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तुझे हम वली समझते
ये मसाइले-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान ग़ालिब, तुझे हम वली समझते जो न बादाख़्वार होता।
रेहबर जोनपुरी की ग़ज़लें
दिनेश चंचल की ग़ज़लों की पहली किताब 'इज़हार'
दामन बचा के
ये पानी जाल तक मछली को लाके गुज़र जाता है ख़ुद दामन बचा के
ग़ालिब की ग़ज़लें
ख़ून के बग़ैर
घायल बेचारा मर गया ख़ून के बग़ैर, सबकी रगों में ख़ून था लेकिन सफ़ेद था। ----- जोया
लखनऊ के कुछ शायरों के यादगार अशआर
दुनिया का वरक़ दीदा-ए-अरबाब-ए-नज़र में इक ताश का पत्ता है कफ़-ए-शोबदागर में ---सफ़ी
नज़्म : माहौल
कमरे में एक बंगले के बैठे थे मर्द-ओ-ज़न फ़ैशन परस्त लोग थे उरयाँ थे पैरहन
इश्क़ इक मीर भारी पत्थर है
इश्क़ इक मीर भारी पत्थर है कब ये मुझ नातवाँ से उठता है----- मीर तक़ी मीर
अहमद निसार
हो तअल्लुक़ तुझसे जब तक ज़िन्दगी बाक़ी रहे दोस्ती बाक़ी नहीं तो दुश्मनी बाक़ी रहे
खिड़की से निकलता हुआ सूरज
रखता है मेरे घर के दर-ओ-बाम को रोशन हमसाए की खिड़की से निकलता हुआ सूरज -----मेहबूब राही
मुसलमाँ बन न सका
मस्जिद तो बना ली शब भर में ईमाँ की हरारत वालों ने दिल अपना पुराना पापी है बरसों में मुसलमाँ बन न सक
आरज़ू (सय्यद अनवर हुसैन) की ग़ज़लें
राह-ए-तलब से दिल को न रोको, जाए अगर तो जाने दो गिर के संभलना बेहतर होगा, इक ठोकर खा जाने दो
मेरी आदत है मुस्कुराने की
हुजूम-ए-ग़म मेरी फ़ितरत बदल नहीं सकते, मैं क्या करूँ मेरी आदत है मुस्कुराने की।
ईदमुबारक
रोती आँखों को हँसाने से ईद होती है, साथ में सब के मनाने से ईद होती है, सब गले मिलके कहें ईदमुबारक ...
दुनिया का कारोबार
उस आदमी को सौंप दो दुनिया का कारोबार जिस आदमी के दिल में कोई आरज़ू न हो - कै़सर इंदौरी
नज़्म : मैं ईद क्या मनाऊँ!
ईद और चाँद से मुताल्लिक़ अशआर
घर-घर जाकर तुम यारों से आज सईद मिलो भूल के सारी गुज़री बातें, दिल से ईद मिलो
बापू की याद : शे'री भोपाली
हज़ल : देखते जाओ
पूँछ कुत्ते की जो टेढ़ी हो तो कुछ भी न बने और तेरी ज़ुल्फ़ में ख़म' हो तो ग़ज़ल होती है
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