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असहिष्णुता और नाश्ता

मनोज लिमये
रविवार को सुबह जलेबी खाने के पवित्र भाव से मैंं दुुकान पर खड़ा था। गर्म जलेबियां कढ़ाई में गोते लगा रही थीं सो इंतज़ार ही एकमेव विकल्प था। अनायास मुझे मालवी जी जलेबियों की गुणवत्ता जांचते हुए नज़र आ गए। मैंने हौले से उनके कंधे पर हाथ रख पूूछा 'तो आप इधर से लाते हैं जलेबियां और हम समझते थे कि भाभीजी बनाती हैं'  

 
उन्होंने मेरी और ऐसे देखा जैसे मै परम मूर्ख हूं तथा यह सिद्ध भी हो चुुका हो। वे बोले 'घर में आपकी भाभी ही जलेबियां बनाती थी किन्तु आजकल.... मैंने समझदारी की शॉल ओढ़ते हुए कहा 'अरे क्या हो गया भाभीजी को सब कुशल तो है ना? वे बोले 'पता नहीं क्या हुआ है, कहती है इतने समय से जो हुआ सो हुआ परन्तु अब जलेबियां घर में नहीं बनेंगी खाना है तो बाज़ार से लाओ 'मैंने आश्चर्य मिश्रित भाव चेहरे पर समायोजित कर पूूछा 'अरे पर कुछ तो हुआ होगा या फिर आपने ही कुछ कहा होगा वर्ना भाभीजी ऐसी नहीं हैं! 
 
मुझे भाभी जी के समर्थन में पा कर वे क्रोधित होते हुए बोले 'अरे भाई कुछ महीना भर पहले ये वाहियात सीरियल-वीरियल छोड़ समाचार चैनल देखने का कहा था और वो एक महीने से बाकायदा समाचार देख भी रही थी और तो हमारे बीच कुछ नहीं हुआ' मैंने किसी कुशल अय्यार की भांति मामले को सुलझाने वाले अंदाज़ में कहा 'कहीं ये प्राईम-टाईम पर असहिष्णुता या आज़ादी वाला मसला तो नहीं देख लिया भाभीजी ने? मेरे इस वक्तव्य के बाद उनकी स्थिति वैसी ही हो गई जैसी विदेशी पिचों पर भारतीय बल्लेबाजों की होती है।  
 
वे मुझे कोने में खींचते हुए बोले'आज़ादी का तो पता नहीं पर हां ये असहिष्णुता वाले मुद्दे पर वो उस मिस्टर परफेक्ट का समर्थन कर रही थी,कहीं उससे प्रभावित हो कर उसने ये कदम ना उठाया हो' मैंने कहा "भाभीजी के पास तो कोई पुरस्कार है नहीं इसलिए हो सकता है जलेबियां ना बना कर आपके प्रति विरोध का प्रदर्शन कर रही हों’ 
 
वे बोले'अरे पर यदि ऐसा कोई मसला हो तो खुल कर बताना चाहिए न ये क्या तरीका हुआ भला' मैंने उन्हें समझाते हुए कहा 'भाईसाब जो लोग सम्मान लौटा रहे हैं,सरकारी नीतियों को असहिष्णु बता रहे हैं जब वे ही इस पर स्पष्ट कुछ नहीं बोल पा रहे हैं तो भाभीजी की क्या बिसात है?'
 
वे बोले'आप सत्य कह रहे हैं यदि ये असहिष्णुता वाला मुद्दा कुछ दिन और चला तो जलेबियां तो दूर शायद रोटी भी नसीब ना हो अब आप ही उपाय बताइए 'मैंने कहा 'देखिए आप भी सरकार की भांति वैसा ही दर्शाइए जैसे कुछ नहीं हुआ है कुछ अरसा पहले यही सरकार मानवता के चलते सवालों के घेरे में थी आज असहिष्णुता के कारण है,सब राजनीति है भाईसाब'
 
वे सहमतिसूचक सर हिलाते हुए बोले"लेकिन इस असहिष्णुता के चक्कर में अपने को तो बाज़ार की जलेबियां से गुजारा करना पड़ रहा है न' मैंने कहा' दूर की सोचिए आगे बहुत से अवसर आएंगे' वे बोले "आपकी बात सही है किन्तु विधान सभा के चुनाव चल रहे हैं कहीं फिर से ये असहिष्णुता, आज़ादी या मानवता टाइप का कोई जिन्न अपने शीश पर नृत्य करेगा, फिर क्या होगा?'
 
इस यक्ष प्रश्न का जवाब भी नहीं था और मैंं उनका मातहत कर्मचारी भी नहीं था जो प्रोटोकॉल के कारण जवाब देना मजबूरी हो।मैं जलेबी ले कर घर की तरफ चल दिया।
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