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क्या आपने कभी कहा है : मैं हूं ना

प्रज्ञा पाठक
जब हम किसी के दुःख में सहभागी बनते हैं, तो सच में बहुत बड़ा मानवीय कर्म करते हैं। उसका दुःख तो यथावत् रहता है, किन्तु उसका दंश कम हो जाता है। कई बार दुःख की सघनता उसे शून्य मस्तिष्क कर देती है और कोई राह नहीं सूझती। तब सहयोग का एक हाथ, संवेदना का एक स्पर्श उसे समाधान की झलक दे देता है। दुःख अलग-अलग स्वरूपों में आता है। कहीं यह बिलकुल निजता में लिपटा हुआ आता है, तो कहीं सहज सामाजिक सन्दर्भों से वलयित। सामाजिक सन्दर्भों वाले दुखों में अक्सर बीमारी, नौकरी का अभाव, संतानों के विवाह, वृद्धावस्था आदि शामिल होते हैं, जिन पर सम्बन्धित व्यक्ति प्रायः चर्चा करने में संकोच नहीं करता। ऐसी दशा में हम जिस भी स्तर की मदद कर सकते हैं, अवश्य करें। संभव है कि हमारा एक कदम उसके लिए प्यासे को मिली एक जल-बूँद के समान बन जाये।
 
निजता में आबद्ध दुःख में सहभागी होने के लिए सर्वप्रथम 'निजता' की रक्षा की जानी चाहिए। आप उस 'अपने' को दुखी देखकर इतने विचलित हो जाते हैं कि सबसे पहले कारण जानने के लिए व्यग्र हो जाते हैं और यहीं वह आपसे दूर हो जाता है क्योंकि कई बार दुःख का कारण इतना दारुण और लज्जास्पद होता है कि सम्बन्धित के लिए उसे खुलकर कहना अत्यंत कठिन होता है। ऐसे में बेहतर यही होता है कि आप उसे केवल यह विश्वास दिलाएं कि आप हर स्थिति में उसके साथ हैं। उससे दुःख के कारण पर चर्चा के स्थान पर केवल उस दुःख के समाधान पर बात करें और उस दिशा में अपनी भूमिका तय करें। यकीन मानिये, आपका इतना सहयोग उसे अपार बल देगा। उसे महसूस होगा कि वह अकेला नहीं है। वस्तुतः यह मानवीय स्वभाव है कि सुख में सम्पूर्ण दुनिया 'अपनी' लगती है और दुःख में 'एकाकी' हो जाने का विषाद घेर लेता है। आपको उस अपने प्रियजन को इस 'एकाकीपन' से दूर ले जाना चाहिए। 
 
इसके लिए अपने ह्रदय के समूचे स्नेह से उसकी आत्मा को स्पर्श करें। यदि आप उसके साथ भौतिक रूप से हैं, तो उसके निकट बैठकर उसके हाथों को अपने हाथों में लेकर मौन बैठें। आपका यह निर्मल स्पर्श उसका मन पढ़ लेगा और वहीं से विषाद के काले बादल छंटने लगेंगे। जब वह सहज हो जाये, तब आप समाधान पर जाएँ। यदि आप उससे दूर हैं, तो उसके दुःख पर अपनी स्नेहपगी वाणी का शीतल लेप लगाते रहिये। उसे वे सभी कार्य करने के लिए प्रोत्साहित कीजिये, जिनसे उसे आंतरिक प्रसन्नता मिले और उसका दुःख कम हो सके। आप उसे दुःख के बीच आनंदपूर्वक जीने की राह बताइये और यदि संभव हो तो स्वयं भी उस राह का एक पड़ाव बन जाइये, जहां वो जब भी रुके, उसका तप्त मन शीतलता की दो बूँद पाकर तृप्त हो जाये।
 
ईश्वर ने 'मानवीयता' के अणुओं से हमारी रचना की है। तभी हम मानव कहलाये। 'कहलाना' तो सभी के साथ है, लेकिन जो उसे अपने आचरण से सिद्ध भी कर दे, वही सच्चा मानव है। अन्य शब्दों में इसे ही 'मानवीयता' कहते हैं।
 
तो फिर देर किस बात की? अपनी मानवीयता को खुलकर जीयें। किसी 'अपने' को निज स्नेह की छाँव दीजिये, उसके दुःख पर संवेदना का मरहम लगाइये, उसके कष्ट को ह्रदय से अपना लीजिये, उसकी कंटकाकीर्ण जीवन-राह पर आत्मीयता के पुष्प बिखेर दीजिये और हौले-से उसके हाथों को अपने हाथों में लेकर कहिये-" मैं हूं ना।"

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