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सादगी और निर्मलता का प्रतीक है वसंत पंचमी...

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* वसंत पंचमी : प्रकृति के उत्सव का दिन
 

 
 
 
वसंत पंचमी में सूर्य उत्तरायण होता है, जो यह संदेश देता है कि हमें सूर्य की तरह गंभीर और प्रखर बनना चाहिए। सभी ऋतुओं में वसंत ही ऐसी ऋतु है जिसमें सभी ऋतुओं की अपेक्षा धरती की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। इस दौरान फसल पकती है। पेड़-पौधों में नई कोपलें फूटती हैं। 
 
वासंती रंग को हिन्दू धर्म में शुभ माना गया है। वासंती रंग (पीला) शुद्ध और सात्विक प्रवृत्ति का परिचायक है। यह सादगी और निर्मलता का भी प्रतीक है। वसंत पंचमी के बारे में यह भी मान्यता है कि इस दिन शिवजी ने पार्वतीजी से विवाह के लिए हामी भरी थी। इस दिन शिवजी का लगन चढ़ा था। 
 
वीणावादिनी मां सरस्वती की आराधना का यह पर्व मंद-शीतल वायु के प्रवाह, प्रकृति की पीली चुनरी के साथ नए उत्साह के संचार का संदेश लाता है। मां सरस्वती को श्वेत रंग पसंद है और चावल सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। इसीलिए इस दिन मां सरस्वती को चावल का भोग लगाया जाता है।

 

इस दिन वासंती यानी पीले रंग के वस्त्र धारण करने के साथ पीले रंग के चावल, पीला रायता, वासंती पूरियां, पीले लड्डू व केसर की खीर बनाई जाती है। 


 
वसंत के मौसम में सबसे ज्यादा शुक्र का प्रभाव रहता है। ज्योतिषियों की नजर से देखें तो शुक्र काम और सौंदर्य के कारक हैं। इसलिए यह अवधि रति-काम महोत्सव मानी जाती है।

माना जाता है कि इस मौसम में कामदेव अपनी पत्नी रति के साथ पृथ्वी का भ्रमण करते हैं। वसंत कामदेव मदन के प्रिय मित्र हैं और कामदेव धरती पर लोगों में काम भावना जाग्रत करते हैं।
 
वसंत को ऋतुराज कहा गया है यानी सभी ऋतुओं का राजा। वसंत पंचमी यानी प्रकृति के उत्सव का दिन। इस दिन के मुहूर्त को अबूझ मुहूर्त माना जाता है।

अबूझ सावा होता है यानी विवाह के लिए किसी पंडित से मुहूर्त निकलवाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह दिन अपने आपमें ही खास माना जाता है तथा इस दिन हुए शुभ मांगलिक कार्य ‍जीवन भर शुभता प्रदान करते हैं, इसी वजह से कई जोड़े परिणय सूत्र में बंध जाते हैं। 

 
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