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यह थी सांईं बाबा की अंतिम इच्छा, जानिए...

अनिरुद्ध जोशी
हिन्दुओं में यह प्रथा प्रचलित है कि जब किसी मनुष्य का अंत काल निकट आ जाता है तो उसे धार्मिक ग्रंथ आदि पढ़कर सुनाए जाते हैं। मुख्य रूप से गीता सुनाए जाने का प्रचलन इसलिए है, क्योंकि वह वेदों का सार है और संक्षिप्त भी है।
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धर्मग्रंथ का कोई अध्याय या गीता को सुनाए जाने का प्रचलन इसलिए है ताकि व्यक्ति की बुद्धि से सांसारिक भावना छुटकर धार्मिक भावना का विकास हो और उसे सद्गति प्राप्त हो। कहते ‍हैं कि अंत काल में अच्छी भावनाओं को मन में भर लेना चाहिए, क्योंकि व्यक्ति जिस भावना से देह छोड़ता है उसे वैसी ही गति मिलती है और उस गति के अनुसार ही उसे वैसा ही दूसरा जीवन मिलता है।
 
हालांकि यह भी सच है कि सांईं बाबा तो एक सिद्ध योगी थे। उनके लिए किसी भी धर्मग्रंथ को सुनना जरूरी नहीं था फिर भी उन्होंने अपने भक्तों के समक्ष यह इच्‍छा प्रकट की थी। अब सवाल यह है कि कौन सा धर्मग्रंथ सुनें? 
 
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दूसरों के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करने हेतु ही बाबा ने धर्मग्रंथ सुनने की प्रथा का सम्मान किया। दो-तीन दिन पूर्व ही प्रातःकाल से बाबा ने भिक्षाटन करना स्थगित कर दिया और वे मस्जिद में ही बैठे रहने लगे। वे अपने अंतिम क्षण के लिए पूर्ण सचेत थे इसलिए वे अपने भक्तों को धैर्य बंधाते रहते।  
 
जब बाबा को लगा कि अब जाने का समय आ गया है, तब उन्होंने श्री वझे को 'रामविजय प्रकरण' (श्री रामविजय कथासार) सुनाने की आज्ञा दी। श्री वझे ने एक सप्ताह प्रतिदिन पाठ सुनाया। तत्पश्चात ही बाबा ने उन्हें आठों प्रहर पाठ करने की आज्ञा दी।

श्री वझे ने उस अध्याय की द्घितीय आवृत्ति 3 दिन में पूर्ण कर दी और इस प्रकार 11 दिन बीत गए। फिर 3 दिन और उन्होंने पाठ किया। अब श्री. वझे बिलकुल थक गए इसलिए उन्हें विश्राम करने की आज्ञा हुई। बाबा अब बिलकुल शांत बैठ गए और आत्मस्थित होकर वे अंतिम क्षण की प्रतीक्षा करने लगे।
 
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इन दिनों काकासाहेब दीक्षित और श्रीमान बूटी बाबा के साथ मस्जिद में नित्य ही भोज करते थे। महानिर्वाण (15 अक्टूबर) के दिन आरती समाप्त होने के पश्चात बाबा ने उन लोगों को भी अपने निवास स्थान पर ही भोजन करके लौटने को कहा। फिर भी लक्ष्मीबाई शिंदे, भागोजी शिंदे, बयाजी, लक्ष्मण बाला शिम्पी और नानासाहेब निमोणकर वहीं रह गए। शामा नीचे मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठी थीं।
 
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लक्ष्मीबाई शिंदे को 9 सिक्के देने के पश्चात बाबा ने कहा कि मुझे मस्जिद में अब अच्छा नहीं लगता है इसलिए मुझे बूटी के पत्थरवाड़े में ले चलो, जहां मैं सुखपूर्वक रहूंगा। ये ही अंतिम शब्द उनके श्रीमुख से निकले। इसी समय बाबा बयाजी के शरीर की ओर लटक गए और अंतिम श्वास छोड़ दी। भागोजी ने देखा कि बाबा की श्वास रुक गई है तब उन्होंने नानासाहेब निमोणकर को पुकारकर यह बात कही। नानासाहेब ने कुछ जल लाकर बाबा के श्रीमुख में डाला, जो बाहर लुढ़क आया। तभी उन्होंने जोर से आवाज लागाई... अरे। देवा!
 
बाबा समाधिस्थ हो गए।
 
संदर्भ : श्रीसांईं सच्चरित्र (सांईं बाबा पर सबसे प्रामाणिक ग्रंथ)

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