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बात एक रात की...

Webdunia
जनकसिंह झाला

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रात के करीब 12 बजे होंगे। अचानक ही मेरी नींद खुल गई। ड्राइवर ने बस को जोरदार ब्रेक मारा। बस का टायर पंक्चर हो जाने से वह बड़ी मुश्किल से स्टेयरिंग पर काबू कर सका था।

बारिश का मौसम होने के कारण बस में भी बहुत कम मुसाफिर थे। हम सभी लोग बस से नीचे उतर गए। सभी को जो भी वाहन मिला उनसे लिफ्ट लेकर इंदौर के लिए रवाना हुए। मैं अकेली डरी-सहमी हुई थी। सोचा था बस में ही रात गुजार दूँ लेकिन दो अनजान आदमियों (ड्राइवर और कंडक्टर) का भरोसा एक लड़की कैसे कर सकती है। एक लड़की के लिए भूत-पलीतों से ज्यादा डर उन लोगों से रहता है जो औरतों को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं। जब बस के सभी यात्री वहाँ से रवाना हो गए तब मेरा यह डर बहुत ही बढ़ गया।

मैंने चलना शुरू किया। रास्ते में सोचती जा रही थी मालूम होता तो ओंकारेश्वर में रहनेवाले मेरे चाचा के घर से जल्दी निकल जाती। इस मुसीबत का सामना तो नहीं करना पड़ता शायद भगवान मेरी परीक्षा लेना चाहता था। आकाश में बिजली गरज रही थी। आसपास कुछ भी दिखाई नहीं देता था। चारों ओर बस जंगल ही जंगल।

कभी-कभी जंगली जानवरों की आवाज कानों से टकराकर चली जाती थी। चाँद भी आज मुझसे रूठा था। मालूम नहीं कहाँ छुप गया था। करीब आधा घंटा चली कि अचानक ही एक कार मेरे पास आकर रुक गई। उसे एक साँवला युवक चला रहा था। मैडम इतनी रात गए आप कहाँ जा रही हैं और ये बारिश...'चलो मैं आपको लिफ्ट दे देता हूँ।'

मेरे सामने एक विकट समस्या खड़ी हो गई..अगर उसको मना कर देती तो शायद कोई दूसरा मददगार न मिलता और अगर हाँ कह देती हूँ तो एक अनजाने शख्स पर भरोसा करूँ तो भी कैसे? एक तरफ कुआँ तो दूसरी तरफ खाई।

माँ कहा करती थी कि बेटी जब भी तुम कोई मुश्किल में फँस जाओ और उससे बाहर निकलने के लिए दो विकल्प हो..तब उसी विकल्प को पसंद करो जो तुम्हारा दिल चाहता है। मैंने वही किया और आखिर में उसकी कार की अगली सीट पर बैठ गई। उसका नाम दीपक था जो इस अंधकारभरी रात में मेरे लिए दीपक बनकर रास्ता दिखाने आ गया था।

बातों-बातों में मालूम पड़ा कि वह ग्वालियर का था और इंदौर किसी बिजनेस के काम से जा रहा है। मैंने उसमें एक बात खास देखी। पिछले आधे घंटे में उसने एक भी बार मेरे सामने नहीं देखा था। मुझे वह थोड़ा अकड़ू लगा। थोड़ा गुस्सा भी आया। शायद यह पहला शख्स होगा जिसको मेरी सुंदरता ने शिकार नहीं बनाया होगा। मेरा बदन भी पूरी तरह भीग चुका था।

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उसने आगे बढ़कर मुझसे कोई बात नहीं की, जो भी सवाल मैंने किए वह सिर्फ उसका जवाब देता गया। यहाँ तक कि मुझे सामने से कहना पड़ा कि मेरा नाम निशा है और मैं इंदौर की रहने वाली हूँ। रात को ही उसे रास्ते में मोबाइल आया कि जिन लोगों से वह मिलने के लिए जा रहा है उन्हें इंदौर आने में कुछ वक्त लगेगा। अत: वह 4-6 घंटे और इंतजार कर ले।

करीब-करीब सुबह छ: बजे मैं अपने घर पहुँच गई। मैं इस मददगार को अपने परिवार से मिलवाना चाहती थी लेकिन अफसोस घर पर ताला लगा था। मेरे दिमाग में यह बात तो बिल्कुल ही नहीं रही कि मम्मी-पापा पाँच दिनों के लिए एक रिश्तेदार की बेटी की शादी में भोपाल गए हुए हैं। अब इस शख्स को घर के अंदर ले जाऊँ तो भी कैसे? वह स्थिति समझ गया और जाने की तैयारी करने लगा।

लेकिन मैंने हिम्मत जुटाकर उससे कॉफी पीने का आग्रह किया जिसके लिए वह राजी हो गया। हम घर के अंदर गए। मैं उसको गेस्ट रूम में बैठाकर कॉफी बनाने चली गई। कॉफी पीने के बाद मैंने उससे कहा कि आप आज हमारे मेहमान हैं। वैसे भी आपको ग्वालियर जाने की जल्दी नहीं है... बुरा न मानें तो जाते-जाते हमारा यह शहर ही देखकर जाइए।

  यह पत्र जब तुम्हारे पास पहुँचेगा तब तक मैं इस दुनिया को अलविदा कह चुका होउँगा। मैंने तुम्हारी दी हुई गणेशजी की मूर्ति उसी अनाथाश्रम के मंदिर में रख दी है जहाँ पर मैं पला-बढ़ा था।      
अचानक मेरे प्रस्ताव से उसकी आँखें चार हो गई। एक तो वह पहले से ही डरा हुआ था क्योंकि जब से वह मेरे घर में दाखिल हुआ था तब से अपने हाथ में पहनी हुई घड़ी को बार बार देख रहा था शायद वह जल्दी मुझसे छुटकारा पाना चाहता था।

परंतु वह मेरी बात को नहीं टाल सका। हँसकर बोला चलिए इसी बहाने आपका शहर देख लेंगे। हम दोनों तैयार होकर निकल पड़े। इंदौर की 2-3 ख्यात जगह दिखाने के बाद आखिर में हम खजराना मंदिर पहुँचे।

उस दिन मंदिर के ट्रस्ट के द्वारा एक रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया था। मैंने पहले भी अनेक बार रक्त दान किया और इसमें मुझे बहुत सुकून मिलता है और मैंने यहाँ भी खून देने का निर्णय लिया और दीपक को भी इसके लिए प्रेरित किया। लेकिन उसने इसमें रूचि नहीं दिखाई। उसके इस निर्णय पर मुझे आश्चर्यमिश्रित दुख हुआ।

दर्शन करने के बाद हम वापस आए। मैंने बीच रास्ते में कुछ सामान खरीदा उसको उपहार के तौर पर गणेशजी की एक छोटी प्रतिमा दी। अब हमारी जुदाई का समय आ गया था। मैंने उसकी सहायता के लिए आभार व्यक्त करते हुए उसे विदा किया। पल भर में ही उसकी कार मेरी नजरो से ओझल हो गई। लेकिन जल्दबाजी और घबराहट में उसका कॉन्टैक्ट नंबर लेना भूल गई या वह ग्वालियर में कहाँ रहता है यह भी नहीं जान पाई।

खैर इस बात को तीन महीने हो गए। मैं अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गई। एक दिन दोपहर को अचानक ही मेरे घर की डोरबेल बजी... डाकिया डाक छोड़कर गया था। मैंने उसको उठाया। वह किसी अनाथाश्रम से आया था। मैं उसे पढ़ने लगी।

'' प्रिय निशा'

मुझे मालूम है कि तुम मुझसे नाराज होगी..तुम्हारा गुस्सा होना भी लाजमी भी है...क्योंकि मैंने एक भी बार तुमसे प्यार से बात नहीं की। तुमसे मुलाकात के बाद दिल करता था कि निशा का दीपक बनकर जीवनभर जगमगाता रहूँ लेकिन इस दीपक की लौ में इतनी ताकत नहीं थी कि वह जीवनभर तुम्हारा साथ दे सकती। जीवन में हम जो चाहते हैं वह हमें कभी नहीं मिलता और हमने जिसके बारे में कल्पना भी नहीं कि होती वह अचानक हमारी नजरों के सामने आकर खड़ा हो जाता है।

मुझे ब्लड कैंसर था और इसकी जानकारी भी डॉक्टरों को अंतिम स्टेज पर आकर हुई थी। इसीलिए उस दिन मैं रक्तदान नहीं कर सका था।

डॉक्टरों के अनुसार मेरी जिंदगी के सिर्फ तीन महीने बचे हैं इसलिए ही जीवन के अंतिम दिनों में भगवान की खोज के लिए निकल पड़ा था। ओंकारेश्वर से लेकर खजराना तक इस खोज में तुमने मेरा साथ दिया।

यह पत्र जब तुम्हारे पास पहुँचेगा तब तक मैं इस दुनिया को अलविदा कह चुका होउँगा। मैंने तुम्हारी दी हुई गणेशजी की मूर्ति उसी अनाथाश्रम के मंदिर में रख दी है जहाँ पर मैं पला-बढ़ा था।

- दीपक

खत पढ़ने के बाद मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई। मेरे आँसू ठहरने का नाम नहीं ले रहे थे। अचानक ही आँखों के सामने अँधेरा छा गया जब आँख खुली तो मैं एक बिस्तर पर लेटी थी। सामने मम्मी और पापा एक डॉक्टर के साथ चिंतित मुद्रा में खड़े थे।

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