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प्रेम काव्य : इस कदर उसकी यादें सताने लगी

राकेशधर द्विवेदी
इस कदर उसकी यादें
सताने लगी,


 
वो सपने में हूर बनकर
आने लगी।
 
यह तो उसका मुझ पर
अहसान था,
वो मुझे देखकर
मुस्काने लगी।
 
चांद से अब मैं कैसे
शिकवा करूं,
वो चांदनी बनकर
गुनगुनाने लगी।
 
इस कदर उसकी यादें
सताने लगी,
वो सपने में हूर बनकर
आने लगी।
 
देखकर उसको
मुझको ऐसा लगा,
जिंदगी फिर से
गीत गाने लगी।
 
मैं न कैसे गजल
उस पर लिखूं,
वो फूल बनकर
मुस्काने लगी।
 
इस कदर उसकी यादें
सताने लगी,
वो सपने में हूर बनकर
आने लगी।
 
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