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शंकराचार्य विवाद: क्या है पूरा मामला? जानिए वजह और पृष्ठभूमि

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WD Feature Desk

, सोमवार, 26 जनवरी 2026 (18:41 IST)
शंकराचार्य से जुड़ा विवाद हाल के दिनों में धार्मिक और सामाजिक चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। उनके कुछ बयानों और घटनाओं के बाद यह मामला सिर्फ आस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक सोच, परंपरा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सवालों को भी सामने ले आया है। जहां एक ओर समर्थक इसे धार्मिक दृष्टिकोण से देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आलोचक इसे समाज पर असर डालने वाला मुद्दा मान रहे हैं। इसी कारण शंकराचार्य और उनसे जुड़े विवाद की पृष्ठभूमि, कारण और इसके प्रभाव को समझना जरूरी हो गया है। 
 
शंकराचार्य विवाद हाल के वर्षों में कई कारणों से चर्चा में रहा है। भारत में आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख पीठों (मठों) के शंकराचार्यों की भूमिका, उनके अधिकार और उनके द्वारा उठाए गए धार्मिक-संवैधानिक प्रश्नों ने अक्सर विवाद का रूप लिया है। शंकराचार्य विवाद के मुख्य बिंदुओं को हम निम्न श्रेणियों में समझ सकते हैं।
 

1. राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह (2024)

राम मंदिर आमं‍त्रण: सबसे हालिया और प्रमुख विवाद अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के समय सामने आया था। चारों पीठों के शंकराचार्यों ने इस समारोह में शामिल होने से इनकार कर दिया था (हालांकि उन्होंने राम मंदिर का समर्थन किया था)। उनके विरोध के मुख्य कारण थे:
 
अधूरा मंदिर: शंकराचार्यों का तर्क था कि मंदिर अभी पूर्ण नहीं हुआ है, और शास्त्रों के अनुसार शिखर और ध्वजा के बिना अधूरे मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा नहीं की जा सकती।
 
शास्त्रीय विधि: उन्होंने चिंता व्यक्त की थी कि समारोह को धार्मिक से अधिक राजनैतिक स्वरूप दिया गया है, जो शास्त्र सम्मत परंपराओं के विरुद्ध है।
 

2. ज्योतिष पीठ के उत्तराधिकार का विवाद

ज्योतिष पीठ: उत्तराखंड स्थित ज्योतिष पीठ (बद्रिकाश्रम) के शंकराचार्य पद को लेकर दशकों से कानूनी विवाद चल रहा है।
दो दावेदार: स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती (जिनके ब्रह्मलीन होने के बाद अब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती) और स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के बीच इस पद को लेकर लंबे समय तक अदालती लड़ाई चली।
अदालती हस्तक्षेप: कोर्ट ने समय-समय पर योग्यता और चयन प्रक्रिया के आधार पर इन नियुक्तियों पर सवाल उठाए हैं, जिससे भक्तों के बीच भ्रम की स्थिति बनी रही।
 

3. 'शंकराचार्य' की उपाधि का उपयोग

स्वयंभू शंकराचार्य: विवाद का एक पक्ष यह भी है कि देश में कई साधु-संत खुद को 'शंकराचार्य' घोषित कर देते हैं।
असली बनाम नकली: आदि शंकराचार्य ने केवल चार मठ (पुरी, द्वारका, श्रृंगेरी और बद्रीनाथ) स्थापित किए थे। हालांकि, कई अन्य मठ (जैसे कांची कामकोटि) भी प्राचीनता का दावा करते हैं। आधिकारिक चारों पीठों का मानना है कि इनके अलावा कोई भी स्वयं को शंकराचार्य नहीं कह सकता।
 

4. धर्म और राजनीति का टकराव

शंकराचार्य अक्सर सरकार के निर्णयों (जैसे मंदिरों का सरकारी नियंत्रण, गौरक्षा, या धार्मिक स्थलों का सौंदर्यीकरण) पर कड़े रुख अपनाते हैं।
स्वतंत्रता: शंकराचार्यों का तर्क है कि हिंदू धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरु होने के नाते, धार्मिक निर्णयों में राजनीति का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
विवाद: जब वे किसी राजनैतिक नीति की आलोचना करते हैं, तो इसे अक्सर 'विवाद' के रूप में पेश किया जाता है।
महत्वपूर्ण सारांश: शंकराचार्य विवाद व्यक्तिगत नहीं, बल्कि परंपरा बनाम आधुनिकता और शास्त्र बनाम राजनीति का संघर्ष है। वे स्वयं को सनातन धर्म के संविधान (वेदों) का रक्षक मानते हैं, इसलिए किसी भी प्रकार का विचलन विवाद को जन्म देता है।
शंकराचार्य विवाद के केंद्र में वर्तमान में दो सबसे प्रमुख नाम हैं- स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (ज्योतिष पीठ) और स्वामी निश्चलानंद सरस्वती (पुरी पीठ)। इनके हालिया बयानों और विवादों को विस्तार से नीचे समझा जा सकता है:
 

5. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और हालिया मुद्दे

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अक्सर अपने कड़े और स्पष्ट स्टैंड के लिए चर्चा में रहते हैं। उनके हालिया विवादों के मुख्य बिंदु ये हैं:
केदारनाथ सोना चोरी का आरोप: उन्होंने हाल ही में यह गंभीर आरोप लगाया था कि केदारनाथ मंदिर के गर्भगृह की दीवारों पर मढ़ा गया सोना 'पीतल' में बदल गया है या चोरी हो गया है। उन्होंने इसकी निष्पक्ष जांच की मांग की थी, जिसे लेकर सरकार और मंदिर प्रशासन के साथ काफी बहस हुई थी।
 
राम मंदिर का 'अधूरा' निर्माण: वे उन मुख्य चेहरों में से थे जिन्होंने यह तर्क दिया था कि शास्त्र सम्मत तरीके से शिखर और ध्वजा के बिना प्राण-प्रतिष्ठा नहीं की जानी चाहिए। उनका मानना है कि यह केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम बनकर रह गया।
 
गौ-माता को राष्ट्रमाता का दर्जा: उन्होंने एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया है कि गाय को केवल 'पशु' न मानकर 'राष्ट्रमाता' घोषित किया जाए और गौ-हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगे।
 

6. विवाद का मूल कारण: 'अधिकार क्षेत्र'

इन विवादों के पीछे एक बड़ा कारण यह है कि शंकराचार्य खुद को 'धर्म का सर्वोच्च न्यायालय' मानते हैं।
टकराव: जब सरकारें हिंदू मंदिरों के प्रबंधन के लिए कानून बनाती हैं या धार्मिक स्थलों का पुनर्विकास करती हैं, तो शंकराचार्यों को लगता है कि उनके अधिकार क्षेत्र में दखल दिया जा रहा है।
 
परिणाम: यही कारण है कि काशी विश्वनाथ कॉरिडोर हो या अयोध्या का मंदिर निर्माण, शंकराचार्यों के विचार अक्सर सत्ता से मेल नहीं खाते, जिसे मीडिया 'विवाद' का नाम देता है।
 

7. क्या यह केवल राजनीति है?

नहीं, यह पूरी तरह राजनीति नहीं है। यह शास्त्र और परंपरा की रक्षा का सवाल है। शंकराचार्यों का तर्क है कि यदि वे धर्म की मर्यादा टूटने पर मौन रहेंगे, तो वे अपने पद और आदि शंकराचार्य की विरासत के प्रति सच्चे नहीं रहेंगे। 

8. ट्रस्ट और शंकराचार्य के बीच टकराव के बिंदु:

शंकराचार्य और सरकार/ट्रस्ट के बीच के विवाद को समझने के लिए सिक्के का दूसरा पहलू यानी प्रशासन और मंदिर ट्रस्टों का पक्ष जानना भी बहुत जरूरी है। यह संघर्ष अक्सर 'धार्मिक नियमों' और 'आधुनिक प्रबंधन' के बीच का संतुलन बनाने की कोशिश से पैदा होता है।
 
यहाँ सरकार और मंदिर ट्रस्टों के मुख्य तर्क दिए गए हैं:
मंदिर ट्रस्ट (जैसे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र) का पक्ष: ट्रस्ट का मानना है कि वे किसी परंपरा को तोड़ नहीं रहे, बल्कि उसे समय के अनुसार ढाल रहे हैं:
 
प्राण प्रतिष्ठा और पूर्णता: ट्रस्ट का तर्क था कि गर्भगृह (जहाँ भगवान विराजते हैं) पूरी तरह बनकर तैयार था। हिंदू धर्म में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ गर्भगृह के निर्माण के बाद प्राण प्रतिष्ठा हुई है और मंदिर का शिखर बाद में बना है।
 
ऐतिहासिक अवसर: ट्रस्ट और सरकार का मानना था कि सदियों के इंतजार के बाद यह एक ऐसा अवसर था जिसे पूरा देश मनाना चाहता था। इसे बहुत अधिक टालना जनभावनाओं के विपरीत हो सकता था।
 
सभी संप्रदायों का प्रतिनिधित्व: ट्रस्ट का कहना है कि उन्होंने केवल शंकराचार्यों को ही नहीं, बल्कि देश के सभी 150 से अधिक संप्रदायों (रामानंदी, निर्मोही अखाड़ा, सिख, जैन, बौद्ध आदि) के संतों को आमंत्रित किया, ताकि यह एक 'सर्व-समावेशी' उत्सव बने।
 

9. सरकार और प्रशासन का पक्ष (विकास और सुरक्षा)

सरकार जब काशी विश्वनाथ कॉरिडोर या पुरी हेरिटेज कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट लाती है, तो उसके अपने उद्देश्य होते हैं:
श्रद्धालुओं की सुविधा: पहले काशी या पुरी की तंग गलियों में भगदड़ और गंदगी की समस्या रहती थी। सरकार का तर्क है कि कॉरिडोर बनाने से लाखों श्रद्धालु आसानी से दर्शन कर पा रहे हैं।
सुरक्षा और आपदा प्रबंधन: पुराने निर्माणों में आग या भीड़ नियंत्रण की व्यवस्था नहीं थी। आधुनिक बुनियादी ढांचा सुरक्षा की दृष्टि से अनिवार्य है।
संविधान और मंदिर प्रबंधन: सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों के अनुसार, सरकार मंदिर के 'धर्मनिरपेक्ष' कार्यों (जैसे प्रशासन, वित्त, सुरक्षा) का प्रबंधन कर सकती है, जबकि 'धार्मिक' कार्य पुजारियों के पास ही रहते हैं।
 

10. टकराव का मुख्य बिंदु: नियंत्रण (Control)

असली विवाद यहाँ आता है कि मंदिर पर अंतिम निर्णय किसका होगा?
शंकराचार्य का पक्ष: मंदिर की हर ईंट और हर रस्म शास्त्रों के अनुसार होनी चाहिए, और इसमें अंतिम मुहर उनकी होनी चाहिए।
ट्रस्ट/सरकार का पक्ष: वे इसे एक सार्वजनिक संपत्ति और राष्ट्रीय गौरव के रूप में देखते हैं, जहाँ प्रबंधन के लिए प्रोफेशनल बोर्ड और सरकारी नियमों की जरूरत होती है।
 

निष्कर्ष: 

समन्वय का अभाव: 
यह विवाद अक्सर संवाद की कमी का परिणाम होता है। शंकराचार्य जहाँ धर्म की 'शुद्धता' (Purity) को प्राथमिकता देते हैं, वहीं सरकार और ट्रस्ट 'सुविधा और पहुंच' (Access and Utility) को।
 
हालिया विवादों की मुख्य वजह:
दो दावेदार हों: ज्योतिष पीठ (बद्रीनाथ) के मामले में दो शिष्यों ने खुद को उत्तराधिकारी बताया, जिससे मामला सालों तक कोर्ट में रहा।
राजनीतिक हस्तक्षेप: जब सरकार या कोई बाहरी संस्था चयन में दखल देती है, तो मठ इसे अपनी स्वायत्तता पर हमला मानते हैं।
महानुशासन का उल्लंघन: यदि कोई संन्यासी 'महानुशासन' की किसी शर्त (जैसे ब्रह्मचर्य या संप्रदाय) पर खरा नहीं उतरता, तो उनकी नियुक्ति को चुनौती दी जा सकती है।
शंकराचार्य के अधिकार: एक बार नियुक्त होने के बाद, वे अपने मठ की सीमाओं (जैसे दक्षिण भारत, पश्चिम भारत आदि) के भीतर 'धर्म चक्र प्रवर्तन' के अधिकारी होते हैं। उनके पास धार्मिक संशय दूर करने का अंतिम अधिकार होता है।
महानुशासनम् का नियम: आदि शंकराचार्य ने महानुशासनम् के जरिए एक ऐसी व्यवस्था दी थी जो 'Self-Regulating' (स्व-नियंत्रित) हो। आज जो भी विवाद होते हैं, वे अक्सर इसी 'महानुशासनम्' की व्याख्या को लेकर होते हैं। जब कोई आधुनिक नियम इन प्राचीन नियमों से टकराता है, तो शंकराचार्य इसे 'महानुशासनम्' का उल्लंघन मानकर विरोध करते हैं।
 

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