Hanuman Chalisa

23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ: इतिहास, जीवन और शिक्षाएँ

अनिरुद्ध जोशी
शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025 (16:06 IST)
Lord Parshvanath: जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ भारतीय इतिहास और धर्म की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी हैं। उन्हें एक ऐतिहासिक व्यक्ति माना जाता है, जिन्होंने भगवान महावीर से पहले ही श्रमण परंपरा को आम जनता तक पहुंचाया और उसे एक विशिष्ट पहचान दी। यहाँ उनके जीवन, कालक्रम और शिक्षाओं से जुड़ी 12 दिलचस्प और महत्वपूर्ण जानकारियां एक नए अंदाज़ में प्रस्तुत हैं।
 
1. जन्म और कालक्रम
जन्म तिथि: भगवान पार्श्वनाथ की जयंती पौष कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को मनाई जाती है, जो इस बार (अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार) 13-14 दिसंबर 2025 को पड़ रही है।
जन्म स्थान: उनका जन्म वर्तमान वाराणसी (काशी) में हुआ था।
जन्म समय: इतिहासकारों के अनुसार, उनका जन्म लगभग 872 ईसा पूर्व हुआ था। कल्पसूत्र के अनुसार, वे भगवान महावीर स्वामी से लगभग 250 वर्ष पूर्व, यानी 777 ई. पूर्व अवतरित हुए थे।
 
2. पारिवारिक पृष्ठभूमि:
उनके पिता काशी के राजा अश्‍वसेन थे और माता का नाम वामा देवी था। इस शाही पृष्ठभूमि के कारण, उनका प्रारंभिक जीवन एक राजकुमार के रूप में बीता।
विवाह: युवावस्था में उनका विवाह कुशस्थल देश की राजकुमारी प्रभावती से हुआ था।
 
3. दीक्षा और कैवल्य
गृह त्याग और दीक्षा: तीस वर्ष की आयु में, पार्श्वनाथजी ने गृहस्थ जीवन त्याग कर संन्यास ले लिया। उन्होंने पौष माह की कृष्ण एकादशी को दीक्षा ग्रहण की।
कैवल्य ज्ञान: 83 दिन की कठोर तपस्या के बाद, 84वें दिन, उन्हें चैत्र कृष्ण चतुर्थी को सम्मेद पर्वत पर 'घातकी वृक्ष' के नीचे कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई।
 
4. निर्वाण और शिक्षाएँ:
निर्वाण स्थल: श्रावण शुक्ल की सप्तमी को, उन्हें पारसनाथ पहाड़ (सम्मेद शिखर) पर निर्वाण प्राप्त हुआ। यह तीर्थस्थल भारत के झारखंड प्रदेश के गिरिडीह जिले में स्थित है।
चातुर्याम धर्म: कैवल्य ज्ञान के बाद, उन्होंने चातुर्याम धर्म की शिक्षा दी, जिसमें चार प्रमुख व्रत शामिल थे: सत्य, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), और अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना)।
संघ और गणधर: ज्ञान प्राप्ति के बाद, उन्होंने सत्तर वर्षों तक अपने विचारों का प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने चार गणों या संघों की स्थापना की। उनके गणधरों की संख्या 10 थी, जिनमें आर्यदत्त स्वामी उनके प्रथम गणधर थे।
 
5. पहचान और विरासत
प्रतीक और यक्ष: जैन धर्मावलंबियों के अनुसार, उनका प्रतीक चिह्न सर्प है और उनके शरीर का वर्ण नीला है। उनके रक्षक देवता (यक्ष) का नाम मातंग और यक्षिणी का नाम पद्मावती देवी था।
मूर्तियों में पहचान: पार्श्वनाथ भगवान की मूर्तियों की पहचान उनके सिर के ऊपर बने तीन, सात या ग्यारह सर्प-फणों के छत्रों के आधार पर होती है। उनकी जन्मभूमि वाराणसी के भेलूपुरा मोहल्ले में स्थित मंदिर इसका प्रमुख प्रमाण है।
इस तरह, भगवान पार्श्वनाथ ने न केवल जैन धर्म की आधारशिला रखी, बल्कि अहिंसा और सदाचार पर आधारित श्रमण संस्कृति को सदियों तक जीवित रखने का मार्ग भी प्रशस्त किया।

सम्बंधित जानकारी

Show comments
सभी देखें

ज़रूर पढ़ें

Muharram month 2026: मोहर्रम मास का इस्लाम धर्म में महत्व और परंपरा जानें

शुक्र की वृषभ राशि में मंगल का प्रवेश, 5 राशियों की चमकेगी किस्मत, धन और करियर में मिल सकता है बड़ा लाभ

गुरु का पुष्य नक्षत्र में गोचर, करें ये 5 अचूक उपाय, धन, सुख और अच्छी सेहत का मिलेगा आशीर्वाद

गुरु बदलेंगे चाल, शनि के पुष्य नक्षत्र में होगा प्रवेश; 5 राशियों की चमकेगी किस्मत, 3 को लग सकता है झटका

मंगल का कृतिका नक्षत्र में प्रवेश: 4 राशियों की किस्मत में होगा बड़ा बदलाव, जानें असर

सभी देखें

धर्म संसार

21 June Birthday: आपको 21 जून, 2026 के लिए जन्मदिन की बधाई!

Aaj ka panchang: आज का शुभ मुहूर्त: 21 जून 2026: रविवार का पंचांग और शुभ समय

सूर्य दक्षिणायन 2026: 21 जून से या कर्क संक्रांति से? जानिए कब शुरू होता है उत्तरायण पर्व

Weekly Horoscope 22-28 June 2026: इन 4 राशियों के शुरू होंगे अच्छे दिन, जानें मेष से मीन तक का साप्ताहिक राशिफल

Weekly Horoscope 22–26 June 2026: 22 से 28 जून तक कैसा रहेगा आपका सप्ताह? शॉर्ट में पढ़ें साप्ताहिक राशिफल

अगला लेख