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वित्तमंत्री का मायाजाल

Webdunia
- डॉ. बीएस भंडार ी
लगता है वित्तमंत्री के हाथों कोई जादुई चिराग लग गया है। उन्होंने बजट को मनपसंद व्यंजनों की सूची की तरह पेश किया- मानो जो माँगो, वो मिलेगा। अलग-अलग मुलाकातों और स्मरण पत्रों में उन्हें जो कुछ भी सुझाव मिले, उनका उन्होंने ध्यान रखने का प्रयास किया।

वित्तमंत्री की जिम्मेदारी भी नहीं भूले और राजस्व घाटा और राजकोषीय घाटा क्रमशः सकल घरेलू उत्पाद के 1.4 प्रतिशत और 2.5 प्रतिशत तक सीमित रखते हुए 2430 अरब रुपयों के योजना व्यय तथा 5075 अरब रुपयों के गैर योजना व्यय का प्रावधान करने और प्रतिरक्षा व्यय बढ़ाकर 105600 करोड़ रु. करने में सफल हुए।

फिर भी सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्कों में कमी करने और आयकर की दरें उदार बनाने में उन्होंने कोई संकोच नहीं किया। किसानों के कर्ज के साठ करोड़ रु. माफ करने की घोषणा की। बहुत सारी ऐसी घोषणाएँ भी कीं, जिससे लगा कि मई 2009 में होने वाले आम चुनाव के लिए संप्रग सरकार तैयार है।

वित्तमंत्री चिदंबरम के बजट प्रस्तावों और बजट भाषण में दोहराए गए मुद्दों से जाहिर होता है कि वे देश को संगठित और संस्थागत माध्यमों के आधार पर विकसित करना चाहते हैं। भारत के वित्तमंत्री के रूप में वैश्विक मंच पर संपर्क बढ़ाकर उन्होंने जो कुछ हासिल किया है, उसका लाभ पूरे देश को देना चाहते हैं। मूल्यों को स्थिर रखकर विकास करने की सावधानी रखी गई है।

मगर वे इसके लिए बाजार तंत्र तथा वित्तीय संस्थाओं की कार्यप्रणाली को सशक्त बनाना चाहते हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए 327 अरब रुपयों, कृषि साख हेतु 28000 अरब रुपयों, छोटे शहरों में स्थापित होने वाले हॉस्पिटलों व होटलों को पाँच वर्ष तक कर से छूट देने, वस्तु-वायदा-बाजारों को संगठित करने तथा वित्तीय समावेश पर जोर देना इसी का प्रतीक है।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि उत्पादन में वृद्धि और विकास पर पहले ध्यान दिया जाएगा। विकास के लाभों और न्यायपूर्ण वितरण या असमानता की कमी जैसे मुद्दों पर सोचना तभी सार्थक हो सकता है।

वित्तमंत्री के इस सोच पर बहस हो सकती है कि यदि गरीबों, दलितों और मेहनतकश लोगों की व्यक्तिगत हालत में सुधार करने में ठंडे रहे हैं। लोगों को विकास के लाभों में हिस्सेदारी नहीं मिली तो वे विकास की प्रक्रिया में सहभागी कैसे बनेंगे? मगर बजट में ऐसे प्रावधान किए गए हैं, जिनके कारण देश की भावी पीढ़ी को शिक्षित, स्वस्थ तथा कुशल बनाया जा सके तथा अधोसंरचना के विकास का लाभ अधिक से अधिक लोग उठा सकें।

मकानों के निर्माण और उपभोक्ता सामग्री की पूर्ति के लिए अनेक प्रावधान किए गए हैं। बजट में ज्ञान और कौशल के विस्तार पर जोर दिया गया है और गैर लाभ मिशन के गठन की घोषणा की गई है। वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण और कर-सुधारों को प्रोत्साहित करने वाले प्रावधान किए गए हैं।

मगर घाटे के उद्योगों, श्रम-सुधारों, सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश और रुपए के विनिमय मूल्य की समस्या पर चर्चा नहीं की गई है। पेट्रोल उत्पादों पर कर घटाने के बावजूद उसका लाभ उपभोक्ता को नहीं दिया गया है। पर्यटन बढ़ाने की बात तो कही गई है, मगर परिवहन सेवाएँ सुलभ करने पर जोर नहीं दिया गया है। कारें व स्कूटर सस्ते होंगे, मगर सस्ता पेट्रोल कहाँ से मिलेगा यह सोचना होगा?

उनके जादुई चिराग ने ऐसा कोई करिश्मा क्यों नहीं दिखाया कि अनाज, दालें, घी-तेल, कपड़े, पेट्रोल, गैस, ईंधन, शिक्षा, चिकित्सा या मनोरंजन की सुविधा आम आदमी को आसानी से हासिल हो जाती। उसे कोई राहत नहीं मिलेगी। बजट प्रावधानों से आम आदमी खुश नहीं हो सकता है। आयकर चुकाने वाले और वित्तीय संस्थानों से जुड़े लोग भी सोच नहीं पा रहे हैं कि चिराग से रोशनी निकलेगी भी या नहीं? वित्तमंत्री की मुस्कुराहट का रहस्य वे ही जानें! ( लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।)
न सत्यम्‌, न शिवम्‌, न सुंदरम्‌

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