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यूरोप-अमेरिका के बीच बढ़ रही है अविश्वास की खाई

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राम यादव

International Security Conference Munich: जर्मनी के सबसे दक्षिणी राज्य बवेरिया की राजधानी म्युनिक में, 1963 से फ़रवरी के महीने में हर वर्ष एक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सम्मेलन होता है। उसे अटलांटिक महासागर के पूर्व में स्थित यूरोप और पश्चिम में स्थित अमेरिका के बीच के अटलांटिक पारीय माहौल का एक तापमापी माना जाता है। इस वर्ष के सम्मेलन में माहौल कुछ ठंडा हो गया लगा। वह कटु विवाद इस बार नहीं देखने में आया, जो पिछले वर्ष के सम्मेलन में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस के भड़काऊ वक्तव्यों के बाद पैदा हो गया था।
 
आशंका थी कि इस बार, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ग्रीनलैंड को हड़प जाने की महत्वाकांक्षा और उसके आड़े आने का दुस्साहस करने वाले आठ यूरोपीय नाटो देशों के खिलाफ ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ की धमकी से (जिसे बाद में रद्द कर दिया गया), म्युनिक सम्मेलन गंभीर संकट में पड़ सकता है। किंतु, सबने राहत की सांस ली कि इस बार अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस नहीं, बल्कि उनकी अपेक्षा ठंडे दिमाग वाले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो म्युनिक आए थे। 
 
अमेरिका 'यूरोप की ही संतान' है : अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने अपने वक्तव्य में यूरोप-अमेरिका के बीच के अटलांटिक-पारीय संबंधों के सभी प्रमुख पहलुओं को छुआ: कहा, अमेरिका 'यूरोप की ही संतान' है। 'संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप एक साथ हैं।' उनके इन शब्दों पर हॉल में बैठे सभी लोगों ने खड़े हो कर तालियां बजाईं। यूरोपीय संघ की वैदेशिक मामलों की उच्च प्रतिनिधि काया कालास ने, बाद में एक मीडिया इंटरव्यू में कहा कि रूबियो के संदेश 'बहुत आश्वस्त करने वाले' थे। अटलांटिक-पारीय संबंधों में कभी-कभी ऐसा लगता था 'जैसे हम इस रिश्ते में अकेले हैं। जैसे यह रिश्ता एकतरफ़ा है।' रूबियो ही ट्रंप प्रशासन में 'सबसे अधिक यूरोप समर्थक, सबसे अधिक अटलांटिक-पारीय समर्थक' थे। इसलिए, यह सवाल हमेशा उठता था कि क्या उनके बयान राष्ट्रपति ट्रंप के विचारों को भी प्रतिबिंबित करते हैं, श्रीमती कालास ने कहा।
 
यूरोप-अमेरिकी मतभेद : जर्मनी के चांसलर (प्रधानमंत्री) फ्रेडरिक मेर्त्स ने, म्युनिक सुरक्षा सम्मेलन के शुरु में ही अमेरिका और यूरोप के बीच के मतभेद का ज़िक्र किया था, जो अब पहले कभी की अपेक्षा कहीं अधिक उभर कर सामने आया है। किंतु, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने एक 'नए ट्रांसअटलांटिक' भविष्य की बात की, जिसे अमेरिका अपने 'सबसे पुराने दोस्तों' के साथ मिल कर आगे बढ़ाना चाहता है। हालांकि, उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि यूरोपीय देश प्रमुख मुद्दों पर यदि डॉनाल्ड ट्रंप का अनुसरण नहीं करेंगे, तो अमेरिका उन्हें 'मज़बूत साझेदार' नहीं मानेगा।
 
रूबियो ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका का इससे क्या तात्पर्य है: 'जलवायु पंथ' का अंत, मुक्त विश्व व्यापार का अंत और दूसरे देशों से आने वालों के 'बड़े पैमाने पर प्रवासन' के खिलाफ लड़ाई, क्योंकि यह प्रवासन 'पश्चिमी समाजों को खोखला कर रहा है।' मार्को रूबियो का लहज़ा उतना तिरस्कारपूर्ण नहीं था, जितना एक साल पहले उपराष्ट्रपति जेडी वैंस का था, हालांकि रूबियो भी अपने आका डॉनल्ड ट्रंप के निर्देशों का ही पालन कर रहे थे।
 
अमेरिका को आईना दिखाया : यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रतिनिधि, एस्तोनिया देश की काया कालास ने, ट्रंप के वैचारिक आरोपों के प्रति अपने यूरोपीय सहयोगियों के विचारों को अभिव्यक्त करते हुए कहा कि कुछ लोगों के दावे के विपरीत, 'जागरूक, पतित यूरोप' सभ्यता के अंत का सामना नहीं कर रहा है। ऐसा करते हुए, उन्होंने वास्तव में उसी वाक्यांश को दोहराया, जिसका इस्तेमाल अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वैंस ने 2025 के म्युनिक के सुरक्षा सम्मेलन में घोर आक्रोश पैदा करने के लिए किया था। कालास ने कटाक्ष करने से खुद को नहीं रोका: उन्होंने कहा कि यूरोप में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कथित दमन की आलोचना उस देश से आना मुश्किल से ही विश्वसनीय है, जो अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 58वें स्थान पर है, जबकि उनका अपना देश (एस्तोनिया) दूसरे स्थान पर है।
 
यूक्रेन के साथ रूस के आक्रामक युद्ध के बाद से, म्युनिक सुरक्षा सम्मेलन में यूक्रेन के प्रति समर्थन का प्रश्न लगातार हावी रहा है। इस बार, यूरोपीय महाद्वीप के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा ख़तरा, नाटो की अस्थिर स्थिति वाले मूल प्रश्न पर यूरोपीय लोगों की चिंताजनक बहस के आगे लगभग पूरी तरह से दब गया: क्या ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका अभी भी एक भरोसेमंद सहयोगी है?
 
नाटो गठबंधन के प्रति विश्वास हिल गया है : ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले 13 महीनों की उथल-पुथल के बाद, अमेरिका और अन्य नाटो देशों के बीच के गठबंधन के प्रति विश्वास अब बुरी तरह से हिल गया है। रूस के साथ शांति वार्ता का रास्ता लंबा होता गया है। यूरोपियों को शिकायत है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने अपने भाषण में यूक्रेन के बारे में, यानी लगभग चार साल से चल रहे युद्ध के बारे में, यूक्रेनी लोगों की मानवीय पीड़ा को लेकर एक शब्द भी नहीं कहा।
 
रूबियो ने अप्रत्यक्ष रूप से संकेत दिया कि यह ज़िम्मेदारी यूरोपीय देशों की और यूक्रेन का समर्थन करने वाले अन्य देशों की है। जर्मन चांसलर मेर्त्स, फ्रांस के राष्ट्रपति माक्रों और ब्रिटिश प्रधानमंत्री स्टारमर जैसे नाटो के यूरोपीय साझेदारों ने, आने वाले महीनों और वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में जिस बात का वर्णन किया था, उसे अमेरिका के शीर्ष राजनयिक रूबियो ने जानबूझकर अनदेखा कर दिया। म्युनिक सुरक्षा सम्मेलन के अध्यक्ष, जर्मनी के वोल्फगांग इशिंगर द्वारा वाशिंगटन, कीव और मॉस्को के बीच बातचीत की स्थिति के बारे में एक संक्षिप्त प्रश्न पूछे जाने के बाद ही रूबियो ने स्वीकार किया: उन्हें नहीं पता कि रूस गंभीर है या नहीं। हम देखेंगे कि क्या कोई ऐसा समझौता हो सकता है 'जिसे यूक्रेन भी स्वीकार कर सके।'
 
ज़ेलेंस्की पर ट्रंप का दबाव : यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने स्वीकार किया कि उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से 'थोड़ा दबाव' महसूस हो रहा है, जो शायद एक हल्की बात है: अमेरिकी 'अक्सर रियायतों का मुद्दा उठाते हैं, और रियायतों पर चर्चा अक्सर केवल यूक्रेन के संदर्भ में होती है, रूस के संदर्भ में नहीं।' यूक्रेन के यूरोपीय सहयोगी, जो पिछले एक साल से यूक्रेन को भरपूर वित्तीय सहायता दे रहे हैं, ज़ेलेंस्की के इस विचार से सहमत हैं।
 
म्युनिक में, उचित ही यह आशंका व्याप्त थी कि ट्रंप, लगभग किसी भी परिस्थिति में, रूस के साथ यूक्रेन को लेकर 'समझौता' कर सकते हैं, ताकि वे बाद में इसे अपनी 'जीत' घोषित कर सकें। चेक गणराज्य के राष्ट्रपति पेत्र पावेल ने - जो पहले ब्रसेल्स में नाटो के उच्च पदस्थ जनरल थे - ट्रंप का नाम लिए बिना चेतावनी दी कि 'जल्दबाज़ी में शांति स्थापित करने से नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा।' जल्दबाज़ी का परिणाम 'और भी अधिक आक्रामकता' होगा।
 
यूरोप का भविष्य दांव पर है : डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेत्ते फ्रेदरिक्सन ने भी, जो ट्रंप की ग्रीनलैंड नीति से लगातार संकट में घिरी हुई हैं, इसी तरह के शब्दों में अपनी बात रखी: एक ख़राब शांति समझौता 'रूस द्वारा और अधिक हमलों को जन्म देगा।' विशेष रूप से, यूक्रेन 'या किसी अन्य यूरोपीय देश' पर फिर से हमले हो सकते हैं। यूरोपियों को बातचीत की मेज़ से दूर रखा गया है, जबकि उनके महाद्वीप का भविष्य दांव पर है। उन्हें आभास हो गया है कि नाटो के भीतर एक मजबूत यूरोपीय स्तंभ की स्थापना ही यह सुनिश्चित करेगी कि वाशिंगटन में उनकी आवाज़ सुनी जाए।

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