Dharma Sangrah

हिन्दी कविता : बंदूकें

सुबोध श्रीवास्तव
तुम्हें
भले ही भाती हों
अपने खेतों में खड़ी
बंदूकों की फसल
लेकिन -
मुझे आनंदित करती है
पीली-पीली सरसों
और दूर तक लहलहाती
गेहूं की बालियों से उपजता
संगीत।
 
तुम्हारे बच्चों को
शायद
लोरियों-सा सुख भी देती होगी
गोलियों की तड़तड़ाहट
लेकिन सुनो...
कभी खाली पेट नहीं भरा करतीं
बंदूकें,
सिर्फ कोख उजाड़ती हैं।

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