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35A पर उमर अब्दुल्ला ने भी शुरू कर दी राजनीति, बोले- भुगतने होंगे परिणाम

Webdunia
सोमवार, 14 अगस्त 2017 (15:18 IST)
नई दिल्ली। जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सोमवार को प्रेस कांफ्रेंस के दौरान संविधान के अनुच्छेद 35A के मुद्दे पर भाजपा पर निशाने साधते हुए कहा कि भाजपा इसे हटाने को लेकर प्रोपेगैंडा फैला रही है, जिसके गंभीर परिणाम भुगतना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि भाजपा इसका दुष्प्रचार कर रही है। उमर बोले कि अगर भाजपा कोर्ट के जरिए अनुच्छेद 35ए को खत्म करने में सफल हो जाती है तो उनका राज्य विषय कानून समाप्त हो जाएगा। उन्होंने बताया कि भाजपा ने कहा था कि वह धारा 370 हटाएगी लेकिन जब उसे लगा कि वह संसद के जरिए नहीं हटा सकती है तो कोर्ट में चली गई है।
 
उन्होंने कहा कि भाजपा इस मुद्दे को जम्मू बनाम कश्मीर की लड़ाई बताते हुए प्रॉपेगैंडा फैला रही है। उन्होंने कहा कि अगर इस अनुच्छेद को खत्म किया गया तो अन्य राज्यों के लोग कश्मीर आकर संपत्ति खरीदेंगे और अपने बच्चों के लिए शैक्षिणिक स्कॉलरशिप हासिल करेंगे, राहत सामग्री लेंगे और सरकारी नौकरियां भी ले लेंगे।
 
इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को संकेत दिए कि जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के विशेष अधिकारों से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 35A को चुनौती देने वाली याचिका पर पांच सदस्यीय संविधान बेंच सुनवाई कर सकती है। जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस ए.एम. खानविलकर की पीठ ने सुनवाई के लिए आई याचिका को पहले ही लंबित ऐसी ही एक अन्य याचिका के साथ संलग्न कर दिया जिस पर इस महीने के आखिर में तीन न्यायाधीशों की बेंच सुनवाई करेगी। 
 
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'अगर इस विषय पर पांच जजों की संविधान पीठ से सुनवाई की आवश्यकता महसूस की गई तो तीन जजों वाली पीठ इसे उसके पास भेज सकती है।' जम्मू-कश्मीर सरकार के वकील ने कहा कि जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने 2002 में सुनाए गए अपने फैसले में अनुच्छेद 35A के मुद्दे का 'प्रथम दृष्टया निपटान' कर दिया था।
 
क्या है धारा 370 और अदुच्छेद 35A?
इस वर्ष भारत अपना 71वां स्वतंत्रता दिवस माना रहा है। आज़ादी के 70 साल बाद भी भारत में संविधान की धारा 370 और धारा 35A एक विवादित विषय है। संविधान में अब तक कई संशोधन होकर कई नई धरा जोड़ी या हटाई होगी लेकिन किसी ने भी धारा 370 को हटाने की हिम्मत नहीं दिखाई। दरअसल, इस धारा के चलते कश्मीर के मसले के बीच जम्मू और लद्दाख के लोगों का भी मरण हो चला है। 
 
कश्मीर मामले को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने अपने हाथों में ले लिया और पटेल को इससे अलग रखा। उस वक्त नेहरू और अब्दुल्ला के बीच बातचीत हुई और जम्मू-कश्मीर की समस्या शुरू हो गयी।
इन हालातों को देखते हुए संघीय संविधान सभा में गोपालस्वामी आयंगर ने धारा 306-ए का प्रारूप प्रस्तुत किया था, जो बाद में धारा 370 बन गई। 1951 में राज्य को संविधान सभा को अलग से बुलाने की अनुमति दी गई।
नवंबर, 1956 में राज्य के संविधान का कार्य पूरा हुआ। 26 जनवरी, 1957 को राज्य में विशेष संविधान लागू कर दिया गया। जम्मू-कश्मीर में पहली अंतरिम सरकार बनाने वाले नेशनल कॉफ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्ला ने भारतीय संविधान सभा से बाहर रहने की पेशकश की थी।
 
1947 में हुए बंटवारे के दौरान लाखों लोग शरणार्थी बनकर भारत आए थे। ये लोग देश के कई हिस्सों में बसे और आज उन्हीं का एक हिस्सा बन चुके हैं। दिल्ली, मुंबई, सूरत या जहां कहीं भी ये लोग बसे, आज वहीं के स्थायी निवासी कहलाने लगे हैं। लेकिन जम्मू-कश्मीर में स्थिति ऐसी नहीं है। यहां आज भी कई दशक पहले बसे लोगों की चौथी-पांचवी पीढ़ी शरणार्थी ही कहलाती है और तमाम मौलिक अधिकारों से वंचित है।
 
14 मई 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा एक आदेश पारित किया गया था। इस आदेश के जरिये भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद 35A जोड़ दिया गया। अनुच्छेद 35A जम्मू-कश्मीर की विधान सभा को यह अधिकार देता है कि वह 'स्थायी नागरिक' की परिभाषा तय कर सके और उन्हें चिन्हित कर विभिन्न विशेषाधिकार भी दे सके।
 
यही अनुच्छेद परोक्ष रूप से जम्मू और कश्मीर की विधान सभा को, लाखों लोगों को शरणार्थी मानकर हाशिये पर धकेल देने का अधिकार भी दे देता है। अनुच्छेद 35A (कैपिटल ए) का जिक्र संविधान की किसी भी किताब में नहीं मिलता। हालांकि संविधान में अनुच्छेद 35a (स्मॉल ए) जरूर है, लेकिन इसका जम्मू और कश्मीर से कोई सीधा संबंध नहीं है।
 
भारतीय संविधान में आज तक जितने भी संशोधन हुए हैं, सबका जिक्र संविधान की किताबों में होता है। लेकिन 35A कहीं भी नज़र नहीं आता। दरअसल इसे संविधान के मुख्य भाग में नहीं बल्कि परिशिष्ट (अपेंडिक्स) में शामिल किया गया है। यह चालाकी इसलिए की गई ताकि लोगों को इसकी कम से कम जानकारी हो।
 
भारतीय संविधान की बहुचर्चित धारा 370 जम्मू-कश्मीर को कुछ विशेष अधिकार देती है। 1954 के जिस आदेश से अनुच्छेद 35A को संविधान में जोड़ा गया था, वह आदेश भी अनुच्छेद 370 की उपधारा (1) के अंतर्गत ही राष्ट्रपति द्वारा पारित किया गया था।
 
भारतीय संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ देना सीधे-सीधे संविधान को संशोधित करना है। यह अधिकार सिर्फ भारतीय संसद को है। इसलिए 1954 का राष्ट्रपति का आदेश पूरी तरह से असंवैधानिक है। अनुच्छेद 35A दरअसल अनुच्छेद 370 से ही जुड़ा है। और अनुच्छेद 370 एक ऐसा विषय है जिससे न्यायालय तक बचने की कोशिश करता है। यही कारण है कि इस पर आज तक स्थिति साफ़ नहीं हो सकी है।
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