Biodata Maker

ग़ज़ल : सब्र आ जाए इस उम्मीद में ठहर गया कोई

Webdunia
- डॉ. रूपेश जैन 'राहत'
 
सब्र आ जाए इस उम्मीद में ठहर गया कोई
पास होकर भी कैसे बेख़बर गुजर गया कोई
 
नज़र कहां वो मुझको जो तलाश करती रही
सख्त राहों पे शायद ख्वाब बिखेर गया कोई
 
तिलिस्मी हो गए इशारे उनकी नज़र के अब
देखिए आके तमन्नाएं बर्बाद कर गया कोई
 
क्या क्या निकला कड़वाहट से भरी बातों में
आज सुनके इल्ज़ाम दिल से उतर गया कोई
 
शौक से बिठाई महफिल अन-मनी सी रही
मिरा ज़िक्र 'राहत' खैर चैन से घर गया कोई

सम्बंधित जानकारी

Show comments
सभी देखें

जरुर पढ़ें

क्या एक पुत्र भी गुरु हो सकता है? माता देवहूति का अद्भुत जीवन

Low Blood Sugar: हाइपोग्लाइसीमिया, बॉडी में शुगर कम होने पर क्या लक्षण महसूस होते हैं?

Indian Gooseberry: आंवला का जादू: रोज एक आंवला खाने से बालों और आंखों में होंगे ये 7 बड़े बदलाव

मृत्युपूर्व चेतना के लौटने का चमत्कार

बहुत ज्यादा सोचते हैं (Overthinking)? दिमाग को शांत और खुश रखने के लिए रोज करें ये 7 आसान योगासन

सभी देखें

नवीनतम

मानवीय सवालों की सुनामी में बढ़ती समाधान शून्यता!

बदनाम हुए तो क्या? नाम तो हुआ

डिग्री नहीं, दक्षता चाहिए — राष्ट्र निर्माण की निर्णायक दिशा

Hazrat Ali: कब और क्यों मनाया जाता है हजरत अली शहादत का दिवस

प्रवासी कविता: फ़रिश्ते

अगला लेख