हाशिमपुरा नरसंहार पुलिस द्वारा की गई लक्षित हत्या, 16 पूर्व पुलिसकर्मियों को उम्रकैद

गुरुवार, 1 नवंबर 2018 (00:14 IST)
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में हाशिमपुरा नरसंहार के तीन दशक से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को 16 पूर्व पुलिसकर्मियों को निहत्थे, निर्दोष और निस्सहाय लोगों की लक्षित हत्या का जिम्मेदार ठहराते हुए उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। 
 
निचली अदालत के प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी (पीएसी) के 16 आरोपी पुलिसकर्मियों को बरी करने के 2015 के आदेश को पलटते हुए न्यायमूर्ति एस मुरलीधर और विनोद गोयल की पीठ ने इस मामले को हिरासत में हत्या का मामला बताया जहां मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वालों के प्रभावी अभियोजन में कानूनी तंत्र नाकाम रहा। 
 
अदालत ने कहा कि वह यह समझती है कि इस नरसंहार में मारे गए लोगों के परिवार के लिए यह बहुत देर बाद बहुत थोड़ी राहत है क्योंकि उन्हें न्याय के लिए 31 साल इंतजार करना पड़ा।
 
नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी जुल्फिकार नासिर ने कहा कि पुलिस और सरकार ने हमेशा से इस केस को कमजोर करने की कोशिश की, मगर हमने हिम्मत नहीं हारी और केस लड़ते रहे। देर से सही मगर आज इंसाफ मिला है। लेकिन यदि दोषियों को फांसी की सजा सुनाई जाती तो और सुकून मिलता। उन्होंने कहा कि मामला अगर सुप्रीम कोर्ट गया तो हम वहां भी अपने के लिए लड़ेंगे। 
 
उन्होंने बताया, ‘अंतत: आज इंसाफ हुआ। दोषियों को फांसी की सजा मिलती तो ज्यादा सुकून मिलता।’ अदालत ने कहा कि पीएसी ने मेरठ शहर के हाशिमपुरा इलाके में 22 मई 1987 करीब 42-45 मुस्लिम व्यक्तियों, बुजुर्ग और जवान, को एक जगह इकट्ठा किया और सशस्त्र बल के ट्रक में उन्हें ले गए। पीड़ितों को पीएसी के कर्मियों ने दो अगल-अलग जगहों पर 303 राइफल से गोली मारी और उनके शवो को दो नहरों - गंग नहर और हिंडन नदी- में फेंक दिया। 
 
सुनवाई के दौरान वकीलों की तरफ से अदालत के समक्ष कहा गया कि कुल 42 लोगों की हत्या की गई थी। लेकिन अदालत ने अपने 73 पन्नों के फैसले में कहा कि इस नरसंहार में 38 लोग मारे गए जबकि पांच जिंदा बच गए। 38 मृतकों में से सिर्फ 11 के शवों की शिनाख्त बाद में उनके परिजनों द्वारा की जा सकी। बाकी बचे शवों को बरामद नहीं किया जा सका। 
 
अदालत ने दोषियों को 22 नवंबर तक आत्मसमर्पण करने का निर्देश देते हुए कहा कि करीब दो दशकों तक चली मामले की सुनवाई और व्यवस्थागत वजहों से हुई देरी ने पीड़ितों के लिए प्रभावी न्याय के प्रयास को निराश किया। अदालत ने कहा कि दोषियों के आत्म्समर्पण न करने पर संबंधित थानाधिकारी उन्हें हिरासत में लें। 
 
दंगों की एक घटना जिसमें कथित तौर पर दंगाइयों द्वारा पीएसी की दो राइफलें छीन ली गईं के ठीक बाद एक अल्पसंख्यक समुदाय के 42-45 लोगों का अपहरण और उनमें से 38 लोगों की लक्षित हत्या इस मामले का ‘व्यथित’ करने वाला पहलू है। 
 
उच्च न्यायालय ने प्रादेशिक आर्म्ड कॉन्स्टेबुलरी (पीएसी) के 16 पूर्व जवानों को हत्या, अपहरण, आपराधिक साजिश तथा सबूतों को नष्ट करने का दोषी करार दिया। उम्रकैद का प्रभावी अर्थ ये है कि अब वे अपनी बची हुई प्राकृतिक जिंदगी जेल की सलाखों के पीछे गुजारेंगे। 
 
अदालत से सेवानिवृत्त हो चुके सभी 16 दोषियों पर 30-30 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया। उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा जनसंहार में बचे जुल्फिकार नासिर सहित निजी पक्षों की अपीलों पर छह सितंबर को सुनवाई पूरी की थी। 
 
इससे पहले 21 मार्च 2015 को निचली अदालत ने पीएसी के 16 पूर्व जवानों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। अदालत ने कहा था कि सबूतों के अभाव में उनकी पहचान निर्धारित नहीं की जा सकती। 
 
हाशिमपुरा नरसंहार काण्ड के प्रभावित परिवारों की याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने सितंबर 2002 में इस मामले को दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया था।
 

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