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न समझने की ये बातें हैं
न समझने की ये बातें हैं न समझाने की, ज़िंदगी उचटी हुई नींद है दीवाने की - फिराक़
ज़िंदगी ए ज़िंदगी
ढूँढ़ने निकला था तुझको और ख़ुद को खो दिया, तू ही अब मेरा पता दे, ज़िंदगी ए ज़िंदगी - ज़क़ा सिद्दीक
अश्क का कतरा वही गंगा हुआ
जो पराई पीर में नीरज बहा, अश्क का कतरा वही गंगा हुआ।
सारी बस्ती सुला के आई है
सारी बस्ती सुला के आई है , ऐसा लगता है जैसे याद उसकी , सारी दुनिया भुला के आई है। - अज़ीज़ अंसारी
उसे जज़्बात से मतलब नहीं
फूल की ख़ुशबू वफ़ा की बात से मतलब नहीं, वो तो पत्थर है, उसे जज़्बात से मतलब नहीं - इब्राहीम अश्क
यूँ ज़िन्दगी गुज़ार रहा हूँ
यूँ ज़िन्दगी गुज़ार रहा हूँ तेरे बग़ैर, जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैं ---- ज़िगर
हँसी का मज़ा हमसे पूछिये
हँसने का शौक़ हमको भी था आपकी तरह, हँसिये, मगर हँसी का मज़ा हमसे पूछिये - 'खुमार' बाराबंकवी
मिलना था इत्तेफ़ाक...
मिलना था इत्तेफ़ाक, बिछड़ना नसीब था , वो इतनी दूर हो गया, जितना करीब था।
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के, वो जा रहा है कोई शबे-ग़म गुज़ार के।
ज़िंदगी की राहों में
ज़िंदगी की राहों में, रंजो-ग़म के मेले हैं भीड़ है क़यामत की, फिर भी हम अकेले हैं - सबा अफ़ग़ानी
सख्त जाँ हो गया
सख्त जाँ हो गया तूफानों से टकराने पर , लोग समझते थे तिनकों सा बिखर जाऊँगा - अज़ीज़ अंसारी
बन्दगी से खुदा नहीं मिलता
आशिक़ी से मिलेगा ए ज़ाहिद, बन्दगी से खुदा नहीं मिलता ------ दाग़
फिर किसी ने मिज़ाज पूछा है
फिर मेरी आँख हो गई नमनाक, फिर किसी ने मिज़ाज पूछा है - मजाज़
खुद आईना हो जाऊँगा
अपने हर लफ़्ज़ का खुद आईना हो जाऊँगा उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा - वसीम बरेलवी
तुमने किया न याद कभी
तुमने किया न याद कभी भूलकर हमें , हमने तुम्हारी याद में सबकुछ भूला दिया - बहादुर शाह जफ़र
तुमसे मिले ज़माना हुआ
तुमसे मिले ज़माना हुआ फिर भी लगे , जैसे तुम मिलके गए अभी-अभी
दिल को सुकून रूह को आराम
दिल को सुकून रूह को आराम आ गया मौत आ गई कि यार का पैग़ाम आ गया।
हमने क्या चाहा था इस दिन के लिए
तुमने बदले हमसे गिन-गिन के लिए, हमने क्या चाहा था इस दिन के लिए - दाग़ देहलवी
जिस्म की बात नहीं थी
जिस्म की बात नहीं थी, उनके दिल तक जाना था लंबी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है - हस्तीमल 'हस्ती'
इश्क़ पे ज़ोर नहीं
इश्क़ पे ज़ोर नहीं है, ये वो आतिश 'ग़ालिब', कि लगाये न लगे और बुझाये न बने।
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