Biodata Maker

हिंदू मंदिर की वास्तु रचना

अनिरुद्ध जोशी
प्राचीन काल से ही किसी भी धर्म के लोग सामूहिक रूप से एक ऐसे स्थान पर प्रार्थना करते रहे हैं, जहां पूर्ण रूप से ध्यान लगा सकें, मन एकाग्र हो पाए या ईश्वर के प्रति समर्पण भाव व्यक्त किया जाए। इसीलिए मंदिर निर्माण में वास्तु का बहुत ध्यान रखा जाता था।
 
यदि हम भारत के प्राचीन मंदिरों पर नजर डाले तो पता चलता है कि सभी का वास्तुशील्प बहुत सुदृड़ था। जहां जाकर आज भी शांति मिलती है। मंदिर की भव्यता का मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। घर की वास्तुपूजा के समय जो मंडल बनता है वह मंदिर का मंडल ही तो है?
 
यदि आप प्राचीनकाल के मंदिरों की रचना देखेंगे तो जानेंगे कि सभी कुछ-कुछ पिरामिडनुमा आकार के होते थे। शुरुआत से ही हमारे धर्मवेत्ताओं ने मंदिर की रचना पिरामिड आकार की ही सोची है। हिंदू मंदिरों की वास्तु रचना में ज्‍योतिषीय और खगोलशास्त्र का ध्यान भी रखा जाता था।
 
आपने देखा होगा कि हमारे देश के कुछ मंदिर कर्क रेखा के ठीक नीचे बने हुए हैं। उज्जैन और ओंकारेश्वर का मंदिर इसका उदाहरण है। शक्तिपीठ और ज्योतिर्लिंग में जहां वास्तुकला का विशेष ध्यान रखा गया वहीं इसकी रचना के आकाशीय ग्रह-नक्षत्रों की चाल और मौसम को ध्यान में रखकर स्थान चयन और दिशा ज्ञान का भी ध्यान रखा गया है।
 
जहां तक पिरामिडनुमा रचना की बात करें तो ऋषि-मुनियों की कुटिया भी उसी आकार की होती थी। हमारे प्राचीन मकानों की छतें भी कुछ इसी तरह की होती थी। बाद में रोमन, चीन, अरब और युनानी वास्तुकला के प्रभाव के चलते मंदिरों के वास्तु में परिवर्तन होता रहा।
 
विद्वान मानते हैं कि मंदिर पिरामिडनुमा और पूर्व, उत्तर या ईशानमुखी होता है। कई मंदिर पश्चिम, दक्षिण, आग्नेय या नैरत्यमुखी भी होते हैं, लेकिन क्या हम उन्हें मंदिर कह सकते हैं? वे अन्य कोई पूजा-स्थल हो सकते हैं।
 
मंदिर का मुख : उत्तर या ईशानमुखी होने के पीछे कारण यह कि ईशान से आने वाली उर्जा का प्रभाव ध्यान-प्रार्थना के लिए अति उत्तम माहौल निर्मित करता है। मंदिर पूर्वमुखी भी हो सकता है किंतु फिर उसके द्वार और गुंबद की रचना पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
 
प्राचीन मंदिर ध्यान या प्रार्थना के लिए होते थे। उन मंदिर के स्तंभों या दीवारों पर ही मूर्तियां आवेष्टित की जाती थी। मंदिरों में पूजा-पाठ नहीं होता था। यदि आप खजुराहो, कोणार्क या दक्षिण के प्राचीन मंदिरों की रचना देखेंगे तो जान जाएंगे कि मंदिर किस तरह के होते हैं।
 
ध्यान या प्रार्थना करने वाली पूरी जमात जब खतम हो गई है तो इन जैसे मंदिरों पर पूजा-पाठ का प्रचलन बड़ा। पूजा-पाठ के प्रचलन से मध्यकाल के अंत में मनमाने मंदिर बने। मनमाने मंदिर से मनमानी पूजा-आरती आदि कर्मकांडों का जन्म हुआ जो वेदसम्मत नहीं माने जा सकते। अब देखिए सती माता का मंदिर, पालिया भैरव का मंदिर और न जाने कौन कौन से मंदिर। जरा इनका इतिहास जानें।

सम्बंधित जानकारी

Show comments
सभी देखें

ज़रूर पढ़ें

कौन था मायावी कालनेमि? योगी आदित्यनाथ के बयान के बाद क्यों छिड़ी है सनातन पर नई बहस?

धार की भोजशाला: जहाँ पत्थरों पर खुदी है 'संस्कृत' और दीवारों में कैद है परमारों का वैभव

नर्मदा परिक्रमा का क्या है महत्व, कितने दिन चलना पड़ता है पैदल

Video: यमुना नदी में कालिया नाग का अवतार? सोशल मीडिया पर वायरल दावे का जानिए पूरा सच

Vastu Remedies: वास्तु दोष निवारण के सबसे असरदार 5 उपाय

सभी देखें

धर्म संसार

26 January Birthday: आपको 26 जनवरी, 2026 के लिए जन्मदिन की बधाई!

Aaj ka panchang: आज का शुभ मुहूर्त: 26 जनवरी 2026: सोमवार का पंचांग और शुभ समय

जया एकादशी 2026: जीवन में सफलता और संकटों से मुक्ति दिलाने वाले 10 अद्भुत लाभ

Aaj Ka Rashifal: आज का दैनिक राशिफल: मेष से मीन तक 12 राशियों का राशिफल (25 जनवरी, 2026)

25 January Birthday: आपको 25 जनवरी, 2026 के लिए जन्मदिन की बधाई!

अगला लेख