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ध्यान क्या है, जानिए पवित्र ग्रंथ गीता के अनुसार

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-डॉ. रामकृष्ण सिंगी 
ध्यान एक योगक्रिया है, विद्या है, तकनीक है, आत्मानुशासन की एक युक्ति है जिसका प्रयोजन है एकाग्रता, तनावहीनता, मानसिक स्थिरता व संतुलन, धैर्य और सहनशक्ति प्राप्त करना। ध्यान अपने अंतर में ही रमण करने का, अपनी अंतश्चेतना को विकसित करने का, बाहरी विकारों से मुक्त होकर मन की निर्मलता प्राप्त करने का एक उपक्रम है। अनुभवी लोग बताते हैं कि ध्यान क्रिया से इन सब उद्देश्यों की प्राप्ति सचमुच सुगम होती है। इस दृष्टि से इस विद्या की उपादेयता स्वयंसिद्ध है बशर्ते यह एक शगल न बन जाए।

यदि यह एक निरुद्देश्य व्यसन का रूप ले लेती है तो निष्क्रियता, पलायन, एकांतिक जीवन, आत्मकेंद्रित चिंतन-प्रवृत्ति का कारण बन सकती है, जो इस संघर्षमय संसार में क्रियाशील लोगों के लिए घातक हो सकती है। ध्यान और समाधि की चेष्टाओं में लिप्त लोगों में यह प्रवृत्ति सहज देखी जा सकती है।


गीता के पांचवें और छठे अध्याय में ध्यान योग की सरल विधि संक्षेप में वर्णित है। यह इस प्रकार है- 
 
अ) किसी शुद्ध या पवित्र स्थान पर आसन बिछा लेना चाहिए। यह बैठने का स्थान न तो बहुत ऊंचा होना चाहिए और न बहुत नीचा।
 
ब) इस आसन पर बैठकर मन और इन्द्रियों की क्रियाओं पर नियंत्रण करने का प्रयत्न करना चाहिए ताकि मन में एकाग्रता आ जाए। फिर अंत:करण की शुद्धि के लिए ध्यान योग का अभ्यास करना चाहिए। 
 
स) इस हेतु काया, सिर व गले को समान एवं अचल (स्थिर) रखकर सुखासन में बैठना चाहिए तथा इधर- उधर से ध्यान हटाकर नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि जमाने का प्रयास करना चाहिए। 
 
(अध्याय 6, श्लोक 11, 12 व 13)
 
द) अथवा भारी विषयों के चिंतन से मन को हटाकर नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थिर करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण एवं अपान वायु को सम करना चाहिए। 
 
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवौ:।
प्राणापानौ समौकृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ।।
 
अध्याय 5/27
 
ध) तब मन को संयमित, उत्तेजनारहित एवं शांत करते हुए उसे ईश्वर के चिंतन व ध्यान में लगाना चाहिए। इस प्रकार निर्विकार एवं निर्मल मन वाला तथा आत्मा को निरंतर परमात्मा के ध्यान में लगाता हुआ योगी परमानंद की पराकाष्ठा-स्वरूप परम परम शांति को प्राप्त होता है। 
 
अध्याय 6/15
 
इ) यह स्मरण रखना चाहिए कि यह योग न तो बहुत खाने वाले का, न बहुत भूखा रहने वाले का, न बहुत सोने वाले का और न बहुत जागने वाले का सिद्ध होता है। वास्तव में आनंद और शांति देने वाला यह योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले, जीवन-कर्म में उचित प्रकार से रत रहने वाले तथा यथायोग्य (यानी सम्यक प्रकार से) सोने-जागने का ही सिद्ध (अर्थात सफल) होता है।
 
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।। अध्याय 6/17


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