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उफ्...! ये संगीत सभाएं

मनोज लिमये
शहर में आजकल संगीत सभाओं का बहुत जोर है। संगीत सभाओं में जाना और पूरे समय तक बैठे रहना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है तथा कमजोर दिल वालों के लिए इस प्रकार की सभाओं में जाना घर वालों को इंश्योरेंस का पैसा दिलवाने की दिशा में उठाया एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है।
 
मेरे परम मित्र मालवीजी ने कुछ पुरानी फिल्मों के गीत कंठस्थ कर रखे हैं तथा मौके की नजाकत भांपकर उनका बखूबी इस्तेमाल करने की कला के वे धनी हैं। समाज में यह भ्रम बना रहे कि उन्हें संगीत की समझ है इसलिए वे इन कार्यक्रमों में नियमित जाते हैं।
 
पिछली रविवार सुबह ही वे मेरे घर प्रगट हो गए। उनके आगमन से मुझे फौरी तौर से प्रसन्नता तो हुई, परंतु चिंता भी हुई क्योंकि पोहे लिमिटेड बने थे। दाने-दाने पर लिखा रहता है या नहीं, ये तो नहीं पता किंतु मुझे कड़ाही में रखे पोहों पर उनका नाम लिखा स्पष्ट दिखाई दिया। 
 
भारी मन से पोहों पर सेंव डालते हुए मैंने पूूछा कि आज सुबह-सुबह रास्ता कैसे भूल गए श्रीमान, सब खैरियत तो है न? उन्होंने प्लेट में खंजर की भांति चम्मच लहराते हुए कहा कि  आपको शाम के कार्यक्रम के बारे में बताने आया था। अपने को आज टाउन हॉल वाली संगीत निशा में चलना है। भूल तो नहीं गए न आप?
 
मैंने कहा कि ओह! अच्छा हुआ, आपने याद दिला दिया। मैं सचमुच भूल ही गया था। वैसे किस गायक पर है आज का कार्यक्रम? वे दांतों के मध्य अठखेलियां कर रहे प्याज के टुकड़े को उंगली से निकालते हुए बोले कि आयोजकों ने मिक्स रखा है- किशोर, रफी, मुकेश, तलत, हेमंत सभी के गाने होंगे प्रोग्राम में। 
 
जितना मैं उन्हें जानता हूं कि उनके घर में किशोर, रफी या मुकेश की इक्का-दुक्का सीडी रही होंगी किंतु वे उनके नामों का उल्लेख ऐसे कर रहे थे, जैसे इनके साथ एक ही मंच पर कार्यक्रम किया करते हों, खैर!
 
शाम की बात पक्की कर तथा डेढ़ प्लेट पोहे रगड़कर वे निकल गए। तय कार्यक्रमानुसार शाम को ठीक 7 बजे हम दोनों टाउन हॉल के भीतर बैठे हुए थे। कार्यक्रम की तैयारियां हो चुकी थीं।

रफी, किशोर, तलत, मुकेश तथा हेमंत कुमार के गीतों का कत्ल करने के लिए साजिंदे सह कलाकार अपनी कमर कस रहे थे। भड़कीले वस्त्र पहनकर पाउडर की होली खेल चुकी युवती माइक से अधिक अपना मैकअप सहेजने में व्यस्त थी।
 
कुछ पुराने संगीत प्रेमी वहां पुराने दौर की यादें ताजा करने के सोद्देश्य से जमा थे। मिठाई के 2 किलो पैकेट की खरीदी पर मुफ्त में अर्जित किए पास लेकर कुछ व्यापारी किस्म के लोग भी संगीत का लुत्फ उठाने आए थे।
 
मुख्य अतिथि द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम शुरू हो गया। प्रत्येक गायक गाने को अपने अंदाज में गाने के बजाय उसी अंदाज में गाने पर उतारू लगा, जैसे वो गीत गाए जा चुके हैं। 
एंकर ने बीच-बीच में बेवजह की शेरो शायरी कर मनोरंजन का असफल प्रयास किया किंतु यह सब वहां सतत 2 घंटे बैठने हेतु नाकाफी लग रहा था। 'समाज में रहना है तो सामाजिक कार्यक्रमों में जाना चाहिए' वाली बात को चरितार्थ करने पर मेरा तथा उनका भी विश्वास बना हुआ था, सो हम बिना ना-नुकुर किए बैठे रहे। 
 
कार्यक्रम समाप्ति तथा समीप के हॉल में स्वल्पाहार की घोषणा ने हमारे चेहरे की आभा बढ़ा दी। चिप्स और खमण की क्वालिटी देख और चखकर मुझे भी लगा कि कार्यक्रम इतना भी बुरा नहीं था जितना हमने सोचा था।
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