Publish Date: Wed, 29 Apr 2026 (16:51 IST)
Updated Date: Wed, 29 Apr 2026 (17:15 IST)
दस महाविद्याओं में छठी महाविद्या माता छिन्नमस्तका की साधना अत्यंत शक्तिशाली और शीघ्र फलदायी मानी जाती है। इन्हें 'प्रचंड चण्डिका' भी कहा जाता है। इनकी साधना आत्म-नियंत्रण, अहंकार के नाश और कुंडलिनी जागरण के लिए की जाती है। चूंकि यह एक उग्र साधना है, इसलिए इसे बिना किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन के शुरू नहीं करना चाहिए।
माता छिन्नमस्तका की साधना कैसे करें? (विधि)
समय और स्थान: इनकी साधना मुख्य रूप से अर्धरात्रि (निशीथ काल) में की जाती है। एकांत स्थान या किसी सिद्ध शक्तिपीठ पर साधना करना उत्तम होता है।
वस्त्र और आसन: साधक को नीले या लाल रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए और कुशा या ऊनी आसन का प्रयोग करना चाहिए।
यंत्र और चित्र: सामने माता छिन्नमस्तका का यंत्र या चित्र स्थापित करें। माता के इस स्वरूप में वे अपना ही कटा हुआ सिर हाथ में लिए हैं और उनकी गर्दन से निकली रक्त की तीन धाराएं उनकी सखियां (जया और विजया) और वे स्वयं पान कर रही हैं।
मंत्र जप: माता के विशेष बीज मंत्रों का जप किया जाता है।
मंत्र: ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीये हूं हूं फट् स्वाहा॥ (गुरु से परामर्श अनिवार्य है)
सावधानी: इस साधना के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन, सात्विक भोजन और मन की पवित्रता अत्यंत आवश्यक है। भयभीत होने वाले व्यक्तियों को यह साधना नहीं करनी चाहिए।
साधना के 5 मुख्य लाभ
माता छिन्नमस्तका की कृपा जिस साधक पर होती है, उसे ये लाभ प्राप्त होते हैं:
1. मानसिक शक्तियों का विकास: माता छिन्नमस्तका 'मस्तिष्क' और 'विचारों' की अधिष्ठात्री हैं। इनकी साधना से साधक की बुद्धि अत्यंत तीव्र हो जाती है और उसमें भविष्य को भांपने की शक्ति (Intuition) आ जाती है।
2. कुंडलिनी जागरण: योग मार्ग में यह साधना बहुत महत्वपूर्ण है। यह 'मूलाधार' से 'सहस्रार' चक्र तक ऊर्जा के प्रवाह को सुगम बनाती है, जिससे आध्यात्मिक उन्नति तेजी से होती है।
3. शत्रुओं पर विजय: 'प्रचंड चण्डिका' के रूप में वे साधक के बाहरी और आंतरिक (काम, क्रोध, लोभ) दोनों प्रकार के शत्रुओं का नाश करती हैं। कोर्ट-कचहरी या विवादों में सफलता मिलती है।
4. कर्ज से मुक्ति और आर्थिक लाभ: माता की कृपा से दरिद्रता का नाश होता है। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से कर्ज में डूबा है, तो विधि विधान से की गई साधना धन आगमन के द्वार खोलती है।
5. अहंकार का नाश और मोक्ष: माता का कटा हुआ सिर इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान प्राप्ति के लिए अहंकार का त्याग आवश्यक है। यह साधना साधक को माया के बंधनों से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाती है।
चेतावनी: माता छिन्नमस्तका की साधना 'वाम मार्ग' और 'दक्षिण मार्ग' दोनों से होती है। गृहस्थों को हमेशा सौम्य या दक्षिण मार्ग से ही पूजा करनी चाहिए और तामसिक क्रियाओं से दूर रहना चाहिए।
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