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ब्रेन एन्यूरिज़्म: समय पर पहचान और सही इलाज से बच सकती है जान, जानें एक्सपर्ट की राय

WD Feature Desk
शनिवार, 14 फ़रवरी 2026 (12:23 IST)
Brain aneurysm: ब्रेन एन्यूरिज़्म दिमाग की नसों से जुड़ी एक गंभीर बीमारी है, जिसे अक्सर लोग सामान्य सिरदर्द समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। जबकि हकीकत में यह स्थिति जानलेवा भी हो सकती है। दिमाग की नसें लगातार खून की सप्लाई करती हैं, लेकिन जब किसी नस की दीवार कमजोर हो जाती है, तो वहां गुब्बारे जैसा उभार बन जाता है। इसी उभार को ब्रेन एन्यूरिज़्म कहा जाता है। समय के साथ यह उभार बढ़ सकता है और अचानक फटने की स्थिति में दिमाग में खून बहने लगता है, जिसे ब्रेन हेमरेज कहा जाता है।
 
सीएचएल केयर अस्पताल के न्यूरोसर्जन डॉ. सिद्धार्थ शर्मा बताते हैं कि एन्यूरिज़्म के फटने पर मरीज को अचानक बेहद तेज सिरदर्द होता है। यह दर्द इतना ज्यादा होता है कि मरीज इसे अपनी जिंदगी का सबसे खराब सिरदर्द बताता है। यह दर्द माइग्रेन से अलग होता है, क्योंकि माइग्रेन में अक्सर आधे सिर में दर्द होता है, जबकि एन्यूरिज़्म फटने पर पूरे सिर में असहनीय दर्द महसूस होता है। कई मामलों में मरीज बेहोश हो सकता है, उसकी समझने-बोलने की क्षमता कम हो जाती है और वह असामान्य रूप से चिड़चिड़ा हो सकता है। उल्टी, चक्कर आना और गर्दन में अकड़न जैसे लक्षण भी देखने को मिलते हैं।
 
डॉ. सिद्धार्थ शर्मा के अनुसार, ऐसे लक्षण सामने आते ही तुरंत जांच कराना बेहद जरूरी होता है। आमतौर पर सबसे पहले सीटी स्कैन किया जाता है, जिससे दिमाग में खून जमा होने की जानकारी मिलती है। अगर ब्रेन हेमरेज की पुष्टि होती है, तो आगे सीटी एंजियोग्राफी की जाती है। इस जांच से यह स्पष्ट हो जाता है कि दिमाग की कौन सी नस में एन्यूरिज़्म है और वह किस जगह पर फटा है।
 
इलाज की बात करें तो ब्रेन एन्यूरिज़्म के दो प्रमुख उपचार विकल्प मौजूद हैं। डॉ. शर्मा बताते हैं कि एक तरीका सर्जिकल क्लिपिंग है, जिसमें ऑपरेशन के जरिए एन्यूरिज़्म पर क्लिप लगाकर खून के बहाव को रोका जाता है। दूसरा तरीका एंडोवैस्कुलर कॉइलिंग है, जिसमें पैर की नस से एक पतली तार के जरिए दिमाग की नस तक पहुंचकर एन्यूरिज़्म के अंदर कॉइल डाली जाती है, जिससे वह बंद हो जाता है। किस मरीज में कौन सा इलाज बेहतर रहेगा, यह एन्यूरिज़्म की जगह और आकार पर निर्भर करता है।
 
डॉ. सिद्धार्थ शर्मा बताते हैं कि हाई ब्लड प्रेशर ब्रेन एन्यूरिज़्म का एक बड़ा कारण माना जाता है। इसके अलावा कुछ मामलों में यह जेनेटिक भी हो सकता है। यह समस्या आमतौर पर 30 से 60 वर्ष की उम्र के लोगों में ज्यादा देखी जाती है और ठंड के मौसम में इसके फटने का खतरा बढ़ जाता है। समय पर ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखना, धूम्रपान से बचना और नियमित स्वास्थ्य जांच कराना इस गंभीर बीमारी से बचाव में मददगार साबित हो सकता है।

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