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14 अप्रैल 2026 से सोलर नववर्ष होगा प्रारंभ, क्या है यह?

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solar new year 2026
Solar New Year 2026: भारतीय कैलेंडर सौर, चंद्र और नक्षत्र तीनों पर आधारित है। कुछ राज्य सौर कैलेंडर को और कुछ राज्य चंद्र कैलेंडर को मानते हैं। चंद्र कैलेंडर चैत्र प्रतिपदा से प्रारंभ होता है और सौर कैलेंडर सूर्य के मेष राशि में जाने से प्रारंभ होता है। इसका अर्थ है कि मेष संक्रांति वाला दिन सोलर नववर्ष का प्रथम दिन होता है। इस बार मेष संक्रांति 14 अप्रैल 2026 मंगलवार को सुबह 09:38 पर रहेगी। पुण्य काल प्रात: 05:57 से प्रारंभ होकर 01:55 पर समाप्त होगा।

सोलर वर्ष के माह:

मेष से लेकर मीन राशि तक के नाम सोलर वर्ष के नाम है। शास्त्रानुसार सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में गोचरवश प्रवेश करने को 'संक्रांति' कहा जाता है। एक सौर वर्ष में बारह संक्रांतियां आती हैं यानी 12 माह होते हैं। सूर्य गोचरवश एक राशि में एक माह तक रहते है अत: संक्रांति प्रतिमाह आती है। इन समस्त बारह संक्रांतियों में मेष संक्रांति, मकर संक्रांति, कर्क संक्रांति, मिथुन संक्रांति, धनु संक्रांति और मीन संक्रांति का खास महत्व माना गया है।
 
12 राशियों को सौर मास माना जाता है- सौर मास के नाम:- मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्‍चिक, धनु, कुंभ, मकर, मीन। सौर नववर्ष सूर्य के मेष राशि में जाने से प्रारंभ होता है। सूर्य जब एक राशि ने निकल कर दूसरी राशि में प्रवेश करता है तब दूसरा माह प्रारंभ होता है। 12 राशियां सौर मास के 12 माह है। सौरवर्ष का पहला माह मेष होता है।
 

सौरमास क्या है जानिए:

सूर्य के राशि परिवर्तन को संक्रांति कहते हैं। सौर मास के नववर्ष की शुरुआत मकर संक्रांति से मानी जाती है। वर्ष में 12 संक्रां‍तियां होती हैं, उनमें से 4 का महत्व है- मेष, कर्क, तुला और मकर संक्रांति। वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ संक्रांति विष्णुपद संज्ञक हैं। मिथुन, कन्या, धनु, मीन संक्रांति को षडशीति संज्ञक कहा गया है। मेष, तुला को विषुव संक्रांति संज्ञक तथा कर्क, मकर संक्रांति को अयन संज्ञक कहा गया है।
 
यह सौरमास प्राय: 30, 31 दिन का होता है। कभी-कभी 28 और 29 दिन का भी होता है। मूलत: सौरमास (सौर-वर्ष) 365 दिन का होता है। इसी सौरमास के आधार पर ही रोमनों ने अपना कैलेंडर विकसित किया था। फिर इसमें परिवर्तन कर ग्रेगोरियन कैलेंडर विकसित किया किया, जो सौरमास के समान है।
 

शास्त्रानुसार एक सौर वर्ष में होते हैं दो अयन:

1. उत्तरायण
2. दक्षिणायण

1. उत्तरायण (सौम्यायन)

अवधि: मकर संक्रांति से शुरू होकर मिथुन राशि तक (लगभग 14 जनवरी से 14 जुलाई)।
मान्यता: इसे 'देवताओं का दिन' माना जाता है। यह समय सकारात्मकता और शुभता का प्रतीक है।
महत्व: विवाह, मुंडन, गृह-प्रवेश और यज्ञोपवीत जैसे सभी मांगलिक कार्यों के लिए यह श्रेष्ठ समय है।
ऋतुएँ: इसमें शिशिर, वसंत और ग्रीष्म ऋतुएँ आती हैं।
 

2. दक्षिणायन (याम्यायन)

अवधि: कर्क संक्रांति से शुरू होकर धनु राशि तक (लगभग 14 जुलाई से 14 जनवरी)।
मान्यता: इसे 'देवताओं की रात्रि' माना जाता है। इस काल में सौर ऊर्जा तुलनात्मक रूप से कम प्रभावी मानी जाती है। यह चातुर्मास का समय भी है।
महत्व: इस अवधि में विशेष मांगलिक कार्यों की मनाही होती है, लेकिन अनिवार्य होने पर वैदिक विधान से इन्हें संपन्न किया जा सकता है।
ऋतुएँ: इसमें वर्षा, शरद और हेमंत ऋतुएँ आती हैं।
 

3. ये भारतीय कैलेंडर हैं सौर वर्ष से संबंधित: 

  1. शक संवत (भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर)
  2. बंगाली कैलेंडर (बंगाब्द)
  3. मलयालम कैलेंडर (कोल्ला वर्षम)
  4. तमिल कैलेंडर (पुथांडु)
  5. ओडिया कैलेंडर (पांजी)
  6. विक्रम संवत (यह सौर और चंद्र दोनों पर आधारित है)

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