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शिक्षा से जुड़े सवालों के मायने

ललि‍त गर्ग
ललित गर्ग
नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने तब से एक नए युग के आरंभ की बात कही जा रही है। न जाने कितनी आशाएं, उम्मीदें और विकास की कल्पनाएं संजोई गई  हैं और उन पर न केवल देशवासियों की बल्कि समूचे विश्व की निगाहें टिकी हुई है।




हाल ही में देश के विकास में तेजी की संभावनाओं वाले दावों के बीच संयुक्त राष्ट्र की शिक्षा की धीमी गति को उजागर करती एक रिपोर्ट ने वर्तमान सरकार को चेताया है। न केवल चेताया है बल्कि सरकार को शिक्षा के लक्ष्य को लेकर गंभीर होने को भी प्रेरित किया है। शिक्षा की उपेक्षा करके कहीं हम विकास का सही अर्थ ही न खो दे। ऐसा न हो जाए कि बस्तियां बसती रहे और आदमी उजड़ता चला जाए। 
 
संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट खास मायने रखती है कि भारत 2030 तक सबको शिक्षा देने के लक्ष्य से काफी पीछे रह जाने वाला है। हाल ही में जारी हुई यह रिपोर्ट बताती है कि इस दिशा में जारी प्रयास अगर पूर्ववत बने रहे, तो हम इस टारगेट से 50 साल पीछे छूट जाएंगे। इसके हिसाब से देश सबको प्राथमिक शिक्षा 2050 तक ही दिला पाएगा।

सबको सेकेंडरी स्तर तक की शिक्षा दिलाना 2060 तक संभव होगा और अपर सेकेंडरी स्तर तक की शिक्षा का लक्ष्य 2085 से पहले मुमकिन नहीं हो पाएगा। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा तब होता है जब हम याद करते हैं कि हमारी सरकार ने 2015 में बड़े आत्मविश्वास के साथ संयुक्त राष्ट्र के उस टिकाऊ विकास लक्ष्य (सस्टेनेबल डिवलपमेंट गोल्स) को 2030 तक हासिल करने के संकल्प पर हस्ताक्षर किए थे जिसका एक हिस्सा सबके लिए अच्छी शिक्षा का लक्ष्य सुनिश्चित करना भी था। कुल मिलाकर अभी तक शिक्षित और साक्षर भारत के स्वप्न को फलीभूत करने के लिए कोई भी ठोस कदम उठते हुए नहीं दिख रहा है।
 
आज भी देश में छह करोड़ बच्चे ऐसे हैं जिन्हें शिक्षा नाममात्र ही मिलती है। प्राथमिक स्तर पर स्कूल से वंचित बच्चों की संख्या यह 1 करोड़ 11 लाख है जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। अपर सेकेंडरी स्तर पर शिक्षा संस्थानों से बाहर रहने वालों की संख्या तो साढ़े चार करोड़ से ज्यादा है। जब हमने टिकाऊ विकास लक्ष्य को स्वीकार किया था, उसी समय से यह स्पष्ट था कि हमें इस दिशा में विशेष प्रयास करने पड़ेंगे और इसके लिए संपूर्ण भारत को साक्षर बनाने के लक्ष्य को हासिल करना प्राथमिकता होनी चाहिए। मगर सरकार की दिलचस्पी टिकाऊ विकास में शायद उतनी नहीं है, जितनी आर्थिक विकास की रफ्तार बढ़ाने में। यह सही है कि तेज आर्थिक विकास के बगैर हम गरीबी, बेरोजगारी, चिकित्सा, महंगाई जैसी मूलभूत समस्याओं से पीछा छुड़ाने की सोच भी नहीं रख पाएंगे। 
 
सरकार सालों से भारत में साक्षरता अभियान चला रही है और उस पर होने वाले खर्च की खूब चर्चा भी करती आई है। लेकिन इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में सबसे ज्यादा निरक्षर वयस्क भारत में हैं। 
 
एक अन्य रिपोर्ट ‘एजुकेशन फॉर ऑल ग्लोबल मॉनिटरिंग’ में बताया गया है कि 1991 से 2006 के बीच भारत में साक्षरता दर 48 फीसदी से बढ़ कर 63 हो गई  है। लेकिन जनसंख्या वृद्धि के कारण यह बदलाव दिखाई ही नहीं दिया और कुल निरक्षर वयस्कों की संख्या में भी कोई बदलाव नहीं हुआ। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में अमीर और गरीब में बहुत ज्यादा फासला है, जिसका असर शिक्षा पर भी देखने को मिल रहा है। एक तरफ उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुकी महिलाएं हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाई है, तो दूसरी ओर ऐसे लाखों बच्चे हैं जिन्हें शिक्षा का मूल अधिकार भी नहीं मिल पा रहा है। इस रिपोर्ट के लिए भारत समेत कई देशों में स्कूलों का दौरा किया गया और यह जानने की कोशिश की गई कि बच्चों का स्तर कैसा है। भारत में किए गए अध्ययनों में पाया गया कि शिक्षा की गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखा जाता। इस कारण चार में से एक बच्चा एक भी वाक्य पूरी तरह नहीं पढ़ सकता।
 
भारत में शिक्षा की स्थिति चिंतनीय है। उत्तर प्रदेश में अमीर परिवारों के लगभग सभी बच्चे आराम से पांचवीं कक्षा तक स्कूल जाते हैं, जबकि गरीब परिवारों के 70 फीसदी बच्चे ही ऐसा कर पाते हैं। इसी तरह मध्य प्रदेश में अमीर परिवारों के तो 96 फीसदी बच्चे प्राथमिक शिक्षा पूरी कर लेते हैं लेकिन गरीब परिवारों के 85 फीसदी बच्चे ही पांचवीं तक पहुंचते हैं। हालांकि स्कूल में होने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें ठीक से शिक्षा भी मिल रही है। जब इन बच्चों को गणित के सवाल दिए गए तो पाया गया कि पांच में से केवल एक ही छात्र सही जवाब देने की हालत में था। रिपोर्ट में कहा गया है कि जो बच्चे ठीक से पढ़ नहीं पाते हैं उनकी जल्द ही स्कूल छोड़ देने की भी अधिक संभावना होती है। साथ ही गरीब राज्यों में परिणाम ज्यादा बुरे पाए गए। न केवल प्राथमिक बल्कि सेकेंडरी एवं उच्चस्तरीय कक्षाओं में भी शिक्षा का गुणवत्ता स्तर कमजोर है। यही कारण है कि देश में सात करोड़ से ज्यादा छात्र कोचिंग या निजी ट्यूशन का सहारा लेते हैं। यह कुल छात्रों की तादाद का लगभग 26 फीसदी है। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट ने देश में शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल खड़े किए हैं। इससे साफ है कि स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई का स्तर ठीक नहीं है। इस रिपोर्ट ने कोचिंग के तौर पर देश में चल रही समानांतर शिक्षा व्यवस्था से भी पर्दा उठा दिया है। 
 
मौजूदा केंद्र सरकार ने सत्ता में आने से पहले शिक्षा जैसे जरूरी मुद्दे पर कई सारे वादे किए थे। सत्ता में आने के बाद यह सारे वादे उदासीनता के पिटारे में बंद रहे। सरकार पर शिक्षा बजट में कटौती, उच्च शिक्षा का बाजारीकरण, संस्थानों में दखलंदाजी, शोध छात्रों की स्कालरशिप और एक ही विचारधारा के लोगों के प्रभाव में काम करने और उनके अनुकूल फैसले लेने का आरोप लगते रहे। दरअसल मोदी सरकार के कार्यकाल में शिक्षा के अहम सवाल या तो गायब हो गए या तो उन पर ध्यान नहीं दिया गया। सत्र 2014-15 में शिक्षा का कुल बजट 82,771 करोड़ रूपए का था जिसे अगले सत्र 2015-16 में घटाकर 69,707 करोड़ कर दिया गया।
 
यानी एक वित्तीय वर्ष में शिक्षा बजट में 13,064 करोड़ की कटौती कर दी गई यानी कुल बजट का करीब 16.5 प्रतिशत। करोड़ों छात्रों को देश की बुनियादी शिक्षा उपलब्ध कराने वाले सर्वशिक्षा अभियान में 2375 करोड़ की कटौती की गई। मिड डे मील योजना में भी करीब 4000 करोड़ की कटौती की गई। माध्यमिक शिक्षा में भी 85 करोड़ की कटौती की गई। देश की शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद इन्ही प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के कन्धों पर टिकी हुई है। शौचालय, पक्की छत, डेस्क बेंच, लैब और किताबों के बगैर हम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उम्मीद नहीं कर सकते। शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 को लागू हुए 6 साल से अधिक हो चुके हैं लेकिन अब भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। सरकारी स्कूलों में करीब 6 लाख शिक्षकों के पद अब भी रिक्त हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि राज्यों की स्थिति और भी दयनीय है। 
 
भारत में जो शिक्षा पद्धति प्रचलित है, उसके कई पक्षों में सुधार की आवश्यकता है। हमारी शिक्षा व्यवस्था पर एक वृहद जनसमूह को शिक्षित करने का उत्तरदायित्व है। साधन और संसाधन बहुत सीमित हैं, परिस्थितियां भी अनुकूल नहीं, फिर भी हम लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर प्रयत्नशील होना ही होगा। हमें दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा तभी इस निराशाजनक स्थिति से उभर सकते हैं। ’सबके लिए शिक्षा’ का लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकारी तंत्रों के साथ स्वयंसेवी और सामाजिक संगठनों को भी जोड़ना होगा। स्वतंत्रता के बाद हमने सबके लिए शिक्षा प्राप्ति पर तो ध्यान दिया, पर सबके लिए समान गुणवत्ता वाली शिक्षा का लक्ष्य अभी भी कोसों दूर है। निजी और सरकारी स्कूलों में उपलब्ध संसाधन और सुविधाओं एवं प्रदान की जा रही शिक्षा की गुणवत्ता में व्यापक अंतर मौजूद है। भारत देश में यह संभव तो नहीं कि सबको निजी स्कूलों जैसी सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा सकें, परंतु इस दिशा में प्रयास तो अवश्य होना चाहिए कि सभी को समान शिक्षा के अंतर्गत अच्छी शिक्षा को कम खर्चीला बनाकर उपलब्ध कराया जाए। अगर हम यह लक्ष्य लेकर चल रहे हैं कि सबके लिए शिक्षा हो तो यह लक्ष्य परंपरागत संस्थागत शिक्षा पद्धति के माध्यम से प्राप्त नहीं हो सकता। इसके लिए शिक्षा के अन्य विकल्प जनसामान्य को उपलब्ध करवाना होंगे। हर व्यक्ति तक शिक्षा पहुंचाने का लक्ष्य चुनौतीभरा है, लेकिन असंभव नहीं है। 
 
बात तीन साल पहले की है। जापान में एक ट्रेन कंपनी को जब लगा कि उनकी एक ट्रेन दूर के एक स्टेशन तक जाती है लेकिन वहां के लिए सिर्फ एक ही सवारी जाती है, तो क्यों न इसे बंद कर दिया जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और उस एक व्यक्ति के लिये पूरी ट्रेन उस स्टेशन तक जाती रही। शिक्षा की ट्रेन को हर व्यक्ति तक, अंति‍म व्यक्ति तक पहुंचाना है। अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों समय के आलेख हैं। अतीत हमारे जीए गए अनुभवों का निचोड़ है। वर्तमान संकल्प है नया दायित्व ओढ़ लक्ष्य की चुनौतियों को झेलने की तैयारी का और भविष्य एक सफल प्रयत्न है नयी भोर की अगवानी में दरवाजा खोल संभावनाओं की पदचाप पहचानने का। यही वह क्षण जिसकी हमें प्रतीक्षा थी और यही वह सोच है जिसका आह्वान है अभी और इसी क्षण शिक्षा के लक्ष्यों को हासिल करने का, क्योंकि हमारा भविष्य शिक्षा के हाथों में है। 
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