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Meen sankranti 2026: मीन संक्रांति कब है, क्या महत्व है इसका?

WD Feature Desk
शुक्रवार, 6 मार्च 2026 (17:13 IST)
सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में परिवर्तन को संक्रांति कहते हैं। 15 मार्च 2026 को सूर्य कुंभ से निकलकर मीन राशि में गोचर करने लगेगा। इस गोचर को ही मीन संक्रांति कहते हैं। सूर्य जब धनु या मीन राशि में होता है तब तक के समय को खरमास या मलमास कहते हैं। कहते हैं कि इस दौरान सूर्य की गति मंद पड़ती हुई नजर आती है। उसका प्रकाश भी धरती पर पहले की अपेक्षा कम हो जाता है। 
 

मीन संक्रांति का महत्व: सौर वर्ष का समापन और आध्यात्मिक साधना का काल

हिंदू पंचांग के अनुसार, जब सूर्य देव अपने निरंतर भ्रमण के दौरान देवगुरु बृहस्पति की राशि 'मीन' में प्रवेश करते हैं, तो उस पावन घड़ी को मीन संक्रांति कहा जाता है। जिस तरह चंद्र गणना में फाल्गुन अंतिम मास होता है, ठीक उसी तरह सौर वर्ष के चक्र में मीन संक्रांति वर्ष की अंतिम संक्रांति मानी जाती है। यह समय प्रकृति और ब्रह्मांड में एक बड़े बदलाव का सूचक है, जो विदाई और नई शुरुआत के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
 

खरमास: मांगलिक कार्यों पर विराम, साधना का आरंभ

मीन संक्रांति के साथ ही 'खरमास' या 'मलमास' का प्रारंभ हो जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब सूर्य गुरु की राशियों (धनु या मीन) में विराजमान होते हैं, तो उनका तेज कुछ कम हो जाता है। यही कारण है कि इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और यज्ञोपवीत जैसे शुभ व मांगलिक कार्यों को वर्जित माना गया है। यह समय सांसारिक उत्सवों का नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर झांकने और ईश्वर की शरण में जाने का है।
 

अध्यात्म और दान की शक्ति

भले ही इस मास में भौतिक मांगलिक कार्य वर्जित हों, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से यह समय 'वरदान' की तरह है। मीन संक्रांति पर पवित्र नदियों (गंगा, यमुना) में स्नान करना और सूर्य देव को अर्घ्य देना विशेष फलदायी माना जाता है। इस दौरान बृहस्पति देव की कृपा पाने के लिए गुरुवार का उपवास रखना और मंदिर में पीली वस्तुओं का दान करना सुख-सौभाग्य लाता है।
 

सेवा और समर्पण का मार्ग

खरमास के दौरान तिल, नए वस्त्र और अनाज का दान करने का विधान है। बेजुबान जानवरों की सेवा, विशेषकर गाय को चारा खिलाना, कुंडली के दोषों का शमन करता है। संक्षेप में कहें तो मीन संक्रांति हमें सिखाती है कि जब बाहरी शोर (उत्सव) थम जाता है, तब अपने आराध्य की आराधना और निस्वार्थ सेवा ही शांति का असली मार्ग बनती है।

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