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नीदरलैंड की डायरी : नीदरलैंड में राजनैतिक चुनाव

Webdunia
- प्रो. डॉ. पुष्पिता अवस्थी

 
प्राय: विश्व के हर देश में जनता ने लोकतंत्र के चुनावी जश्न में राजनेताओं के सामने अपने चयन से चुनौती खड़ी की है। नीदरलैंड की जनता की अपने निर्णय से हर बार ही राजनीति में अपने को सिद्धहस्त समझने वाले नेताओं के दांत खट्टे करती रहती है। ऐसे में सरकार बनकर सत्ता-सुख चाटने वाले राजनेताओं को एक बार फिर कठिन और गंभीर समझौतों के गलियारों से गुजरना पड़ेगा।

एक बार जनता के सामने, पुन: मीडिया और प्रेस के समक्ष अपने सिद्धांतों और लक्ष्यों का बखान कर चुकने के बाद फिर से दूसरी बार चुने हुए प्रतिनिधियों या यूं कहें अपने ही गोतिया हमराज बंधुओं के बीच‍ फिर से सरकार बनाने के लिए घुटना टेककर, नए समीकरण गठित कर सत्ता का नया सांचा और सरकार का नया चेहरे रचने की प्रक्रिया शुरू कर दी है जिसके अपने सुख हैं और अपने दु:ख भी जिसे जनप्रतिनिधि तो जानते ही हैं और अब दुनिया की जनता भी जानने लगी है।
 
चुनाव के दौरान दूरदर्शन के चैनलों पर राजनी‍तिक मुद्दों पर कई-कई घंटों तक मंत्रियों और उनकी पार्टी नेताओं के वक्तव्य होते रहते हैं। टीवी स्टूडियो में सामान्य जनता की भीड़ लगती और जमती रही है। खुले सवाल होते हैं। पैने और खुले हुए जवाब सुनने को मिलते हैं। मीडिया और समाचार पत्र उनके वक्तव्यों से भरे रहते हैं। लेकिन सड़कें, घर, मकान, बसें, ट्रेन, ट्राम न कहीं चुनावी नेता की एक तस्वीर, न कहीं राजनीतिक पार्टी का एक नारा या नाम देखने को मिलता है। देश की देह में चुनाव का एक भी निशान नहीं लगा दिखता है। निशान सिर्फ पार्टी प्रतिनिधियों के ऊपर लगे थे। किन्हीं-किन्हीं महत्वपूर्ण चौराहों पर 3 फुट चौड़े और 15 फुट लंबे लकड़ी के पैनल पर सभी पार्टियों का अपना एक छोटा पोस्टर और नेताओं की तस्वीर भर लगी दिखाई देती है। सड़क पर न कोई माइक, न कोई जुलूस, न कहीं शोर। न कहीं पुलिस और न ही पुलिस का जत्था। न कोई आतंक। न ही अतिरिक्त शराब बहती है और न ही सिगरेटों का धुआं भभकता है। घर-घर वोट मांगने की न कोई परंपरा ही दिखाई दी। 
 
न ही किसी पार्टी का कोई घोषणा-पत्र बंटा। घरों की पत्र पेटिका में चुनावी प्रतिनिधियों का नाम, परिचय-सूची और व्यक्ति के नाम का वोट डालने का कार्ड पहुंचता है और यह कार्ड ही चुनाव-पत्र, राजनीति का चारित्रिक प्रमाण-पत्र था। नेताओं का भाग्य-विधाता चुनावी कार्ड।
 
चुनाव के दिन कहीं कोई चुनावी पंडाल नहीं था। मतदाताओं को ढोने वाली किसी पार्टी की कोई लॉरी-गाड़ी नहीं थी। अपने-अपने क्षेत्र की सार्वजनिक जगहों को चुनावी बूथ बनाया गया था, जहां न किसी पार्टी का पोस्टर, न बैनर, न प्रतिनिधि, न तस्वीर, न पुलिस का आदमी। सिर्फ कम्प्यूटर और एक चुनावी नियंत्रक अधिकारी वहां मौजूद था। जहां लोग अपनी सुविधा से, कार्यालयों की नौकरी के बाद 8 बजे रात तक जाते रहे। अपने बच्चों का, परिवार को साथ लेकर जिससे उंगली पकड़कर चलने वाले बच्चे भी देंखें और जानें, देश के नेताओं के चुनाव की नवीनतम पद्धति। 
 
जनता ने पार्टी और नेताओं की नीतियों के आधार पर अपने वोट दिए थे। परिणाम आने पर किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है। तकरीबन 10 मिलियन मतदाताओं ने इस देश के भाग्य का फैसला विभिन्न पार्टियों की नीतियों को अपना समर्थन देकर किया है न ‍कि पार्टी नेता या पार्टी को।
 
एस.पी. पार्टी के नेता यान मराइनिसन को पहले से तिगुनी सीटें इसलिए मिलीं ‍कि अफगानिस्तान में 1,200 सैनिकों की पठाई से देश के विशेषकर परिवार के नागरिक बहुत क्षुब्ध हैं। इस देश की सरकार रिटायर और बूढ़े व्यक्ति पर लगभग 3,500 यूरो प्रतिमाह खर्च करती है। इसके बावजूद एस.पी. पार्टी ने और अधिक सुविधाएं देने का वादा किया है जिस पर जनता को भरोसा है और उसने अपना वोट दिया है।
 
वी.वी.डी. पार्टी से निकलकर युवा नेता बिल्डर्स ने एक पी.वी.वी. नाम से नई पार्टी गठित की। उसने मुस्लिम जनता को कट्टरपंथ से मुक्त कराने का वादा किया और एकदम नवीन पार्टी और युवा नेता ने 9 सीटें हासिल कीं।
 
भारत के लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की याद दिलाती हुई अपनी वी.वी.डी. पार्टी और इलाके में 'लौह स्त्री' के नाम से विख्यात अप्रवासी मंत्रालय (आई.ए.डी.) की मंत्री रीता फोरडोन्क ने मुस्लिम समाज को बुर्का प्रथा हटाने का वादा किया जिसे देश और विदेश के ही गार्जियन और इंटरनेशनल टेलीग्राफ, हेरल्ड ट्रिब्यून और दी टाइम्स अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। 
 
रीता का इस संदर्भ में कहना है कि सिर और देह को अपनी किसी परंपरा के तहत ढंका जा सकता है लेकिन बुर्के के भीतर चेहरा और आंखें भी ढंके रहने के कारण व्यक्ति के चेहरे और व्यक्तित्व दोनों का अपमान होता है और ऐसे में देश की सुरक्षा को भी आतंक‍वादियों से खतरा पहुंचाए जाने की आशंका बनी रहती है।
 
नीदरलैंड में 1 मिलियन मुस्लिमों का निवास है, जो इस देश की आबादी का 6 प्रतिशत माना जा सकता है। डच मुस्लिम संगठन सी.एम.ओ. का मानना है कि सिर्फ 30 से 50 परिवारों के बीच बुर्का पहनने का चलन है। पर यह देश की नहीं, बल्कि मनुष्यता के सिद्धांत, परंपरा और आचरण का सवाल है। लेकिन यदि इस देश से संवैधानिक तौर पर और अभ्यास के स्तर पर बुर्का प्रथा का चलन उठ गया तो यह मनुष्यता की विजय होगी, स्त्री के मानवीय अधिकारों की जीत होगी और हॉलैंड यूरोप के साथ-साथ विश्व में पहला देश होगा, जहां स्त्री को अंधा बनाने की परंपरा से मुक्ति मिलेगी। 
 
परिणामों के आधार पर सी.डी.ए. पार्टी के नेता और पूर्व क्रिश्चियन विचारों के प्रोफेसर जेन पेटर बालकेनऐन्द, जो चुनाव से पूर्व प्रधानमंत्री रहे हैं और 'हैरी पॉटर' निक नेम से भी जाने जाते हैं, की पार्टी ने 150 सीटों वाले पार्लियामेंट के लिए सबसे अधिक सीटें हासिल की हैं। यद्यपि इनकी संख्या पिछली बार की जीत से कम है फिर भी आगे है जिसे वे हार के बावजूद एक तरह की जीत मानते हैं। कुछ वर्ष पहले दूसरे नंबर पर सीटों पर अपनी विजय बनाए रखने में विपक्ष और लेबर पार्टी के नेता बाउतर बोस की पार्टी की ही जीत दिखाई देती है। सिद्धांतों के अटल और कर्मठ बाउतर बोस से और उनकी लेबर पार्टी से जनता को बहुत आशाएं हैं।

नीदरलैंड की राजनीति में वैसी राजनीतिक हलचलें नहीं होती हैं जिससे जनजीवन प्रभावित हो। यहां की सरकारी व्यवस्था इतनी साफ-सुथरी है कि शासन में कोई भी राजनीतिक पार्टी रहे, लेकिन जनता के अधिकारों और जीवन की रक्षा होती रहती है। चुनाव के समय तो यह आलम है कि लोग वोट देकर आते हैं, पर घर-परिवार-पड़ोस में इसकी चर्चा तक नहीं करते हैं। परिणाम आने पर भी समाज में कोई हलचल नहीं होती है। 

साभार- गर्भनाल 

 
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