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हम खफ़ा कब थे
बेसबब बात बढ़ाने की ज़रूरत क्या है, हम खफ़ा कब थे, मनाने की ज़रूरत क्या है - शाहिद कबीर
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद , जो नहीं जानते वफ़ा क्या है - ग़ालिब
हर एक बात पे कहते हो
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है, तुम्हीं कहो कि ये अन्दाज़े-ग़ुफ़्तगू क्या है - ग़ालिब
वो भी ऐसे में आ जाए अचानक
ऐ काश वो भी ऐसे में आ जाए अचानक , मौसम बहुत दिनों में सुहाना हुआ तो है - अज़ीज़ अंसारी
मुश्किल नहीं है कुछ भी
कहिये, तो आसमां को ज़मीं पे उतार लायें मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिये - शहरयार
शर्म तुमको मगर नहीं आती
काबा किस मुँह से जाओगे ग़ालिब, शर्म तुमको मगर नहीं आती -- ग़ालिब
दिल भी यारब कई दिए होते
मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था, दिल भी यारब कई दिए होते।
बनावट है ये सारा गुस्सा
हम न कहते थे, बनावट है ये सारा गुस्सा हँस के लो फिर वो उन्होंने हमें देखा।
चाहने वालों से गर मतलब नहीं
चाहने वालों से गर मतलब नहीं , आप फिर पैदा हुए किनके लिए - दाग़ देहलवी
उसमें गहराई समंदर की कहाँ
चहचहाकर सारे पंछी उड़ गए वार जब सैयाद का खाली गया
तुम्हें याद करने लगते हैं
तुम्हारी याद के जब ज़ख्म भरने लगते हैं, किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं।
आज तुम याद बेहिसाब आए
कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब, आज तुम याद बेहिसाब आए।
किसे हँसने का यहाँ वक़्त मिला है
इतवार की इक शाम तो बच्चों में रहूँ मैं , वरना किसे हँसने का यहाँ वक़्त मिला है ----- सैफ़ी
लोग जाते हैं अगर ...
लोग जाते हैं अगर चाँद नगर तक जाएँ हम तड़पते हैं के बस आपके दर तक जाएँ---याक़ूब तसव्वुर
मैं गया वक़्त नहीं हूँ
महरबाँ होके बुलालो मुझे चाहो जिसदम-------- मैं गया वक़्त नहीं हूँ के फिर आ भी न सकूँ ----- ग़ालिब
तुझसे भी दिलफ़रेब हैं
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया, तुझसे भी दिलफ़रेब हैं, ग़म रोज़गार के।
इश्क़ ने ग़ालिब
इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के।
मैं तुझको हार चला था
मैं तुझको हार चला था, गये ज़माने को ख़ुशी ने दिल को दुखाया तो तेरी याद आई।
दोनों जहान तेरी मुहब्बत में हार के
हुस्नो-इश्क तो धोका है
किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी, ये हुस्नो-इश्क तो धोका है सब, मगर फिर भी - फिराक़
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