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आधुनिक जीवनशैली से जलस्रोतों की तबाही

Webdunia
- विवेक त्रिपाठी 




 


 
पानी के संकट से लगभग पूरा देश जूझ रहा है। अगर पानी को संरक्षित नहीं किया गया तो इसके लिए युद्ध करना पड़ेगा। पानी को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। इसके लिए सभी को आगे आना होगा।
 
एक समय हमारा देश पानी के मामले में सबसे ज्यादा धनी था। जब यहां राजसत्ता थी तो वह कुएं और पोखर खुदवाकर लोगों के लिए जल समस्या का निदान करती थी जिससे पशु-पक्षी की प्यास तो बुझती ही थी, साथ में कृषि के लिए बहुत उपयोगी होता था। 
 
लेकिन विकास की अंधी दौड़ ने तालाबों व नहरों, पोखरों को पाटकर आलीशान इमारतों में तब्दील कर दिया जिससे पानी के स्रोत लगभग बंद होते चले गए। बचे-खुचे भी पानी न मिलने से सूखने की कगार पर हैं। गांवों में भी तालाबों पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया। कुएं सूखते चले जा रहे हैं। लोगों ने हैंडपम्प व सबमर्सिबल पम्प का सहारा लेना शुरू कर दिया है। ज्यादा से ज्यादा लोग सुविधाभोगी होते जा रहे हैं। पाताल के कलेजे से उसके जीवन स्रोतों को भी धीरे-धीरे छीनते जा रहे हैं। 
 
किसी वक्त इलाके में तालाब व कुआं बनवाना स्टेटस सिंबल होता था। हजारों की संख्या में कुएं होते थे। हर गांव में 4-5 की संख्या में। पोखर और तालाब भी भारी मात्रा में होते थे, लेकिन देखरेख के अभाव में कुएं व तालाब दोनों जर्जर होते चले गए। जितना भी सूखे का प्रभाव बढ़ा है, वह जलदोहन का ही उदाहरण है। 
 
पानी के आधुनिक संसाधनों ने कुओं व तालाबों को निगल लिया है। पहले सिंचाई के लिए हर गांव में व्यवस्था होती थी और बरसात के मौसम में इकट्ठे जल को करीन व ढौंस के माध्यम से खेतों में ले जाया जाता था, लेकिन पंपसेट व बोरिंग के बाद तालाब व कुओं पर निर्भरता कम होती गई और भू-गर्भीय जल का दोहन अधिक होने लगा।


 
उपेक्षा के कारण तालाबों का क्षेत्रफल भी सिकुड़ा है। गांवों में घूमते वक्त आपको बीच में जर्जर जाठ वाले कई सूखे तालाब आराम से दिख जाएंगे। इनमें पानी नहीं होता तथा ये मवेशियों का चरागाह बनकर रह गए हैं।
 
तालाब निर्माण प्रतिष्ठा का बिंदु माना जाता था और गांवों में पोखर यज्ञ करवाने की हसरत रखने वाले हजारों लोग आज भी मिल जाएंगे। कुएं लगभग समाप्त हो गए हैं। यहां तक कि शादी-विवाह के अवसर पर कूप-पूजन के लिए भी गंदे व बंद कुओं का ही आसरा रहता है।
 
वैज्ञानिकों की मानें तो जब पानी का अत्यधिक दोहन होता है, तब जमीन के अंदर के पानी का उत्प्लावन बल कम होने या खत्म होने पर जमीन धंस जाती है और उसमें दरारें पड़ जाती हैं। इसे उसी स्थिति में रोका जा सकता है, जब भू-जल के उत्प्लावन बल को बरकरार रखा जाए। पानी समुचित मात्रा में रिचार्ज होता रहे। यह तभी संभव है, जब ग्रामीण-शहरी दोनों जगह पानी का दोहन नियंत्रित हो। 
 
विश्व बैंक की मानें तो भूजल का सर्वाधिक 92 फीसदी उपयोग और सतही जल का 89 फीसदी उपयोग कृषि में होता है। 5 फीसदी भूजल व 2 फीसदी सतही जल उद्योग में, 3 फीसदी भूजल व 9 फीसदी सतही जल घरेलू उपयोग में लाया जाता है।
 
एक जानकारी के अनुसार 91 जल भंडारों में उनकी कुल क्षमता का केवल 23 प्रतिशत पानी ही जमा है और यह मात्रा भी घटने वाली है, क्योंकि अगले माह गर्मी और भी अधिक पड़ेगी। पिछले 15 सालों से यह समस्या लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने इससे निपटने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई है। 
 
देश के आजाद होने के बाद 1951 में प्रति व्यक्ति 5,177 घनमीटर पानी उपलब्ध था लेकिन 2011 में यह घटकर 1,545 घनमीटर ही रह गया, क्योंकि तब से अब तक शहरों और महानगरों का जिस अनियोजित और अव्यवस्थित ढंग से विकास हुआ है उसमें पानी की जरूरत और उसकी उपलब्धता के अनुपात पर ध्यान नहीं दिया गया।
 
सामाजिक विज्ञानी केके जैन ने कहा कि भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष जल उपलब्धता 1,000 घनमीटर है, जो 1951 में 3.4 हजार घनमीटर थी। देश में अभी जल भंडारण प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति 200 घनमीटर है, जो खपत के लिहाज से चिंता का विषय है। नॉर्वे में प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष जल उपलब्धता 8,036 घनमीटर, अमेरिका में 5,000 घनमीटर तथा ऑस्ट्रेलिया में 3,223 घनमीटर है। चीन में प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष जल उपलब्धता करीब 2,000 घन मीटर है। 
 
जैन ने कहा कि स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि 1950 में विश्व में प्रति व्यक्ति जल की औसत खपत 1,000 घनमीटर प्रतिवर्ष थी, जो 1980 में बढ़कर 3,600 घनमीटर हो गई।
 
जलक्षेत्र से जुड़ी संस्था सहस्रधारा की रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व की नदियों में प्रतिवर्ष बहने वाले 41,000 घन किलोमीटर पानी में से 14,000 घन किलोमीटर का ही उपयोग किया जा सकता है। इस 14,000 घन किलोमीटर में भी 5,000 घन किलोमीटर पानी ऐसे स्थानों से गुजरता है, जहां आबादी नहीं है और यदि है भी तो उपयोग करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस प्रकार केवल 9,000 घन किलोमीटर पानी का ही उपयोग पूरे विश्व की आबादी करती है।
 
वर्षा जल के भंडारण की हमारे देश में कोई व्यवस्था नहीं है और वर्षा जल का बड़ा हिस्सा समुद्र में चला जाता है। पानी की इतनी ज्यादा कमी है कि एक राज्य दूसरे राज्य से पानी उधार ले रहा है। 
 
पंजाब-हरियाणा से पानी समझौता है तो आंध्र का तेलंगाना से, तमिलनाडु का केरल और पुडुचेरी से पानी समझौता है, जो कि सूखे की स्थिति आने पर विवाद का कारण भी होता है। वे बंटवारे को लेकर एक-दूसरे से लड़ने को तैयार रहते हैं। इनमें कई राज्यों में तो नदियों और बांध की भी लड़ाई होती है।
 
पानी का विवाद आज से नहीं, बहुत पुराना है। एक प्रकार से कहा जाए कि कोई भी राज्य बिना एक-दूसरे की सहायता से किसी की प्यास नहीं बुझा सकते हैं। परिस्थितियां बहुत गंभीर हो रही हैं। पानी की दिनोदिन कमी से संघर्ष बढ़ रहा है। ऐसे में इनसे निपटने के लिए सरकार और समाज को मिलकर कोई कारगर योजना बनानी होगी।
 
भूजल का स्तर कैसे ऊपर उठे, इसके लिए भी सरकारों को विज्ञान और तकनीकी का सहारा लेना जरूरी है तथा ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है। गांवों में वर्षा के पानी के संचयन के लिए तालाबों को खोदे जाने की आवश्यकता है। यह हर ग्रामसभा में करना होगा। तालाबों को जल से भी समृद्ध करना होगा। जल संचयन के लिए चेकडैम व बांध निर्माण की योजनाओं को और ज्यादा क्रियान्वित करने की आवश्यकता है। तालाबों के क्षेत्र में अतिक्रमण को रोकना होगा। इसमें ज्यादा से ज्यादा वर्षा का जल जाने देने की जरूरत है। 
 
अभी जो पानी के हालात हैं, इनसे निपटने के लिए यदि दीर्घकालिक प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले समय में इसके लिए प्रलय की स्थिति हो सकती है।
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