Hanuman Chalisa

ओ मानस के राजहंस…

मनोज लिमये
'भेज रहे हैं स्नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हे बुलाने को, ओ मानस के राजहंस तुम भूल न जाना आने को'।  इन स्नेह युक्त गुलकंद में भीगी पंक्तियों से मैं बचपन से ही प्रभावित रहा हूं।  शादी-ब्याव के अवसरों पर शादी करने की प्रक्रिया तथा भोजन के व्यवथापन में चाहे आमूलचूल परिवर्तन आए हों, किंतु आज भी परिचितों को  बुलाने हेतु उन्हीं परंपरावादी पद्धतियों सह पंक्तियों पर निर्भरता बनी हुई है। 
भोजन प्रेमी होने के कारण मैं इन स्नेह निमंत्रणों को स्वीकारता आया हूं, किंतु हिंदी प्रेमी होने के नाते यह टीस सदा से मन में है कि हिंदी इतनी समृद्ध भाषा होने के बावजूद ये मानस का राजहंस, पिछले 40-50 सालों से अनवरत क्यों उड़ता जा रहा है? शादियों के निमंत्रण पत्रों में विलासिता पराकाष्टा पर है, किंतु भाषाई स्तर वहीं ठहरा हुआ है।
 
दादा-दादी तथा नाना-नानी के असीम प्रताप से अपना भरा-पूरा परिवार है। वर्ष में एकाध शादी तो घर-परिवार में ही निकल आती है, सो शादियों के निमंत्रण पत्रों के मामले में अपनी आत्मनिर्भरता है। मोहल्ले तथा दफ्तर के परिचय से वैसे भी निमंत्रण पत्रों पर अपना दबदबा काबिज है। जहां एक और शादी के निमंत्रण कार्ड देख मन प्रसन्न होता है वहीं दूसरी और निमंत्रण हेतु चयनित की गई सनातन पंक्तियां देखकर हिंदी भाषा के पिछड़ेपन हेतु मन व्यथित हो जाता है। सबसे ऊपर वो ही चिर– परिचित' हमारे कुलदेवता की असीम कृपा वाली पंक्तियां, फिर ज्येष्ठ और कनिष्ठ पुत्र-पुत्रियों का ब्यौरा, उसके नीचे दर्शनाभिलाषी या विनीत टाईप का सर्व साधारण निवेदन तथा सबसे नीचे की और "जलूल-जलूल आना" वाली मासूम बाल मनुहार।
 
अब आप ही बताइए, जिस देश में संस्कृति ने इतनी तीव्रता के साथ करवट ली हो, उस देश में इस प्रकार के घिसे-पि‍टे भाषाई निमंत्रण-पत्र देख किसे दुख नहीं होगा। हालांकि कुछ भाषा प्रेमियों तथा दर्दियों ने इस दिशा में कुछ प्रयास किए हैं। स्वरुचि भोज का समय अब शाम 7 बजे से आपके आगमन से प्रगति करता हुआ सुहानी शाम से ढलती रात तक पंहुचा है, परंतु फिर भी यह प्रयास नाकाफी प्रतीत हो रहे हैं। 
 
प्रगतिशील लेखनवादियों तथा हिंदी भाषा के प्रति संवेदनशील सोच रखने वालों के लिए यह कुछ कर गुजरने का समय है। कुछ आधुनिक लोगों ने निमंत्रण पत्र से मानस का राजहंस भले उड़ा दिया हो, किंतु उसके स्थान पर कोई नया साहित्यिक पराक्रम अभी भी नहीं किया जा सका है।
 
शादियों के दौरान किए जाने वाले प्रत्येक क्रियाकलाप में जब आमूलचूल परिवर्तन हुआ है, तो निमंत्रण पत्र के साथ किया जा रहा ये से सौतेला व्यवहार समझ परे है। गर्मियों की छुट्टियों में क्रेश कोर्स आयोजित करने वाले संस्थान यदि ध्यान दें तो असीम संभावनाओं वाला द्वार उनके समक्ष है। आधुनिक तरह से निमंत्रण कार्ड कैसे बनाएं या अपने निमंत्रण कार्ड को स्पेशल कैसे बनाएं जैसे लुभावने विज्ञापनों से यदि आगामी समय में बाजार पटा हुआ दिखाई दे तो इसमें विस्मय नहीं होना चाहिए।
 
शादियों के निमंत्रण पत्रों के भौतिक आवरण ने चरण दर चरण प्रगति की है किंतु इन निमंत्रण पत्रों की साहित्यिक प्रगति अभी भी विचाराधीन है। लोग परिचितों को दिखाने हेतु महंगे निमंत्रण पत्र संधारित कर रहे हैं। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि वो समय अवश्य आएगा जब ये निमंत्रण पत्र भाषाई रूप से समृद्ध होने की वजह से संभाल कर रखे जाएंगे। अन्यथा लोग घरों में यही कहते रहेंगे कि 'देखो कितना फोकट पैसा है इनके पास, जितने का निमंत्रण कार्ड है उतने पैसों में तो किसी गरीब के घर शादी हो जाए"...
Show comments
सभी देखें

जरुर पढ़ें

Morning Routine: सुबह उठते ही सबसे पहले करें ये 1 काम, दिनभर रहेंगे ऊर्जा से भरपूर

10 Health benefits of Sattu: सत्तू के सेवन से सेहत को मिलेंगे ये 10 फायदे

डॉक्टर बोले: रोज 10 मिनट चलने से कम हो सकती हैं ये बीमारियां

गर्मियों में धूप में निकलने से पहले बैग में रखें ये चीजें, लू और सन टेन से होगा बचाव

सुबह खाली पेट पानी पीने से शरीर में होते हैं ये 5 बड़े बदलाव

सभी देखें

नवीनतम

world malaria day: विश्व मलेरिया जागरूकता दिवस 2026: कारण, लक्षण और बचाव के उपाय

Desi ghee in diet: वजन बढ़ाता नहीं घटाता है घी! बस खाने का तरीका सही होना चाहिए

सत्य साईं बाबा: चमत्कार, सेवा और विश्वभर में प्रेम का संदेश

Sathya Sai Baba: सत्यसाईं बाबा की पुण्यतिथि पर जानें 5 अनसुने तथ्य

‘ज्यां क्रिस्टोफ’ को याद करते हुए जो किताबें याद आईं, जो गुम गई और जो पढ़ी जानी है

अगला लेख