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मौजूदा दौर और मोदी का जेपी स्मरण

अनिल जैन
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हमेशा की तरह इस बार भी जेपी यानी लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन पर उन्हें अपनी पार्टी का वैचारिक पुरखा बताने की कोशिश तो की ही, साथ ही अपनी पार्टी के एक दिवंगत नेता नानाजी देशमुख को भी जेपी की बराबरी में बैठाने का हास्यास्पद प्रयास किया। 
 
जेपी और देशमुख का जन्मदिन 11 अक्टूबर को पड़ता है। इस साल जेपी की 115वीं जयंती थी। प्रधानमंत्री ने देशमुख की याद में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए दोनों को एक पलड़े में रखते हुए कई बातें कीं। 
 
केंद्र सरकार से संबद्ध कई संस्थाओं और सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी ने भी जेपी की याद में कार्यक्रम आयोजित किए और अपने विचार पुरुषों में उनका शुमार करते हुए उन्हें आपातकाल विरोधी 'दूसरी आजादी’ के संघर्ष के महानायक के तौर पर याद किया। बेशक जेपी आपातकाल से पहले गुजरात और बिहार से शुरू हुए भ्रष्टाचार विरोधी छात्र आंदोलन और फिर आपातकाल विरोधी संघर्ष के महानायक थे। इस लड़ाई में दूसरे दलों के साथ जनसंघ (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी भागीदारी थी। 
 
जेपी इससे पहले 1942 में डॉ. राममनोहर लोहिया के साथ उस 'भारत छोड़ो’ आंदोलन के भी अप्रतिम नायक थे जिसमें संघ की कोई भागीदारी तो नहीं ही थी, बल्कि वह तो उस आंदोलन के ही खिलाफ था। यही वजह है कि आज सत्ता में बैठे लोग जब भी जेपी को याद करते हैं तो उन्हें आमतौर पर सिर्फ आपातकाल का ही संदर्भ याद रहता है। अपने अपराधबोध के चलते वे जेपी को याद करते हुए 'भारत छोड़ो’ आंदोलन का जिक्र नहीं करते।
 
बहरहाल, सवाल है कि जो लोग आज जेपी को याद कर रहे हैं, उनका जेपी के मूल्यों और आदर्शों से क्या जरा भी सरोकार है? आखिर आपातकाल के पहले गुजरात और बिहार में शुरू हुआ आंदोलन और आपातकाल विरोधी संघर्ष किन मूल्यों से प्रेरित था और सत्ता की किन प्रवृत्तियों के खिलाफ था? क्या लोकतंत्र का दमन और नागरिक आजादी का हरण करने वाली आपातकालीन प्रवृत्तियां फिर से सिर नहीं उठा रही हैं? क्या सत्ता संगठन में शीर्ष पदों पर बैठे लोग भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त हैं? 
 
इन सवालों को अगर हम अपनी राजनीतिक और संवैधानिक संस्थाओं के मौजूदा स्वरूप और संचालन संबंधी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम पाते हैं कि आज देश आपातकाल से भी कहीं ज्यादा बुरे दौर से गुजर रहा है। इंदिरा गांधी ने तो संवैधानिक प्रावधानों का सहारा लेकर देश पर आपातकाल थोपा था, लेकिन आज तो औपचारिक तौर पर आपातकाल लागू किए बगैर ही वह सब कुछ बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा हो रहा है, जो आपातकाल के दौरान हुआ था। फर्क सिर्फ इतना है कि आपातकाल के दौरान सब कुछ अनुशासन के नाम पर हुआ था और आज जो कुछ हो रहा है वह विकास और राष्ट्रवाद के नाम पर।
 
जहां तक राजनीतिक दलों का सवाल है, देश में इस समय सही मायनों में दो ही अखिल भारतीय पार्टियां हैं- कांग्रेस और भाजपा। कांग्रेस के खाते में तो आपातकाल लागू करने का पाप पहले से ही दर्ज है जिसका उसे आज भी कोई मलाल नहीं है। यही नहीं, उसकी अंदरुनी राजनीति में आज भी लोकतंत्र के प्रति कोई आग्रह दिखाई नहीं देता। पूरी पार्टी आज भी एक ही परिवार की परिक्रमा करती नजर आती है। 
 
दूसरी तरफ केंद्र सहित देश के लगभग आधे राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर भी हाल के वर्षों मे ऐसी प्रवृत्तियां मजबूत हुई हैं जिनका लोकतांत्रिक मूल्यों और कसौटियों से कोई सरोकार नहीं है। सरकार और पार्टी में सारी शक्तियां एक समूह के भी नहीं, बल्कि एक ही व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमटी हुई हैं।
 
आपातकाल के दौर में उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने चाटुकारिता और राजनीतिक बेहयाई की सारी सीमाएं लांघते हुए 'इंदिरा इज इंडिया- इंडिया इज इंदिरा’ का नारा पेश किया था। आज भाजपा में तो रविशंकर प्रसाद, शिवराज सिंह चौहान आदि से लेकर नीचे के स्तर तक ऐसे कई नेता हैं, जो नरेन्द्र मोदी को जब-तब दैवीय शक्ति का अवतार बताने में कोई संकोच नहीं करते। ऐसी उपमा देने वाले वैंकेया नायडू सबसे पहले व्यक्ति थे, जो अब उपराष्ट्रपति बनाए जा चुके हैं। 
 
मोदी देश-विदेश में जहां भी जाते हैं, उनके प्रायोजित समर्थकों का उत्साही समूह 'मोदी-मोदी' का शोर मचाता है और मोदी किसी रॉक स्टार की तरह इस पर मुदित नजर आते हैं। लेकिन बात नरेन्द्र मोदी या उनकी सरकार की ही नहीं है, बल्कि आजादी के बाद भारतीय राजनीति की ही यह बुनियादी समस्या रही है कि वह हमेशा से व्यक्ति केंद्रित रही है। हमारे यहां संस्थाओं, उनकी निष्ठा और स्वायत्तता को उतना महत्व नहीं दिया जाता, जितना महत्व करिश्माई नेताओं को दिया जाता है। 
 
नेहरू से लेकर नरेन्द्र मोदी तक की यही कहानी है। इससे न सिर्फ राज्यतंत्र के विभिन्न उपकरणों, दलीय प्रणालियों, संसद, प्रशासन, पुलिस और न्यायिक संस्थाओं की प्रभावशीलता का तेजी से पतन हुआ है, बल्कि राजनीतिक स्वेच्छाचारिता और गैरजरूरी दखलंदाजी में भी बढोतरी हुई है।
 
यह स्थिति सिर्फ राजनीतिक दलों की ही नहीं है। आज देश में लोकतंत्र का पहरुए कहे जा सकने वाले ऐसे संस्थान भी नजर नहीं आते जिनकी लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर प्रतिबद्धता संदेह से परे हो। आपातकाल के दौरान जिस तरह प्रतिबद्ध न्यायपालिका की वकालत की जा रही थी, आज वैसी ही आवाजें सत्तारूढ़ दल से नहीं, बल्कि न्यायपालिका की ओर से भी सुनाई दे रही है।
 
यही नहीं, कई महत्वपूर्ण मामलों में तो अदालतों के फैसले भी सरकार की मंशा के मुताबिक ही रहे हैं। सूचना के अधिकार को निष्प्रभावी बनाने की कोशिशें जोरों पर जारी हैं। लोकपाल कानून बने 4 साल से अधिक हो चुके हैं लेकिन सरकार ने आज तक लोकपाल नियुक्त करने में कोई रुचि नहीं दिखाई। 
 
हाल ही में कुछ विधानसभाओं और स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में गड़बड़ियों की गंभीर शिकायतें जिस तरह सामने आई हैं उससे हमारे चुनाव आयोग और हमारी चुनाव प्रणाली की साख पर सवालिया निशान लगे हैं, जो कि हमारे लोकतंत्र के भविष्य के लिए अशुभ संकेत है। नौकरशाही की जनता और संविधान के प्रति कोई जवाबदेही नहीं रह गई है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो समूची नौकरशाही सत्ताधारी दल की मशीनरी की तरह काम करती दिखाई पड़ती है। चुनाव में मिले जनादेश को दल-बदल और राज्यपालों की मदद से कैसे तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है, उसकी मिसाल पिछले दिनों हम गोवा और मणिपुर में देख चुके हैं।
 
जिस मीडिया को हमारे यहां लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की मान्यता दी गई है, उसकी स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। आज की पत्रकारिता आपातकाल के बाद जैसी नहीं रह गई है। इसकी अहम वजहें हैं- बड़े कॉर्पोरेट घरानों का मीडिया क्षेत्र में प्रवेश और मीडिया समूहों में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़। इस मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति ने ही मीडिया संस्थानों को लगभग जनविरोधी और सरकार का पिछलग्गू बना दिया है। 
 
सरकार की ओर से मीडिया को दो तरह से साधा जा रहा है- उसके मुंह में विज्ञापन ठूंसकर या फिर सरकारी एजेंसियों के जरिए उसकी गर्दन मरोड़ने का डर दिखाकर, जैसा कि हाल में हमने एनडीटीवी के मामले में देखा है। एनडीटीवी के पीछे सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय को लगाकर सरकार ने एक तरह से दूसरे मीडिया घरानों को भी खबरदार रहने की चेतावनी दी है। इस सबके चलते सरकारी और गैरसरकारी मीडिया का भेद लगभग खत्म-सा हो गया है। व्यावसायिक वजहों से तो मीडिया की आक्रामकता और निष्पक्षता बाधित हुई ही है, पेशागत, नैतिक और लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का भी कमोबेश लोप हो चुका है।
 
पिछले 3-4 वर्षों के दौरान जो एक नई और खतरनाक प्रवृत्ति विकसित हुई वह है सरकार और सत्तारूढ़ दल और मीडिया द्वारा सेना का अत्यधिक महिमामंडन। यह सही है कि हमारे सैन्यबलों को अक्सर तरह-तरह की मुश्किलभरी चुनौतियों से जूझना पड़ता है, इस नाते उनका सम्मान होना चाहिए लेकिन उनको किसी भी तरह के सवालों से परे मान लेना तो एक तरह से सैन्यवादी राष्ट्रवाद की दिशा में कदम बढ़ाने जैसा है।
 
आपातकाल कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि सत्ता के अतिकेंद्रीकरण, निरंकुशता, व्यक्ति-पूजा और चाटुकारिता की निरंतर बढ़ती गई प्रवृत्ति का ही परिणाम थी। आज फिर वैसा ही नजारा दिख रहा है। सारे अहम फैसले संसदीय दल तो क्या, केंद्रीय मंत्रिपरिषद की भी आम राय से नहीं किए जाते; सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री की चलती है।
 
इस प्रवृत्ति की ओर पत्रकार और केंद्र में मंत्री रहे भाजपा के ही एक पूर्व नेता अरुण शौरी ने भी पिछले दिनों इशारा किया है। शौरी ने साफतौर पर कहा है कि मौजूदा सरकार को ढाई लोग चला रहे हैं। आपातकाल के दौरान संजय गांधी और उनकी चौकड़ी की भूमिका सत्ता-संचालन में गैर-संवैधानिक हस्तक्षेप की मिसाल थी, तो आज वही भूमिका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ निभा रहा है। संसद को अप्रासंगिक बना देने की कोशिशें जारी हैं। न्यायपालिका के आदेशों की सरकारों की ओर से खुलेआम अवहेलना हो रही है। असहमति की आवाजों को चुप करा देने या शोर में डुबो देने की कोशिशें साफ नजर आ रही हैं।
 
आपातकाल के दौरान और उससे पहले सरकार के विरोध में बोलने वाले को अमेरिका या सीआईए का एजेंट करार दे दिया जाता था तो अब स्थिति यह है कि सरकार से असहमत हर व्यक्ति को पाकिस्तानपरस्त या देशविरोधी करार दे दिया जाता है। आपातकाल में इंदिरा गांधी के 20 सूत्री और संजय गांधी के 5 सूत्री कार्यक्रमों का शोर था तो आज विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के आवरण में हिन्दुत्ववादी एजेंडे पर अमल किया जा रहा है। इस एजेंडे के तहत दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का तरह-तरह से उत्पीड़न हो रहा है। 
 
सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों, लेखकों और साहित्यकारों पर जानलेवा हमले हो रहे हैं, उन्हें धमकाया और तरह-तरह से अपमानित किया जा रहा है। इस सिलसिले में गौरी लंकेश, नरेन्द्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और एमएम कलबुर्गी आदि लेखकों-बुद्धिजीवियों को मौत की नींद ही सुला दिया गया। इन सभी के हत्यारे आज तक नहीं पकड़े गए हैं।
 
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आपातकाल के बाद से अब तक लोकतांत्रिक व्यवस्था तो चली आ रही है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं, रवायतों और मान्यताओं का क्षरण जारी है। लोगों के नागरिक अधिकार गुपचुप तरीके से कुतरे जा रहे हैं। 70 के दशक तक में केंद्र के साथ ही ज्यादातर राज्यों में भी कांग्रेस का शासन था इसलिए देश पर आपातकाल आसानी से थोपा जा सका। 
 
हालांकि इस समय भाजपा भी केंद्र के साथ ही देश के लगभग आधे राज्यों में अकेले या सहयोगियों के साथ सत्ता पर काबिज है। उसकी इस स्थिति के बरअक्स देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस की ताकत का लगातार क्षरण होता जा रहा है। वह कमजोर इच्छाशक्ति की शिकार है। 
 
लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण उसमें संघर्ष के संस्कार कभी पनप ही नहीं पाए, लिहाजा सड़क से तो उसका नाता टूटा हुआ है ही, संसद में भी वह प्रभावी विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पा रही है, बाकी विपक्षी दलों की हालत भी कांग्रेस से बेहतर नहीं है। क्षेत्रीय दल भी लगातार कमजोर हो रहे हैं। विपक्ष की इस स्थिति का लाभ उठाकर सरकार मनमाने जनविरोधी फैसले ले रही है।
 
हालांकि अब उस तरह से देश पर आपातकाल थोपना बहुत आसान नहीं है। अब आतंरिक संकट बताकर नागरिकों के मौलिक अधिकारों को निलंबित करने के लिए संसद के अलावा दो-तिहाई राज्यों की विधानसभाओं में भी दो-तिहाई बहुमत होना आवश्यक है। आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार ने और कुछ उल्लेखनीय काम किया हो या न किया हो, लेकिन संवैधानिक प्रावधानों का सहारा लेकर देश पर फिर तानाशाही थोपे जाने की राह को उसने बहुत दुष्कर बना दिया था। यह उस सरकार का प्राथमिक कर्तव्य था जिसे उसने ईमानदारी से निभाया था। 
 
लेकिन यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों का अपहरण हर बार बाकायदा घोषित करके ही किया जाए, यह जरूरी नहीं। वह लोकतांत्रिक आवरण और कायदे-कानूनों की आड़ में भी हो सकता है। मौजूदा शासक वर्ग इसी दिशा में तेजी से आगे बढता दिख रहा है। विडंबना है कि यह सब करते हुए वह बेशर्मी के साथ अपने को जेपी की विरासत का वाहक बताने का भौंडा प्रयास भी कर रहा है। 

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