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क्या गैर हिंदुओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित करना उचित है?

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हमें फॉलो करें हिंदू मंदिर केदारनाथ और कैप्शन में लिखा क्यों क्यों नहीं जा सकते मंदिर में गैर हिंदू?

WD Feature Desk

, बुधवार, 28 जनवरी 2026 (12:22 IST)
अभी हाल ही में (जनवरी 2026 में) उत्तराखंड में एक बड़ा निर्णय लिया गया है। बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) ने एक प्रस्ताव पारित किया है जिसके तहत बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और उनसे जुड़े लगभग 48 मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी है। इसके पहले राम मंदिर में एक मुस्लिम द्वारा नमाज पढ़े जाने के घटनाक्रम को भी लेकर चर्चा रही है। चलिए जानते हैं कि क्या गैर हिंदुओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित करना उचित है?
 
  1. प्रमुख मंदिर जहां गैर हिंदुओं का प्रवेश है निषेध
  2. प्रवेश निषेध के संबंध में क्या कहती है मंदिर परंपरा?
  3. मंदिर में प्रवेश को लेकर क्या कहते हैं हिंदू शास्त्र?
 

प्रमुख मंदिर जहां गैर हिंदुओं का प्रवेश है निषेध

1. जगन्नाथ मंदिर, पुरी (ओडिशा), गुरुवायूर मंदिर (केरल), कामाक्षी अम्मन मंदिर, कांचीपुरम (तमिलनाडु), लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर (ओडिशा)। इन मंदिरों में गैर हिंदुओं का प्रवेश प्रतिबंधित है।
2. हालांकि काशी विश्वनाथ (वाराणसी, यूपी) या तिरुपति बालाजी (आंध्र) या सबरीमाला (केरल) जैसे बड़े मंदिरों में गैर-हिंदुओं को प्रवेश की अनुमति है, बशर्ते वे नियमों का सम्मान करें।
 

प्रवेश निषेध के संबंध में क्या कहती है मंदिर परंपरा?

1. भारत में मंदिरों का प्रबंधन अलग-अलग ट्रस्टों, बोर्डों और स्थानीय परंपराओं द्वारा किया जाता है। इसलिए सभी मंदिरों के नियम और परंपरा अलग अलग है। परंपरा का शास्त्र से कोई संबंध नहीं है।
2. कुछ प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिर अपनी सदियों पुरानी परंपराओं के कारण केवल हिंदुओं (बौद्ध, जैन और सिख सहित) को ही प्रवेश की अनुमति देते हैं। 
3. मंदिर परंपरा के अनुसार मंदिर में पूर्व में घटी कुछ नकारात्मक घटनाओं के कारण गैर हिंदुओं का प्रवेश प्रतिबंधित किया जाना भी एक कारण है।
4. शुचिता अर्थात शुद्धता और श्रद्धा को लेकर मंदिर के कड़े नियम भी इस संबंध में गैर हिंदुओं के प्रवेश को रोकता है। गैर हिंदुओं का मंदिर में श्रद्धा के भाव से प्रवेश करना सुनिश्चित नहीं है।
5. कुछ मंदिरों में ड्रेस कोड का होना भी यह गैर हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश को रोकता है।
6. कई पारंपरिक पुजारियों का मानना है कि जो व्यक्ति मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखता या जो उन अनुष्ठानों की मर्यादा को नहीं समझता, उसके प्रवेश से मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा (Spiritual Vibration) प्रभावित हो सकती है।
 

मंदिर में प्रवेश को लेकर क्या कहते हैं हिंदू शास्त्र?

1. जहां तक सवाल हिंदू शास्त्रों का है जो उसमें शुचिता, श्रद्धा और आगम नियमों का पालन करने वाले को ही मंदिर में प्रवेश की बात कही गई है। 
2. शास्त्रों में "गैर-हिंदू" शब्द का प्रयोग नहीं है, बल्कि 'श्रद्धाहीन' या 'विधर्मी' (जो उस धर्म के नियमों को न माने) के प्रवेश को वर्जित बताया गया है।
3. मंदिर की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए 'शुचिता' अनिवार्य है। इसमें शारीरिक शुद्धता के साथ-साथ 'वैचारिक और धार्मिक शुद्धता' भी शामिल है। 
4. शास्त्रों का दृष्टिकोण मुख्य रूप से शुचिता (Purity), श्रद्धा (Faith) और आगम नियमों (Temple Traditions) पर आधारित है।
5. प्राचीन ग्रंथों में 'दीक्षा' का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार, मंदिर के गर्भगृह या विशेष अनुष्ठानों में केवल उन्हीं का प्रवेश उचित माना जाता था जिन्होंने उस देवता या संप्रदाय की दीक्षा ली हो। चूंकि गैर-हिंदू सनातन धर्म की दीक्षा नहीं लेते, इसलिए उन्हें 'अदीक्षित' की श्रेणी में रखा जाता है, जिससे उनके प्रवेश पर पारंपरिक रोक लग जाती है।
6. मंदिर केवल प्रार्थना स्थल नहीं, बल्कि देवता का जीवंत निवास (विग्रह) है। इसकी जीवंतता बनाए रखना जरूरी है। 
7. एक ओर शास्त्र कहते हैं "अतिथि देवो भव", लेकिन दूसरी ओर वे "मर्यादा" पर भी जोर देते हैं। ऋग्वेद में 'विश्वमानुष' की अवधारणा है, जो सभी मनुष्यों के कल्याण की बात करती है। "वसुधैव कुटुंबकम" की भावना के तहत, कई प्राचीन ऋषियों का मत रहा है कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा भाव से आता है, वह दर्शन का पात्र है।
 
निष्कर्ष: वर्तमान में जो प्रतिबंध हम देखते हैं, वे शास्त्रों से अधिक 'कुल परंपरा', 'स्थानीय रीति-रिवाजों' और पूर्व में हुई 'नकारात्मक घटनाओं' का हिस्सा हैं। इसका हिंदू शास्त्रों से कोई संबंध नहीं है। अतः यह प्रतिबंध केवल गैर-हिंदुओं के खिलाफ नहीं, बल्कि पवित्रता के नियमों के पालन के बारे में है।

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