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मिच्छामी दुक्कड़म् : किसी से मेरा बैर नहीं, सभी से मेरी मैत्री है, यही सिखाता है संवत्सरी पर्व

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संवत्सरी महापर्व (Samvatsari Mahaparva) श्वेतांबर जैन समुदाय के लिए सबसे बड़ा अवसर माना जाता है। 31 अगस्त को क्षमा के 8 दिवसीय जैन पर्व का समापन होगा। इस अवसर पर जहां रोशनी से जिनालय जगमगाएंगे, वहीं प्रभु प्रतिमा की अंगरचना करके संवत्सरी पर्व मनाया जाएगा। 
 
खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे। मित्तिमे सव्व भुएस्‌ वैरं ममझं न केणई। 
 
- अर्थात सभी प्राणियों के साथ मेरी मैत्री है, किसी के साथ मेरा बैर नहीं है।

इस वाक्य को अपने जीवन में उतारते हुए और अपने आचरण में धारण करके श्वेतांबर जैन समुदाय 'मिच्छामी दुक्कड़म्' कहकर क्षमायाचना करेंगे तथा अपने द्वारा हुई त्रुटियों के लिए दिल से क्षमा मांगते हुए संवत्सरी महापर्व मनाएंगे। 
 
जैन धर्म में पर्युषण पर्व मनाने के लिए भिन्न-भिन्न मान्यताएं हैं, आगम साहित्य के अनुसार संवत्सरी चातुर्मास के 49 या 50 दिन व्यतीत होने पर व 69 या 70 दिन अवशिष्ट रहने पर मनाई जानी चाहिए और दिगंबर परंपरा में यह पर्व 10 लक्षणों के रूप में मनाया जाता है।

श्वेतांबर परंपरा में जहां 8 दिनों तक यह पर्व मनाया जाता है, वहीं दिगंबर परंपरा में यह दसलक्षण पर्व के रूप में मनाया जाता है, जो कि श्वेतांबर परंपरा के संवत्सरी महापर्व के तुरंत बाद 10 लक्षण पर्युषण पर्व के रूप में शुरू होते हैं।
 
जैन धर्म के अनुसार पर्युषण कषाय शमन का पर्व है। अगर किसी भी मनुष्य के अंदर ताप, द्वेष के भाव पैदा हो जाते हैं तो पर्युषण उस भाव को शांत करने का पर्व है। धर्म के 10 द्वार बताए हैं उसमें पहला द्वार है- क्षमा, मतलब समता। समता/ क्षमा जीवन के लिए बहुत जरूरी है। जब तक कोई भी व्यक्ति जीवन में क्षमा नहीं अपनाता, तब तक वह अध्यात्म के पथ पर नहीं बढ़ सकता। 
 
अत: संवत्सरी के रूप में सभी प्राणियों के प्रति मन में बने बैरभाव को दूर करके मैत्री का उत्सव मनाना उचित है। अत: संवत्सरी पर्व के इस पावन अवसर पर 'मिच्छामी दुक्कड़म्' कह कर दिल से क्षमा करें भी और मांगे भी। तभी इस पर्व की सार्थकता बनी रहेगी। यही पर्युषण पर्व मनाने का मूल उद्देश्य तथा आत्मा को शुद्ध करने का खास पर्व है। 

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