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मेरा कसूर क्या है?

संजय वर्मा 'दृष्ट‍ि'
- संजय वर्मा 'दृष्टी', मनावर

बुजुर्गों का आशीर्वाद, सलाह सदैव काम आती है। ये शायद उनके अनुभव का ऐसा अनमोल खजाना होता है, जिनको पीढ़ी दर पीढ़ी एक-दूसरे को देते है। कुछ लोग उनकी नेक सलाह को ठीक तरीके समझ से नहीं पाते या उनका ध्यान कहीं और रहता है। चित्त को स्थिर रखना अपनी सोच को सही लक्ष्य दिलाता है। यही बातें स्कूल में मास्टरजी भी बताते थे। 
 
अक्सर कई बार ऐसा हो जाता है की सामने वाला क्या सोच रहा है या फिर हम उसी अंदाज में उसे देख रहे है, मगर उसके बारे में सोच नहीं रहे है यानि ध्यान कही और है। ऐसे में सामने वाला कोई नई बात सोच लेता है। बात को पहले समझे बगैर दूसरों को कह देना।

एक बाबूजी ने साहब के बंगले पर जाकर बाहर खड़े नौकर से पूछा साहब कहां है? उसने कहा- गए यानी उसका मतलब था कि साहब मीटिंग में बाहर गए। बाबूजी ने ऑफिस में कह दिया की साहब गए इस तरह उड़ती-उड़ती खबर ने जोर पकड़ लिया। कोई माला, सूखी तुलसी, टॉवेल आदि लेकर साहब के घर के सामने पेड़ की छाया में बैठ गए। 
 
घर पर रोने की आवाज भी नहीं आ रही थी। सबने खिड़की में से झांक कर देखा। कोई लेटा हुआ है, उस पर सफेद चादर ढंकी हुई थी। सब गए और साथ लाए फूलों को उनके ऊपर डाल दिया। वजन के कारण सोए हुए आदमी की आंखे खुल गई। मालूम हुआ कि वो तो साहब के भाई थे, जो उनसे मिलने बाहर गांव से रात को आए थे। 
सब लोग असमंजस में थे कि बाबूजी को नौकर ने बात समझे बगैर सही तरीके से नहीं की। इसमें बाबूजी का कसूर नहीं था। कुछ दिनों बाद बाबूजी रिटायर होकर अपने गांव चले गए। गांव में उन्हें वहां के लोग नान्या अंकल कह कर पुकारते थे। गांव में रिवाज होता है कि मेहमान यदि किसी के भी हो, अपने लगते है। गांव में उन्हें अपने घर भी बुलाते है फिर मेजवान को भी उनके परिचय हेतु बुलवा लेते है। 
 
एक वाक्या याद आता है कि गर्मी की छुट्टियों में मेहमान आए, बुरा न लगे इसलिए सामने वाले अंकल जो की बाहर खड़े थे, जिन्होंने ही हमारे घर का पता मेहमानों के पूछने पर बताया था, को भी गर्मी के मौसम में ठंडा पिलाने हेतु पप्पू को दौड़ा दिया, कहा कि- 'जा जल्दी से नान्या अंकल को बुला ला।' मेहमान कहां से आए की रोचकता समझने एवं आमंत्रण कि खबर पाकर वो इतना सम्मानित हुए जितना की कवि या शायर कविता/गजल पर दाद बतोर तालियां और वाह-वाह के सम्मान से जैसे नवाजा गया हो। 
 
बात कर रहे थे ठंडा पीने की..., जैसे ही नान्या अंकल को मेहमानों के सामने भाभीजी ने नींबू का शरबत दिया। शरबत का गिलास होठों से लगाया तो नान्या अंकल कि आंख दब गई। कसूर आंख का नहीं था। सोच शायद महंगाई के मारे शक्कर के भाव बढ़ गए हो इसलिए शक्कर ही कम डाली हो। दूसरा घूंट भरा तो फिर आंख दब गई। तब सभी ने देखा और मन ही मन कहा कि- शर्मो हया की भी हद होती हैं। 
 
नान्या अंकल ने कहा- भाई शरबत बहुत ही खट्टा है, पीने से मेरे दांतों को बहुत तकलीफ होती है। खटाई ज्यादा होने पर तो हर किसी की आंख दब ही जाती है ना। मेरी नजर तो पहले ही कमजोर है। जरा इमली को ही लीजिए, इमली का नाम सुनने पर या चूसने पर सामने वाले के मुंह में भी पानी आ जाता है और जम्हाई लोगे तो सामने वाला भी मुंह फाड़ने लग जाता है। कई लोग महत्वपूर्ण मीटिंगों में आपको सोते या जम्हाई लेते मिल ही जाएंगे। ऐसा शरीर में क्यों होता है, यह मैं नहीं जानता। जो आप सोच रहे हो और यह भी नहीं जानता की मेरा कसूर क्या है?
 

 


कई सालों बाद वही मेहमान फिर गांव में आए तो उन्होंने नान्या अंकल को देखा जो कि ज्यादा बूढे़ हो गए थे लेकिन अपने विचारों पर अडिग थे। उनकी नजरें भी कमजोर हो गई, किन्तु सामने वाले मेहमानों ने उन्हें पहचान ही लिया। वे एक-दूसरे के कानों में खुसर-पुसर कर कहने लगे यही तो है अंकल। उन्होंने सोचा कि शायद उस समय हमसे ही कोई समझने की भूल हो गई हो, क्षमा मांगने का और मन की बात कहने का यही मौका है। 
 
सभी ने नमस्कार कर पूछा की अंकल हमें पहचाना? नान्या अंकल लकड़ी के सहारे चलकर बूढ़ी आंखों से देखकर नजदीक आकर कहा- बेटा मुझे दूर से कोई दिखाई नहीं देता। वे बहुत पास आकर देखने लगे। इतने में फिर से आंख दब गई, अब कसूर खटाई का नहीं था बल्कि हवा के झोंकों का था जो धूलभरी आंधी के साथ तिनके को धूल के कणों के साथ उड़कर लाया था, जो उड़कर नान्या अंकल की आंखों मे सीधे जा घुसे थे। मौसम के मिजाज जो अक्सर गर्मियों के दिनों में धूल भरी आंधी चलती है, को मेहमान समझ नहीं पाए। नान्या अंकल भी सामने वाले को समझा नहीं पाए और ना ही मेहमानों ने सही बात को ठीक तरीके से समझने की कोशिश की।  
 
नान्या अंकल मन ही मन सोच रहे थे कि आखिर मेरा क्या कसूर है? जो मैं कह रहा हूं ये उसे समझ नहीं पा रहे है। उधर रेडियो पर मौसम की भविष्यवाणी हो रही थी की मौसम आज खराब रहेगा मगर ये समझ नहीं रहे थे और रेडियो गाने भी बजा रहा था कि- 'इन आंखों की मस्ती के दीवाने हजारों है... मगर फिर भी नहीं समझ पा रहे थे कि क्या रेडियो भी इन पर कटाक्ष कर सकता है। 
 
अब नान्या अंकल चुप थे और मेहमान असमंजस में थे, वे अब सोचने लगे कि- अब कसूर किसका है? नान्या अंकल को भी अचरज हुआ और बुरा भी लगा। चलते समय कुर्सी की ठोकर लगी और गिरने लगे तभी मेहमानों ने उन्हें संभाल लिया व सभी ने कहा- अंकल कहा जा रहे हो, उन्होंने कहा कि बच्चों, मैं अपना चश्मा लेने घर जा रहा हूं और मन ही मन सोचने लगे की मेरा क्या कसूर है? ये लोग वाकई ना समझ है जो बुजुर्गों की बातों को ठीक तरीके से नहीं समझते। 


 
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