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काली हूं, पर कमजोर नहीं; IAS शारदा मुरलीधरन ने रंगभेद की कब्र खोद डाली

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संदीपसिंह सिसोदिया

, गुरुवार, 27 मार्च 2025 (17:48 IST)
Sarada Muraleedharan Speaks Out Against Color Bias: "क्या तुम मुझे वापस पेट में डालकर गोरी और सुंदर बना सकती हो?" यह सवाल चार साल की मासूम शारदा ने अपनी मां से पूछा था। आज वही शारदा मुरलीधरन केरल की मुख्य सचिव हैं, एक शक्तिशाली IAS अधिकारी, जिन्होंने अपने काले रंग को लेकर समाज की कड़वी सच्चाई को उजागर किया है। उनकी फेसबुक पोस्ट ने न सिर्फ व्यक्तिगत दर्द को बयां किया, बल्कि उस गहरे नस्लभेद को भी सामने लाया, जो भारत में पिछले 300 सालों से जड़ें जमाए बैठा है। यह कहानी केवल शारदा की नहीं, बल्कि हर उस भारतीय की है, जिसे अपने रंग के कारण कभी न कभी हीनता का शिकार बनाया गया।

एक टिप्पणी ने तोड़ा मौन: शारदा ने अपनी पोस्ट में खुलासा किया कि हाल ही में एक अनजान शख्स ने उनके काम पर टिप्पणी करते हुए कहा, "आपका काम आपकी तरह ही काला, यानी हीन है।" यह टिप्पणी उनके पति वी. वेणु, जो गोरे हैं और पिछले साल मुख्य सचिव के पद से रिटायर हुए, के साथ तुलना में की गई थी। सितंबर 2024 में शारदा ने जब यह पद संभाला, तो सोशल मीडिया पर उनके रंग को लेकर तंज शुरू हो गए। लेकिन इस बार वह चुप नहीं रहीं। उन्होंने लिखा, "मुझे अब अपने कालेपन को लेकर रक्षात्मक होने की जरूरत नहीं। यह वक्त है कि मैं इसे गर्व से स्वीकार करूं और उन लाखों लोगों को हिम्मत दूं, जो इस पूर्वाग्रह से जूझ रहे हैं।"

300 सालों का नस्लभेदी इतिहास: भारत में रंगभेद की जड़ें गहरी हैं। 18वीं सदी में जब अंग्रेजों ने भारत पर कब्जा किया, तो उन्होंने गोरे रंग को श्रेष्ठता का प्रतीक बनाया। कालेपन को गुलामी, अज्ञानता और हीनता से जोड़ा गया। यह सोच औपनिवेशिक काल से चली आ रही है और आज भी समाज में जिंदा है। जिस देश में राम से लेकर कृष्ण तक श्यामवर्ण गार्गी और अनुसूया जैसी विदुषियों का देश, जहां कभी बुद्धि को शरीर से ऊपर रखा गया, वहां आज भी काला रंग शर्मिंदगी का सबब बना हुआ है। शारदा का सवाल गूंजता है—क्यों काला रंग बुराई और निराशा का प्रतीक बन गया? यह सिर्फ एक रंग नहीं, बल्कि सदियों की गुलामी और पूर्वाग्रह की वह काली छाया है, जो हमारे मन में बस गई है।

बचपन से लेकर 50 साल तक का दर्द: शारदा ने अपनी पोस्ट में बचपन का वह किस्सा साझा किया, जब चार साल की उम्र में उन्होंने अपनी मां से पूछा था कि क्या वह उन्हें गोरा बना सकती हैं। यह सवाल मासूमियत से नहीं, बल्कि समाज के उस जहरीले बीज से निकला था, जो कहता है—गोरा ही सुंदर, गोरा ही श्रेष्ठ। अगले 50 साल तक वह इस बोझ को ढोती रहीं। उन्होंने लिखा, "मैं गोरे रंग से आकर्षित थी और अपने कालेपन को देखकर खुद को कमतर मानती थी।" यह दर्द सिर्फ उनका नहीं, बल्कि हर उस बच्चे का है, जिसे स्कूल में, परिवार में, या समाज में अपने रंग के लिए ताने सुनने पड़ते हैं।

शारदा की सोच में बदलाव की शुरुआत उनके बच्चों से हुई। उन्होंने लिखा, "मेरे बच्चों ने काले रंग में वह खूबसूरती देखी, जो मैं कभी नहीं देख पाई। उन्होंने मुझे सिखाया कि काला शानदार है, यह ब्रह्मांड का सच है, बादलों की गहराई है, काजल की चमक है।" उनके पति वेणु ने भी उन्हें इस पूर्वाग्रह के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया। आज शारदा कहती हैं, "मुझे अपने काले रंग से प्यार हो गया है।"

समाज के लिए एक सबक: शारदा की यह पोस्ट सिर्फ एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी संदेश है। जब एक IAS अधिकारी, जो अपनी योग्यता से देश के सबसे ऊंचे पदों तक पहुंची, को अपने रंग के लिए नीचा दिखाया जा सकता है, तो सोचिए उस मासूम बच्चे पर क्या बीतती होगी, जिसे हर दिन अपने रंग, कद, या बनावट के लिए ताने सुनने पड़ते हैं। यह समाज का वह काला सच है, जिसे हम नजरअंदाज करते आए हैं। शारदा ने लिखा, "इस बदलाव की शुरुआत परिवार और स्कूल से होनी चाहिए। हमें बच्चों को सिखाना होगा कि सुंदरता रंग में नहीं, आत्मा में होती है।"

शारदा मुरलीधरन की यह भावुक अपील नस्लभेद के खिलाफ एक जंग का आगाज है। यह सिर्फ काले रंग की बात नहीं, बल्कि उस सोच की बात है, जो हमें बांटती है। भारत जैसे देश में, जहां अष्टावक्र जैसे महाज्ञानी ने साबित किया कि बुद्धि शरीर से बड़ी होती है, वहां रंग को लेकर यह भेदभाव शर्मनाक है। शारदा की आवाज उन तमाम लोगों के लिए उम्मीद की किरण है, जो अपने रंग को लेकर असुरक्षित महसूस करते हैं। यह वक्त है कि हम कालेपन को गर्व से गले लगाएं और 300 साल पुरानी इस काली सोच को जड़ से उखाड़ फेंकें। क्योंकि सच तो यह है—काला सिर्फ रंग नहीं, शक्ति है, साहस है, और एक नई सुबह का वादा है।


 

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