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एक जैन साधु ने नष्ट कर दिया था जादूगर मोहम्मद छैल का जादू

अनिरुद्ध जोशी
जादूगर मोहम्मद छैल एक भारतीय जादूगर था। दुनिया में उसकी ख्‍याति थी परंतु वह अपनी विद्या का दुरुपयोग करने लगा था। कहते हैं कि छैल को अपनी जादूगरी पर घमंड भी हो चला था।
 
 
1. मोहम्मद छैल का जन्म गुजरात के भावनगर के पास के एक गांव में निंगाला में 1850 को हुआ था। 75 वर्ष की उम्र में सन् 1925 को उसकी मृत्यु हो गई थी। असल में मोहम्मद छैल एक दरगाह के पीर थे।
 
2. छैल ट्रेन से यात्रा करके गावों में अपना जादू दिखाते थे। वह रेलवे में बिना टिकट यात्रा करता और टीटी से टिकट मांगे जाने पर हाथ की मुट्ठी को बंद कर खोलता और टिकट बना देता था। या अपनी दाढ़ी में से ढेर सारी टिकट निकाल देता था।
 
3. मोहम्मद छैल लोगों के मनोरंजन के लिए एक से एक बढ़कर जादू के खेल बताते थे। मोहम्मद छैल ने प्राचीन भारत की कई विद्याएं सिद्ध कर रखी थीं। वे धार्मिक मेलो की जमा भीड़ में भी जादूई चमत्कार दिखाते हुवे जनहित धार्मिक उपदेश दे देते थे।
 
4. हालांकि छैल के बारे में अन्य कई और भी किस्से प्रचलित हैं। कहते हैं कि उसने लोगों के भले का काम भी किया था। जैसे एक बार उसने एक गरीब को साहूकार के चंगुल से साहूकार को अपनी जादुई शक्ति से एक कुर्सी से चिपका दिया था। आखिरकार साहूकार को माफी मांगना पड़ी और उसने गरीब को छोड़ दिया। 
 
5. एक बार एक व्यापारी उसके पास गया जो यह जानना चाहता था कि मुंबई में उसकी बीमार पत्नी कैसे ही तो छैल ने अपनी हथेली पर यह पत्नी को रसोई में कार्म करते हुए दिखा दिया था। 
 
6. एक बार ट्रेन में छैल ने देखा कि एक व्यापारी चुपके चुपके अपनी थैली में से मिठाई निकाल कर खा रहा है तो छैल ने कहा कि इसे सभी के साथ बांटकर खाएं तो व्यापारी से मना कर दिया। तब छैल ने व्यापारी से कहा कि थैले में हाथ डालने से पहले सावधान रहें। व्यापारी से इस पर ध्यान नहीं दिया। अगली बार उसने थैले में हाथ डाला तो हाथ में सांप निकल आया और वह घबरा गया। 
 
7. छैल अपनी विद्या से मिठाइयों से भरा थाल उत्पन्न करता और अनेक मनुष्यों को मिठाई खिलाता था।
 
8. कहते हैं कि जिस गुरु से छैल ने यह सीखा था उस गुरु को उसने वचन दिया था कि ‘आपकी सहायता से प्राप्त किसी भी चीज़ का मैं व्यक्गित उपभोग नहीं करूंगा’। लेकिन कते हैं कि उसने वचन को नहीं निभाया। 
 
9. कहते हैं कि उसने अपनी जादू की विद्या का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया था और उसे अपने जादू पर घमंड भी हो चला था। धीरे-धीरे उसको उन विद्याओं में रस आने लगा और वह लोगों को सम्मोहित करने लगा।
 
10. यह भी जनश्रुति है कि एक बार उसने अपने छल-कपट और जादूगरी से एक जैन सन्यासी के धार्मिक कार्य में बाधाएं डालना शुरू कर दी थी। कई बार चेताए जाने पर भी उसने सन्यासी को परेशान करना बंद नहीं किया तब अंत में सन्यासी ने उसकी जादूगरी को एक ही इशारे से धूल में मिला दिया। उसका जादू हमेशा के लिए नष्ट कर दिया। इसके बाद फिर कभी उसका जादू नहीं चला। बाद में 1925 में उनकी मृत्यु हो गई, परंतु यह भी एक रहस्य है कि उसकी मृत्यु कब, कहां और कैसे हुई। 

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