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आरक्षण के जवाब में

उमेश चतुर्वेदी
महाकौशल की राजधानी रहे जबलपुर में मई की वह दोपहरी कुछ ज्यादा ही चटक और तीखी हो चली थी। उस होटल से हम अपना बोरिया बांधने की तैयारी में थे। कुल जमा सात घंटे ही शहर के उस होटल ने हमें आसरा दिया था। अमरकंटक से साढ़े दस बजे शुरू हुई 227 किलोमीटर की यात्रा रात साढ़े चार बजे जाकर खत्म हुई थी। साढ़े चार बजे ऊंघते से हम उस होटल में पहुंचे और ऊंघते से ही निकल लिए...क्योंकि महाकौशल की तीखी धूप को छोड़कर दिल्ली की उमसभरे माहौल में लौटना था..चलते-चलते उस होटल के रेस्टोरेंट से नाश्ता करने का प्लान बना..नाश्ता बनने में देर हुई तो एक साथी चिल्लाने लगे...नाश्ता पेश कर रहे बेयरे के चेहरे के चेहरे की उलझन बढ़ती चली गई।

पता नहीं क्यों उस वेटर पर दया आ गई और मैंने उसका नाम पूछ लिया। कोई पाठक जी थे। मैंने उन्हें जल्दी से नाश्ता लगा देने की प्यार भरी हिदायत दी..कुछ इस अंदाज में कि डांट से परेशान उसके मन पर प्यार का फव्वारा उसे राहत पहुंचा जाए।
 
अपने काम में वह मशगूल हुआ नहीं कि काउंटर पर बैठे सज्जन से उनका नाम पूछ बैठा। वे कोई तिवारी थे। इसके बाद फिर मैंने शेफ के बारे में पूछा, वे कोई शुक्ला थे। ब्राह्मणों के बारे में माना जाता है कि वे कोई और काम कर लेंगे, बेयरे का काम या टेबल लगाने का काम शायद ही करें। संस्कृत की तमाम कहानियों की शुरुआत भले ही एक गरीब ब्राह्मण था, जैसे वाक्य से होती रही हो, बहुजन के समर्थन और कथित फासीवादी सोच के लिए ब्राह्मणवादी व्यवस्था को ही गालियां मिलती हैं।

ऐसे माहौल में उस होटल के तमाम कर्मचारियों के नाम के पीछे शुक्ला, तिवारी, पाठक जैसे शब्दों का लगा होना मेरी उत्सुकता बढ़ाने के लिए काफी था। मुझे लगा कि उस होटल के शेफ, वेटर या सफाई वाले ही पंडित समाज के होंगे, हो सकता है रूम सर्विस वाले या इलेक्ट्रिशियन आदि दूसरे समाज के होंगे। लेकिन मेरी यह सोच तब धाराशायी हो गई, जब रूम सर्विस वाले सज्जन कोई दूबे निकले। इलेक्ट्रिशियन महोदय भी कोई शुक्ला थे।
 
हमें भेड़ाघाट के लिए निकलना था। वहां से सीधे दिल्ली वापसी की राह पकड़नी थी। लेकिन अपनी उत्सुकता को मैं दबा नहीं पाया और पहुंच गया रिसेप्शन पर। मेरी हैरत का ठिकाना तब नहीं रहा, जब पता चला कि रिसेप्शन संभालने वाली लड़की भी कोई तिवारी थी। तब मुझसे रहा नहीं गया। मैंने रिसेप्शन पर शाम को आने वाली लड़की के बारे में भी मैंने पूछा तो वह भी कोई ब्राह्मण कन्या ही निकली। पता चला कि उस होटल में काम करने वाले नब्बे फीसदी से ज्यादा कर्मचारी पंडितों के ही खानदान के हैं। होटल के मालिक भी कोई तिवारी जी ही हैं। 
 
आखिर क्या है कि इस होटल में ज्यादातर कर्मचारी ब्राह्मण ही हैं? मैंने यह सवाल उस होटल की महिला मैनेजर से पूछ लिया, जो बिना शक ब्राह्मण दुहिता ही थीं। उनका जवाब बेहद मार्मिक रहा। उनका कहना था कि आरक्षण के दौर में पंडितों को गालियां तो खूब मिल रही हैं, लेकिन उनके लिए नौकरियां बेहद कम हैं। 
 
हमारे मालिक का एक मात्र मकसद है ब्राह्मणों को ही नौकरियां देना। उनका कहना है कि वो अगर अपने समुदाय के लोगों का सहयोग नहीं करेंगे तो दूसरा कौन करेगा।
 
पिछड़े और दलित समुदाय के लिए संविधान प्रदत्त आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा को लेकर जब भी मांग उठती है, इसे सवर्णवाद का विशेषण देकर नकार दिया जाता है। लेकिन हकीकत यह है कि देश की कार्यशील श्रम शक्ति में से 94 प्रतिशत तो गैर सरकारी संगठनों में रोजगार हासिल करने को मजबूर हैं। जिसे कोई आरक्षण या सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती। छह प्रतिशत जो श्रम शक्ति संगठित क्षेत्र में लगी है, उसमें से भी करीब साढ़े तीन प्रतिशत ही सरकारी नौकरियों में हैं। उसी में आरक्षण हासिल है।
 
केंद्र सरकार, केंद्रीय सार्वजनिक निगमों, राज्य सरकारों और राज्यों के निगमों आदि की नौकरियों को जोड़ दिया जाय तो वे महज तीन करोड़ के ही आसपास हैं। इन्हीं में आरक्षण भी है और गैर आरक्षण भी। यानी करीब डेढ़ करोड़ आरक्षित नौकरियों के लिए राजनीतिक स्तर पर मारामारी है। इन्हीं को लेकर सवर्णों और अवर्णों के बीच वैमनस्यता की हद तक विरोध बढ़ गया है। ऐसे में कुछ दलित उद्यमी सामने आए हैं, जो दलितों के सशक्तीकरण के लिए काम कर रहे हैं।
 
ऐसे में निजी नौकरियों में भी अगर अपने समुदाय विशेष का ध्यान रखने वाले सामने आने लगें तो हैरत नहीं होनी चाहिए। अब तक सरकारी नौकरियों में ही ब्राह्मणों, ठाकुरों और दूसरी सवर्ण जातियों के अफसरों पर जातिवाद को प्रश्रय देने का आरोप लगता रहा है। जबलपुर का वह होटल उदाहरण है कि अब निजी क्षेत्र में सवर्ण लोग अपने समुदाय विशेष को ही प्रश्रय दे रहे हैं। इसे वे अपना सामाजिक धर्म भी बता रहे हैं। इसलिए उन्हें गाली भी नहीं दी जा सकती। क्योंकि वे सार्वजनिक और कर दाता के पैसे से अपना धंधा नहीं चला रहे हैं। 
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