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COVID के बाद Air Pollution भारत का सबसे बड़ा खतरा, दिल-फेफड़ों को ले रहा चपेट में, नहीं संभले तो परिणाम भयावह

वेबदुनिया न्यूज डेस्क
शनिवार, 27 दिसंबर 2025 (15:39 IST)
देश में कोरोना संक्रमण (COVID-19) के बाद वायु प्रदूषण (Air Pollution) हेल्‍थ के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर दरवाजे पर दस्‍तक दे रहा है। कोरोना संक्रमण का खतरा तो हमारे सामने था, लेकिन वायु प्रदूषण बेहद चुपचाप तरीके से लोगों के दिल और फेफड़ों में घुसपैठ कर उन्‍हें डैमेज कर रहा है।

दुनियाभर के डॉक्‍टरों और विशेषज्ञों ने अलर्ट किया है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो इस खतरे का ग्राफ हर साल बढ़ता जाएगा। उन्‍होंने चेतावनी दी है कि कई तरह की अनजान बीमारियां एक बड़ी लहर के रूप में धीरे- धीरे पसरकर एक नया खतरा बन रही है। अब सिर्फ रोकथाम से काम नहीं चलेगा।

सतह में पसर रहा नया खतरा : ब्रिटेन के लिवरपूल में काम करने वाले कंसल्टेंट फेफड़ों के डॉ मनीष गौतम भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की कोविड सलाहकार समिति के पूर्व सदस्य रह चुके हैं। उन्‍होंने PTI को चर्चा में बताया कि उत्तर भारत में करोड़ों लोग पहले से ही इस प्रदूषण से प्रभावित हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि जो बीमारियां दिख रही हैं, वो सिर्फ हिमशैल की नोक हैं। नीचे सतह में एक बड़ा अनदेखा खतरा धीरे धीरे पसर रहा है। यह नया खतरा दिल और फेफड़ों के लिए गंभीर बीमारियां पैदा कर रहा है। मनीष गौतम के मुताबिक सालों की गंदी हवा से फेफड़ों का संकट बढ़ रहा है। उन्होंने सरकार से अपील की कि नीति बनाने वाले लोग जल्दी पता लगाने और इलाज पर ध्यान दें। बता दें कि मनीष गौतम के पास ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा में 20 से ज्यादा सालों से ज्‍यादा काम करने का अनुभव है।

वायु प्रदूषण और दिल का कनेक्‍शन : वहीं दूसरी तरफ लंदन के सेंट जॉर्ज यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के मानद हृदय रोग विशेषज्ञ राजय नारायण के मुताबिक वायु प्रदूषण और हृदय, श्वसन, तंत्रिका संबंधी सहित कई प्रकार की बीमारियों के बीच अत्यधिक वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि यदि इसे समय रहते हल नहीं किया गया, तो यह स्वास्थ्य के लिए बेहद भयावह साबित होने वाला है।

चुपके से मारने वाला खतरा है : बर्मिंघम के मिडलैंड मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी अस्पताल में हृदय रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर डेरेक कोनॉली ने कहा कि साफ दिखने वाले दिनों में भी प्रदूषित शहरों के लोग दिल के अनदेखे खतरों से घिरे रहते हैं। उन्होंने बताया कि दिल की बीमारियां धीरे-धीरे बढ़ती हैं, लेकिन कभी-कभी तेजी से बिगड़ जाती हैं। ये एक चुपके से मारने वाला खतरा है। ज्यादातर लोग अपनी जोखिम नहीं समझते क्योंकि महीन कण (PM) दिखाई नहीं देते और इन्हें ब्लड प्रेशर या कोलेस्ट्रॉल की तरह आसानी से नहीं नापा जा सकता। हम सब इससे प्रभावित हैं। कोनॉली ने कहा कि पिछले 10 साल में दिल की बीमारियों के बढ़ने का कारण मोटापा नहीं, बल्‍कि गाड़ियों और हवाई जहाजों से निकलने वाले जहरीले पदार्थ की ज्‍यादा भूमिका है।

साल दर साल भयावह होंगे नतीजें : ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय मूल के डॉक्टर मनीष गौतम ने लगभग चेतावनी देते हुए बताया है कि अगर इस खतरे से निपटने के लिए जल्दी कदम नहीं उठाए गए, कोई उपाय नहीं खोजे गए तो स्‍थिति साल दर साल ज्‍यादा खराब होती जाएगी। उन्होंने कहा कि फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां बहुत गुपचुप तरीके से बढ़ रही हैं, दुखद यह है कि इनका पता ही नहीं चल रहा और इलाज भी नहीं हो रहा है। एक तरह से अनदेखी बीमारियां एक बड़ी लहर आ रही हैं, जो लोगों की जान और स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी पड़ेंगी।

हार्ट अटैक की वजह मोटापा नहीं : डॉक्‍टरों और विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले दशक में दुनियाभर मे जो दिल के दोरों में इजाफा हुआ है, जिस तरह से लोग दिल थम जाने से मर रहे हैं, उसकी वजह सिर्फ मोटापे नहीं है, बल्कि इसका मुख्य कारण कारों, तमाम वाहनों और विमानों से निकलने वाले धुएं सहित शहरी परिवहन से निकलने वाले जहरीले उत्सर्जन हैं। यह समस्या भारत, ब्रिटेन में विशेष रूप से गंभीर है। सच्चाई यह है कि ये नया खतरा उत्तर भारत में रहने वाले लाखों लोगों को नुकसान पहुंचा चुका है।

Air Pollution में ट्रांसपोर्ट सेक्टर का बड़ा हाथ: केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने मंगलवार को माना कि दिल्ली में प्रदूषण का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा परिवहन क्षेत्र से आता है, क्योंकि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता ज्यादा है। उन्होंने साफ विकल्पों की जरूरत पर जोर दिया और जैव ईंधन अपनाने को बढ़ावा देने की बात कही।

लंग्‍स हेल्‍थ टास्‍क फोर्स बनाए सरकार : डॉक्‍टरों ने तुरंत लंग हेल्थ टास्क फोर्स बनाने का सुझाव दिया है। वायु प्रदूषण से पसर रहे इस खतरे से निपटने के लिए फिलहाल जो उपाय किए जा रहे हैं वे नाकाफी हैं। डॉक्‍टरों और विशेषज्ञों ने कहा कि समय रहते लोगों की सांस संबंधी बीमारियों का पता लगाने और ठीक समय पर इलाज करने की तरफ ध्‍यान देना होगा। इसके लिए ‘लंग्‍स हेल्थ टास्‍क फोर्स’ जैसे मिशन शुरू करने होंगे।

सरकारी आंकड़े और द लांसेट की रिपोर्ट : संसद के हाल ही में शीतकालीन सत्र में सरकार ने कहा कि हवा की गुणवत्ता सूचकांक (AQI) के ऊंचे स्तर और फेफड़ों की बीमारियों के बीच सीधे कनेक्‍शन का कोई ठोस सबूत या डेटा नहीं मिला है। हालांकि, उन्होंने माना कि हवा का प्रदूषण सांस की दिक्कतों और इससे जुड़ी बीमारियों को ट्रिगर करता है।

क्‍या हैं सरकारी आंकड़ें : स्वास्थ्य मंत्रालय ने संसद में दिए आंकड़ों में बताया कि दिल्ली में पिछले 3 सालों में सांस की तीव्र बीमारियों के 2 लाख से ज्यादा मामले दर्ज हुए, जिनमें से करीब 30 हजार लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।

पेट्रोल धुएं से 2 लाख 69 हजार मौतें : 2025 की ‘द लांसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज’ रिपोर्ट के मुताबिक 2022 में भारत में PM2.5 प्रदूषण से 17 लाख से ज्यादा मौतें हुईं। इनमें सड़क परिवहन के लिए इस्तेमाल होने वाले पेट्रोल से 2 लाख 69 हजार मौतों का योगदान था। मई में इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन की वैश्विक स्टडी ने खुलासा किया कि सड़क परिवहन से निकलने वाले उत्सर्जन पर काबू पाने वाली नीतियां 2040 तक दुनिया भर में 19 लाख जानें बचा सकती हैं और बच्चों में 14 लाख नए अस्थमा के मामलों को रोक सकती हैं।

क्‍या हैं प्रदूषण के असर के लक्षण : सिरदर्द, थकान, हल्की खांसी, गले में खराश, पाचन संबंधी परेशानी, आंखों में सूखापन, त्वचा पर चकत्ते और बार-बार होने वाले संक्रमण प्रदूषण के असर के लक्षण हो सकते हैं। इन सभी लक्षणों में से कोई न कोई इन दिनों हर आदमी में नजर आते हैं। खांसना, छींकना, गले में खराश, आंखों की और स्‍कीन की एलर्जी इन दिनों आम हो गई है।
रिपोर्ट : नवीन रांगियाल

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