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दशकों के संघर्ष और कुर्बानियों से बना है उत्तराखंड, चारधाम के कारण भी काफी ख्याति है राज्य की

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एन. पांडेय

मंगलवार, 9 नवंबर 2021 (17:10 IST)
देहरादून। 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड अस्तित्व में आया था। इसके बाद यह देश का 27वां राज्य बना। इसका गठन उत्तरप्रदेश की तत्कालीन सरकार द्वारा उत्तराखंड क्रांतिदल जैसे क्षेत्रीय संगठन समेत तमाम दलों के लंबे संघर्ष के बाद किया गया था। इसके गठन के लिए हुए आंदोलन के दौरान हुए कई संघर्षों ने यहां के नौजवानों व महिलाओं की कुर्बानी भी ली। लोगों ने अपने प्राणों की आहुति देकर यह राज्य प्राप्त किया। हालांकि इसको लेकर पार्टियां अब अपनी पीठ ठोंकती नहीं अघातीं।
 
उत्तराखंड का गठन भाजपा की केंद्रीय सरकार के वक्त में होने से उसने इसको उत्तरांचल नाम डे डाला था, जो 2000 से 2006 तक उत्तरांचल ही चलता रहा। लेकिन आंदोलनकारियों ने इस नाम को बदलने की मांग इसलिए जारी रखी, क्योंकि आंदोलन उत्तराखंड के नाम से चला था। इसलिए इस नाम को बदल उत्तराखंड करने का एक प्रस्ताव केंद्र को भेजने के बाद इस नाम को जनवरी 2007 में स्थानीय लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए बदल दिया गया। तब से 'उत्तरांचल' का नाम 'उत्तराखंड' हो गया।
 
उत्तराखंड के सीमावर्ती राज्यों में तिब्बत, नेपाल, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और उत्तरप्रदेश शामिल हैं। उत्तराखंड को देवों की भूमि देवभूमि और पर्यटन के लिए भी जाना जाता है। उत्तराखंड पहला ऐसा राज्य है, जहां पर हिन्दी के बाद संस्‍कृत शब्‍द को आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त है। उत्तरप्रदेश का हिस्सा रहे उत्तराखंड की सीमाएं उत्तर में तिब्बत और पूर्व में नेपाल से लगी हुई हैं। पश्चिम में हिमाचल प्रदेश और दक्षिण में उत्तरप्रदेश इसकी सीमा से लगे राज्य हैं।

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उत्तराखंड हिन्दू धर्म में सबसे पवित्र मानी जाने वाली देश की सबसे बड़ी नदियों गंगा और यमुना का उद्गम स्थल है। इसके अलावा राज्य में प्राकृतिक खूबसूरती के केंद्र जैसे ग्लेशियर, नदियां, घने जंगल और बर्फ से ढंकी पर्वत चोटियां उपस्थित हैं। इसमें 4 सबसे पवित्र और श्रद्धेय हिन्दू मंदिर भी हैं जिन्हें उत्तराखंड के चारधाम (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री) के रूप में भी जाना जाता है। उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक स्थल केदारनाथ, ऋषिकेश, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, उत्तरकाशी, देवप्रयाग, पंचप्रयाग आदि प्रमुख हैं। चारधाम की यात्रा के अहम हिस्से केदारनाथ के कपाट अप्रैल से नवंबर महीने के बीच खुलते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या हर साल नए नए रिकॉर्ड तोड़ती है।
 
हर की पौड़ी हरिद्वार में गंगा घाट पर हर दिन सूर्यास्त के बाद गंगा आरती होती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु घाट पर इकट्ठा होते हैं। उत्तराखंड राज्य का सबसे प्रमुख त्योहार कुंभ मेला है। साल में कान्वाद यात्रा जो मानसून के शुरू सावन महीने में होती है, में यहां 15 दिन के भीतर 5 करोड़ लोग गंगा का जल लेने आते हैं। साथ ही चमोली का गौचर मेला, बागेश्वर का उत्तरायणी, चम्पावत जिले का पूर्णगिरि मेला, नंदादेवी राजजात यात्रा प्रमुख है। सालभर यहां कहीं-न-कहीं कोई-न-कोई उत्सव आपको होता दिखेगा। ऐसे में इसे उत्सवप्रिय राज्य भी कह सकते हैं।
 
उत्तराखंड में ऋषिकेश तो अंतरराष्ट्रीय योग की राजधानी के रूप में विख्यात है। यहां श्रद्धालुओं से लेकर पर्यटकों की आवाजाही खासी अधिक रहती है। एडवेंचर गतिविधियों के साथ ही अध्यात्म की दृष्टि से इसकी बहुत महत्ता है। नैनीताल एक सरोवर नगरी के रूप में देश-विदेश के लोगों की आकर्षण स्थली तो रही ही, इस जिले को इसमें मौजूद जिम कार्बेट पार्क को भी पूरे विश्व में जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान की वजह से भी दुनिया जानती है। उत्तराखंड का टिहरी अब जलक्रीड़ाओं के लिए विख्यात हो रहा है। यहां स्थित टिहरी बांध भारत का सबसे ऊंचा बांध है। यहां से पैदा की जाने वाली बिजली पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा व दिल्ली तक वितरित की जाती है।
 
1970 में हुए चिपको आंदोलन उत्तराखंड का सबसे चर्चित आंदोलन रहा है। इस आंदोलन में एक विशेष समूह (खासकर महिलाओं) ने पेड़ों की रक्षा के लिए पेड़ों को गले से लगा लिया था। उत्तराखंड के राज्य का फूल ब्रह्मकमल है। यह वही सुंदर कमल फूल है, जो ब्रह्माजी के हाथों में सुशोभित है। ब्रह्मकमल का इस्तेमाल आईटीएलएस मेडिकल प्रोजेक्‍ट्स के लिए भी प्रमुख रूप से किया जाता है। गंगा नदी उत्तराखंड का प्रतीक मानी जाती है, वहीं राज्य पशु हिमालयन कस्तूरी प्रिय है, हिमालयन मोनाल है, राज्‍य पेड़ बुरांश है और राज्य फूल ब्रह्मकमल है।
 
उत्तराखंड की नामचीन हस्तियों में उत्तरकाशी जिले की बछेंद्री पाल माउंट एवरेस्ट को फतह करने वाली पहली भारतीय महिला हैं। अल्मोड़ा जिले में जन्मे गोविंद वल्‍लभ पंत प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी थे। सुमित्रानंदन पंत प्रसिद्ध छायावादी कवि थे तो अभिनव बिंद्रा ओलंपिक में निशानेबाजी में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय थे। हेमवतीनंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी जैसे नेता इस राज्य से ही आते थे। डॉ. मुरली मनोहर जोशी का भी यही राज्य जन्म स्थल रहा। इन सबने अपने नेतृत्व शक्ति से पूरे देश को नेतृत्व दिया।

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