों की पसंद की गजलें भी पेश की। करोड़ों श्रोताओं को अपनी मीठी आवाज के साथ अकेला छोड़ गए हैं जगजीत सिंह। एक चिर खामोशी के साथ जगजीत जी अनं‍त यात्रा पर निकल गए तो उन्हीं की आवाज में गूंजता हैं हर दिन ... चिट्ठी ना कोई संदेस, जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गए.... 
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