shiv chalisa

कविता:सुन री, चिड़कली

डॉ. निशा माथुर
सुन री, चिड़कली हो के विदा, आइयो रे,
घर की है सूनी देहरी, निरखत जाइयो रे।
 
शगुन के चावल, झोली बिखराइयो,
भीगी-भीगी आंखें, हमें तक जाइयो रे।
मुंडेर की बुलबुल, हंसके उड़ जाइयो,
नेह से सारे रिश्तों की रस्म निभाइयो रे।
सुन री, चिड़कली हो के विदा, आइयो रे
घर की है सूनी देहरी, निरखत जाइयो रे 
 
बाबुल के दिल की तू पीर समझइयो,
भैया की खामोशी को, ना बिसराइयो रे,
मां के कलेजे की कोर, अब ना पुकारियो, 
नैहर है छूटा, पीहर हठ ना किजो रे, 
सुन री, चिड़कली हो के विदा, आइयो रे,
घर की है सूनी देहरी, निरखत जाइयो रे।
 
साजन के घर की रीत निभाइयो, 
सजा मांग टीका, मुख नूर लाइयो रे, 
सासरे की फुलवारी, तू महकाइयो, 
भाग्य खोल धन लक्ष्मी बरसाइयो रे,
सुन री, चिड़कली हो के विदा, आइयो रे
घर की है सूनी देहरी, निरखत जाइयो रे। 

सम्बंधित जानकारी

Show comments
सभी देखें

जरुर पढ़ें

क्या एक पुत्र भी गुरु हो सकता है? माता देवहूति का अद्भुत जीवन

Low Blood Sugar: हाइपोग्लाइसीमिया, बॉडी में शुगर कम होने पर क्या लक्षण महसूस होते हैं?

Indian Gooseberry: आंवला का जादू: रोज एक आंवला खाने से बालों और आंखों में होंगे ये 7 बड़े बदलाव

मृत्युपूर्व चेतना के लौटने का चमत्कार

बहुत ज्यादा सोचते हैं (Overthinking)? दिमाग को शांत और खुश रखने के लिए रोज करें ये 7 आसान योगासन

सभी देखें

नवीनतम

डिग्री नहीं, दक्षता चाहिए — राष्ट्र निर्माण की निर्णायक दिशा

Hazrat Ali: कब और क्यों मनाया जाता है हजरत अली शहादत का दिवस

प्रवासी कविता: फ़रिश्ते

टी-20 मैच की तरह बेखौफ खेलें ज़िंदगी की दूसरी पारी

खामेनेई का अंत और इस्लामी क्रांति

अगला लेख